अगर आप पिछले दो वर्षों से शेयर बाजार (Share Market) में निवेश कर रहे हैं या फिर पहले से निवेशित हैं, तो मन में जरूर एक सवाल आता होगा कि इतनी मजबूत अर्थव्यवस्था, रिकॉर्ड SIP और अच्छे नतीजों के बावजूद बाजार वैसी रफ्तार क्यों नहीं पकड़ पा रहा है? बाजार को किसकी नजर लग गई है?
इस सवाल का जवाब पिछले दो साल के आंकड़े दे रहे हैं, और कारण है- (Foreign Institutional Investors- FII). साल 2025 में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII/FPI) ने भारतीय इक्विटी (शेयर बाजार) से कुल करीब 1.58 लाख करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की है. यह उतनी बड़ी बिकवाली है, जो 1990 के बाद रिकॉर्ड स्तर पर है और अब तक का सबसे भारी साल माना जा रहा है.
दरअसल, साल 2025 में FII ने कुल 2,31,990 करोड़ रुपये की शेयर इक्विटी की बिक्री की. लेकिन प्राइमरी मार्केट में खरीदारी के कारण शुद्ध निकासी का आंकड़ा 1,58,407 करोड़ रुपये रहा. साल 2025 के 12 महीनों में से 8 महीनों में FII ने नेट सेल किया, यानी खरीदारी से ज्यादा बिकवाली रही.
विदेशी निवेशक क्यों कर रहे हैं बिकवाली?
अब जरा सोचिए, जब इतना बड़ा पैसा बाजार से बाहर जाएगा, तो असर तो दिखेगा ही. बता दें, साल 2024-25 के दौरान वैश्विक हालात FII के अनुकूल नहीं रहे. अमेरिका और यूरोप में ब्याज दरें ऊंचे स्तर पर बनी रहीं. वहां बॉन्ड और सुरक्षित निवेश अच्छे रिटर्न देने लगे, ऐसे में विदेशी निवेशकों के लिए भारत जैसे उभरते बाजारों में जोखिम लेना कम आकर्षक हो गया. डॉलर की मजबूती ने भी बिकवाली को तेज कर दिया. डॉलर मजबूत हुआ तो एफआईआई ने उभरते बाजारों से पैसा निकालकर अपने देश में ले जाना ज्यादा सुरक्षित समझा.
इसके अलावा, जियो-पॉलिटिकल टेंशन, वैश्विक मंदी की आशंका और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जैसे फैक्टर्स की वजह से FII ने बिकवाली का रास्ता चुना.
DII का रिकॉर्ड निवेश
हालांकि, इस पूरी तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही अहम है. घरेलू संस्थागत निवेशक (DII) और रिटेल निवेशक बाजार के लिए ढाल बनकर खड़े रहे. म्यूचुअल फंड्स की SIP, बीमा कंपनियों और आम निवेशकों की लगातार खरीदारी ने बाजार को टूटने नहीं दिया. यही वजह है कि भारी FII बिकवाली के बावजूद बाजार में बड़ी गिरावट नहीं दिखी. साल 2025 में DII का नेट इनफ्लो करीब 6 लाख करोड़ रुपये का रहा. जो कि अपने आप में एक रिकॉर्ड है. इससे पहले साल 2024 में साल DIIs का निवेश करीब 5.26 लाख करोड़ रुपये का रहा था.
बाजार जानकार मानते हैं कि अगर FII इतनी आक्रामक बिकवाली न करते, तो भारतीय शेयर बाजार नए शिखर पर होता. आर्थिक विकास, सरकारी पूंजीगत खर्च, कॉरपोरेट मुनाफा जैसे फैक्टर्स बाजार के पक्ष में रहा है, लेकिन विदेशी निवेश की कमी ने तेजी को सीमित कर दिया.
अगर बाजार की चाल बात करें तो साल 2025 में मिला-जुला रुख रहा. बाजार की अधिकतर तेजी केवल कुछ चुनिंदा शेयरों तक सीमित रही. ब्राडर मार्केट खासतौर से दबाव में रहा. कुल 2,667 लिस्टेड कंपनियों में से करीब 90 फीसदी शेयर अपने 52-हफ्तों के उच्च स्तर से 20 फीसदी या उससे ज्यादा नीचे कारोबार कर रहे हैं.
आजतक बिजनेस डेस्क