आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब धीरे-धीरे अपना रंग दिखाने लगा है. इसका प्रभाव सिर्फ टेक्नोलॉजी की दुनिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक नौकरी बाजार को झकझोरने लगा है. तमाम रिपोर्ट्स में चेतावनी दी जा रही है कि AI व्हाइट-कॉलर नौकरियों के लिए सुनामी साबित हो सकती है.
दरअसल, पिछले कुछ दिनों से टेक्नोलॉजीज स्टॉक्स में बड़ी गिरावट देखी जा रही है, जिससे शेयर बाजार पर भी दबाव बढ़ गया है. इस बीच Citrini Research के सह-लेखक अलाप शाह का कहना है कि AI की वजह से इकोनॉमी को तगड़ी चोट पहुंचने वाली है. खासकर अमेरिका जैसे देश के लिए बड़ा खतरा है, क्योंकि टेक सेक्टर में ये देश अग्रणी है.
ब्लूमबर्ग टीवी को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि वक्त कम है, लेकिन अगर सरकार चाहे तो बड़े पैमाने पर नौकरियों के विस्थापन से होने वाले आर्थिक नुकसान को कम किया जा सके. उन्होंने कहा कि 'AI जितना अधिक स्मार्ट होता जाएगा, उतनी ही अधिक नौकरियां यह खत्म कर सकता है.'
ऑटोमेशन और जनरेटिव AI टूल्स के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के चलते कंपनियां बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की संख्या घटा सकती हैं. इसी बीच AI से भारी मुनाफा कमाने वाली कंपनियों पर 'विंडफॉल टैक्स' लगाने की मांग भी उठने लगी है, ताकि प्रभावित कर्मचारियों के लिए सुरक्षा और री-स्किलिंग की सुविधा हो सके.
सबसे ज्यादा अमेरिका पर संकट
इस बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की प्रमुख क्रिस्टालिना जॉर्जीवा का कहना है कि AI टेक्नोलॉजी वैश्विक लेबर मार्केट पर सुनामी की तरह असर डाल सकती है. AI आने वाले वर्षों में जॉब मार्केट को पूरी तरह से बदल सकता है. इससे ग्लोबली 40% तक नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं. जबकि विकसित देशों में यह आंकड़ा 60% तक हो सकता है. उनका कहना है कि जहां AI कुछ नौकरियों को बेहतर बना सकता है या उनमें मदद कर सकता है, वहीं कई मिडिल-इनकम वाली नौकरियां और खासकर एंट्री-लेवल जॉब खतरे में हैं.जिसमें डिसीजन मेकर, डेटा प्रोसेसिंग और ग्राहक सेवा शामिल हैं.
Citrini Research की मानें तो जैसे-जैसे कंपनियां AI को अपनाती जाएंगी, वे कर्मचारियों के ऊपर खर्च कम कर सकती हैं, जिससे न सिर्फ नौकरियां कम होंगी, बल्कि उपभोक्ता खर्च भी घट सकता है. ऐसे में अगर कंपनियां और सरकारें पहले से ही इस बदलाव के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं रहीं, तो रोजगार बाजार में बड़े स्तर पर छंटनी (Layoffs) का जोखिम भी बढ़ सकता है.
एक्सपर्ट्स का मानना है कि तकनीक की इस रफ्तार के बीच सरकारों, कंपनियों और नीति-निर्माताओं को पहले से योजना बनानी होगी. केवल नई नौकरी बनाने पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें ट्रेनिंग और खासकर स्कूलिंग लेवल पर बदलाव की जरूरत है.
AI से अतिरिक्त कमाई पर टैक्स लगाए सरकार
अलाप शाह का कहना है कि सरकारों को AI अपनाने से होने वाले अतिरिक्त या असाधारण मुनाफे पर टैक्स लगाने पर विचार करना चाहिए. उनकी दलील है कि अगर कंपनियां कर्मचारियों की जगह AI का इस्तेमाल करके लागत घटाती हैं, तो इससे उपभोक्ता खर्च घट सकता है. अमेरिका जैसी अर्थव्यवस्थाओं में उपभोक्ता खर्च GDP का बड़ा हिस्सा है, इसलिए रोजगार में गिरावट का असर पूरे सिस्टम पर पड़ सकता है. उन्होंने साफ किया कि यह तकनीक पर टैक्स लगाने की बात नहीं है. प्रस्ताव यह है कि AI से होने वाले अतिरिक्त कॉरपोरेट मुनाफे का कुछ हिस्सा वापस अर्थव्यवस्था में लाया जाए, ताकि नौकरी गंवाने वालों की आय का सहारा बन सके.
भारतीय IT कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती
वहीं संपर्क फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष और सीईओ विनीत नायर ने चेतावनी दी है कि यह मान लेना गलत होगा कि एआई खुद ही रोजगार सृजित करेगा, खासकर भारत के आईटी सेक्टर में ऐसा नहीं होने वाला है.AI इंडिया समिट में नायर ने कहा कि अगर आप मानते हैं कि भारतीय आईटी कंपनियां AI की वजह से खुद रोजगार सृजित करेंगी तो आप एक सपना देख रहे हैं.
उन्होंने तर्क दिया कि रोजगार सृजन बड़े पैमाने पर उद्यमिता पर निर्भर करेगा. उन्होंने कहा कि इस माहौल में रोजगार कैसे पैदा करें? तो इसका जवाब है कि रोजगार बड़े पैमाने पर स्टार्टअप से ही आएगा. हम ऐसे नए लोगों का समूह कैसे तैयार करें जो नई तकनीकों के बजाय नई समस्याओं को हल करने की कोशिश कर रहे हों, और अगर हम ऐसा कर पाते हैं तो हम सफल होंगे.
नायर ने एआई क्षमता और डेटा अधिकार को लेकर भी चिंता जताई. भारत में हम कभी भी उत्पाद विकसित नहीं करते हैं, इसलिए हमारे पास विश्व स्तरीय एसएलएम और एलएलएम नहीं हैं. उन्होंने आगाह किया कि घरेलू एआई क्षमता के निर्माण के लिए प्रोत्साहन के बिना भारत को अगले दशक के लिए बेहद महत्वपूर्ण प्रतिस्पर्धात्मक लाभ खोने का खतरा है.
अमित कुमार दुबे