अलॉटमेंट का असली गेम, आपको भी नहीं मिलता है बढ़िया वाला IPO, जानिए ऐसा क्यों होता?

जिन रिटेल निवेशकों को आईपीओ में अलॉटमेंट मिलता है, उसे कम से कम एक लॉट जरूर मिलता है. यानी कम लॉट की बोली लगाना, अधिक सब्सक्रिप्शन की स्थिति में निवेशक के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है.

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IPO अलॉटमेंट का प्रोसेस IPO अलॉटमेंट का प्रोसेस

अमित कुमार दुबे

  • नई दिल्ली,
  • 11 अगस्त 2023,
  • अपडेटेड 1:22 PM IST

अगर आप भी IPO में अप्लाई करते हैं, तो जरूर मन में सवाल आता होगा, कि आखिर बढ़िया वाला आईपीओ अलॉटमेंट क्यों नहीं मिलता है. अधिकतर लोगों की लोगों की शिकायत होती है कि आईपीओ में अप्लाई तो करते हैं, लेकिन कभी निकला नहीं है. आप भी जानना चाहते हैं कि किस प्रक्रिया के तहत आईपीओ का अलॉटमेंट होता है, ताकि जिसे मिला, उसे किस नियम के तहत मिला. 

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दरअसल, निवेशक आईपीओ अलॉटमेंट (IPO Allotoment) के नियम को बारीकी से समझना चाहते हैं. क्योंकि अच्छी कंपनी के आईपीओ हमेशा ओवरसब्सक्राइब होता है, यानी आईपीओ में मौजूद शेयर से कई गुने ज्यादा निवेशकों के आवेदन मिल जाते हैं, फिर सबको शेयर अलॉट नहीं हो पाते.  

सेबी (SEBI) के नियम के मुताबिक एक आईपीओ में एक रिटेल निवेशक (Retail Investor) अधिकतर 2 लाख रुपये तक की बोली लगा सकता है. हालांकि, इसके लिए न्यूनतम बोली होना जरूरी है. इसका अर्थ है कि अगर किसी आईपीओ में एक लॉट 15 शेयरों की है, तो आपको कम से कम 15 शेयरों के लिए बोली लगानी ही होगी.

सब कुछ नियम के तहत

अगर आईपीओ में जितने शेयर ऑफर किए जाते हैं, उतने ही आवेदन मिलने की स्थिति में लगभग सभी निवेशक को आईपीओ में शेयर अलॉट हो जाते हैं. लेकिन आईपीओ ओवरसब्सक्राइब होने पर मामला फंस जाता है, और फिर अलॉटमेंट प्रक्रिया के लिए कुछ नियम हैं, जिसे फॉलो किए जाते हैं.

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आईपीओ ओवरसब्सक्राइब का सीधा मतलब है कि उपलब्ध शेयर्स के मुकाबले आवदेन ज्यादा मिलना. ऐसी स्थिति में जिन रिटेल निवेशकों को शेयर अलॉट किए जाते हैं. उनकी संख्या, अलॉटमेंट के लिए उपलब्ध इक्विटी शेयर्स की संख्या से विभाजित कर निकाली जाती है. यानी निवेशकों को अनुपातिक आधार पर ही शेयरों का आवंटन किया जाता है.

जिन रिटेल निवेशकों को आईपीओ में अलॉटमेंट मिलता है, उसे कम से कम एक लॉट जरूर मिलता है. यानी कम लॉट की बोली लगाना, अधिक सब्सक्रिप्शन की स्थिति में निवेशक के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है. यानी आईपीओ अलॉटमेंट होने की कम उम्मीद होती है. इसलिए अच्छी कंपनियों के आईपीओ में अधिक से अधिक लॉट में अप्लाई करने से शेयर अलॉट होने की उम्मीद बढ़ जाती है.

अलॉटमेंट की ये प्रक्रिया

इसके अलावा शेयर आवंटन के लिए लकी ड्रॉ का इस्तेमाल भी किया जाता है. आज के दौर कई निवेशक अपने परिजनों के नाम से भी बोली लगाते हैं, ताकि किसी के नाम से निकल जाए. इस वजह से उस परिवार को एक व्यक्ति की तुलना में शेयर आवंटन की संभवानाएं बढ़ जाती है. आवेदन के लिए केवल डिमैट अकाउंट की जरूरत होती है, जो एक बैंक से कनेक्ट होता है. 

ओवरस्क्रिप्शन की स्थिति में कुछ इस प्रकार के शेयर का अलॉटमेंट होता है. उदाहरण के लिए अगर M कंपनी का आईपीओ तीन गुना ओवरसब्सक्राइब हो गया. यानी जितने शेयर ऑफर किए गए थे, उसके तिगुने अप्लीकेशन मिल गए हैं. आसान शब्दों में कहें तो एक शेयर के तीन दावेदार हो गए. ऐसे मामलों में आईपीओ का आवंटन कम्प्यूटरीकृत ड्रा के माध्यम से किया जाता है.

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क्या होता है आईपीओ?
जब कोई कंपनी पहली बार अपने शेयर पब्लिक को ऑफर करती है तो उसे आईपीओ कहते हैं. आईपीओ के जरिए कंपनी फंड इकट्ठा करती है और उस फंड को कंपनी की तरक्की में खर्च करती है. बदले में आईपीओ खरीदने वाले लोगों को कंपनी में हिस्सेदारी मिल जाती है. IPO में जो शेयर अलॉट होते हैं, वो आमतौर पर BSE या NSE  जैसे स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होते हैं. जहां लोग इन शेयरों की आराम से खरीद बिक्री कर सकते हैं. 
 

 

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