ईरान और इजरायल के बीच युद्ध का असर अब साफ दिखने लगा है. मिडिल ईस्ट तेल का खजाना है, और इस इलाके में तनाव ने भारत के शेयर बाजार और तमाम बड़ी कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है. अगर यहां से ईरान-इजरायल-अमेरिका के बीच संघर्ष और बढ़ता है, तो इसका सीधा असर तेल, सप्लाई चेन और कंपनियों के मुनाफे पर पड़ सकता है, और यही वजह है कि बाजार दबाव में है.
सबसे पहले बात करते हैं, शेयर बाजार की. हाल के सत्रों में BSE सेंसेक्स और NSE निफ्टी-50 दोनों में लगातार गिरावट देखी गई है. निवेशकों को डर है कि अगर हालात और बिगड़े, तो कंपनियों के खर्च बढ़ेंगे और मुनाफा घट सकता है. इसी डर से लोग शेयर बेच रहे हैं, बाजार में संकट गहराता जा रहा है.
भारतीय बाजार का खराब प्रदर्शन
साल 2026 में भारतीय शेयर बाजार वैश्विक बाजारों के मुकाबले खराब प्रदर्शन करने वालों में शामिल रहा है. विश्लेषकों का कहना है कि अगर पश्चिम एशिया का युद्ध लंबा चलता है, तो इसका असर सीधे भारतीय कंपनियों की कमाई (Earnings) और वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ेगा.
आंकड़े बताते है कि साल 2026 में करीब 44 कारोबारी सत्रों के दौरान सेंसेक्स लगभग 7% गिर चुका है. निवेशकों की चिंता ये है कि पिछले आठ तिमाहियों से कॉरपोरेट भारत की कमाई लगभग एक दायरे में स्थिर बनी हुई है. यानी कंपनियों की आय में कोई खास बढ़ोतरी नहीं है.
अगर सेक्टर की बात करें तो आईटी ने पिछले कुछ महीनों में निवेशकों को सबसे ज्यादा परेशान किया है. भारी वेटेज वाली सॉफ्टवेयर कंपनियों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का बड़ा असर अभी तक दिखाई नहीं दिया है. इसी वजह से आईटी शेयरों में तेजी गिरावट देखी जा रही है. जनवरी से अब तक Infosys, TCS, HCL Technologies और LTIMindtree Ltd जैसे दिग्गज शेयर 30% तक टूट चुके हैं.
महंगाई बढ़ने का खतरा
अब इस कमजोर माहौल में अगर तेल की कीमतें बढ़ती हैं या सप्लाई चेन प्रभावित होती है, तो कंपनियों की लागत और बढ़ सकती है. भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का लगभग 85% आयात करता है. अगर पश्चिम एशिया से सप्लाई बाधित होती है, तो महंगाई बढ़ेगी, रुपया दबाव में आएगा और कंपनियों का मार्जिन घट सकता है. यही नहीं, भारत के उच्च व्यापार घाटे और बढ़ते ऊर्जा आयात बिल को बड़ा झटका लग सकता है. इस वजह से निवेशक जोखिम के प्रति संवेदनशील हो रहे हैं और बाजार से धीरे-धीरे बाहर निकल रहे हैं.
दरअसल, मिडिल ईस्ट के रणनीतिक समुद्री मार्ग Strait of Hormuz, जहां से वैश्विक तेल का लगभग आधा भाग सप्लाई होता है, लेकिन तनाव बढ़ने से तेल की कीमतें आठ महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं. तेल की बढ़ती कीमतें भारत जैसे आयात-आधारित अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव डालती हैं और मुद्रा, महंगाई और खुदरा कीमतों को प्रभावित कर सकती हैं.
युद्ध गहराने से क्या-क्या चुनौतियां
युद्ध की वजह से कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ती हैं तो भारत को भारी नुकसान हो सकता है. पेट्रोल-डीजल महंगे हो जाएंगे. ट्रांसपोर्ट महंगा हो जाएगा. कंपनियों की लागत बढ़ सकती है. सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है. विदेशी निवेश घट सकता है. महंगाई बढ़ सकती है. अगर महंगाई बढ़ती है तो आम लोगों की खरीदने की ताकत घटती है, जिससे कंपनियों की बिक्री भी कम हो सकती है.
वहीं तमाम बाजार के एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारतीय शेयर बाजार पहले से ही हाई वैल्यूएशन पर चल रहा था. यानी कई कंपनियों के शेयर उनकी कमाई के मुकाबले ज्यादा कीमत पर ट्रेड कर रहे हैं. ऐसे में अगर कोई निगेटिव खबर आती है, तो बाजार में गिरावट गहरा सकता है.
विदेशी निवेशक (FII) भी जोखिम से बचने के लिए पैसे निकाल सकते हैं, जब वे बड़े पैमाने पर बिकवाली करते हैं, तो बाजार में गिरावट और तेज हो जाती है. लेकिन अगर हालात जल्दी सामान्य हो जाते हैं, तो बाजार में स्थिरता लौट सकती है. इसलिए अगले कुछ दिन बाजार के लिए अहम रहने वाला है.
अमित कुमार दुबे