भारत के दो सबसे बड़े शहर दिल्ली और मुंबई, आज न केवल सपनों के शहर हैं, बल्कि जेब पर भारी पड़ने वाले शहरों की लिस्ट में भी सबसे ऊपर हैं. मुंबई भारत का सबसे महंगा शहर बनकर उभरा है, वहीं, देश की राजधानी दिल्ली दूसरे पायदान पर है. चौंकाने वाली बात यह है कि आज के दौर में इन शहरों में 1 लाख रुपये प्रति माह कमाने वाला व्यक्ति भी खुद को 'मिडिल क्लास' की जद्दोजहद से बाहर नहीं निकाल पा रहा है.
मुंबई का सबसे महंगा शहर बने रहने के पीछे सबसे बड़ा कारण है रियल एस्टेट. रिपोर्ट्स बताता हैं कि मुंबई में आवास की लागत दुनिया के कई विकसित शहरों को टक्कर दे रही है. यहां एक साधारण 2BHK फ्लैट का किराया अंधेरी या बांद्रा जैसे इलाकों में 50,000 से 80,000 रुपये तक जा सकता है. एक लाख सैलरी पाने वाला तो घर खरीदने की सोच भी नहीं सकता है.
यह भी पढ़ें: दिल्ली-मुंबई को टक्कर देंगे ये छोटे शहर, बनेंगे रियल एस्टेट का नया 'पावरहाउस'
सैलरी का 40 फीसदी किराये में
मुंबई में रहने के लिए वेतन का 40-50% हिस्सा केवल किराए में चला जाता है. हालांकि लोकल ट्रेन सस्ती है, लेकिन प्राइवेट कैब और ईंधन की कीमतें यहां देश में सबसे अधिक हैं. मुंबई में दूध, तेल और ब्रेड जैसी बुनियादी चीजों की कीमतें दिल्ली या बेंगलुरु की तुलना में 5-7% अधिक हैं.
वहीं दिल्ली में महंगाई बढ़ने की एक बड़ी वजह बदलती लाइफस्टाइल और शिक्षा/स्वास्थ्य की लागत है. दिल्ली-NCR में अच्छी रिहायशी सोसायटियों का रखरखाव और बिजली के बढ़ते दाम मध्यम वर्ग की कमर तोड़ रहे हैं. नाइट फ्रैंक इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में लग्जरी और प्रीमियम हाउसिंग की मांग में 15% की वृद्धि हुई है, जिसने अप्रत्यक्ष रूप से सामान्य संपत्तियों के किराए में भी इजाफा किया है. अगर कोई घर खरीदने की प्लानिंग भी करे तो उसके लिए किफायती घरों के ऑप्शन बेहद कम हैं. 2bhk फ्लैट की कीमत एक करोड़ तक जाती है ऐसे में एक लाख की सैलरी वाला घर लेने के बारे में सोचने से भी कतराने लगा है.
1 लाख की सैलरी कम क्यों पड़ रही है?
मान लीजिए एक व्यक्ति दिल्ली या मुंबई में रहता है और उसकी सैलरी 1,00,000 रुपये है. . मुंबई और दिल्ली में किराया/या ईएमआई ₹35,000- ₹45,000 तक पड़ता है. ग्रॉसरी और बिजली-पानी पर 15,000, 18,000 बच्चों की शिक्षा, 8,000 - ₹12,000 परिवहन/पेट्रोल पर लगता है. साफ है कि 1 लाख की सैलरी पर जीने वाला व्यक्ति महीने के अंत तक बमुश्किल 10,000 रुपये बचा पाता है.
यह भी पढ़ें: सस्ता घर क्या सपना ही रहेगा, बजट से रियल एस्टेट सेक्टर में 'कहीं खुशी, कहीं गम'
मेडिकल इमरजेंसी या किसी बड़े पारिवारिक खर्च की स्थिति में यह बजट पूरी तरह चरमरा जाता है. आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि 'लाइफस्टाइल इन्फ्लेशन' (Lifestyle Inflation) इन शहरों में महंगाई का सबसे बड़ा कारण है. मुंबई जैसे शहर में बाहर खाना, ओटीटी सब्सक्रिप्शन, जिम मेंबरशिप और सोशल नेटवर्किंग पर होने वाला खर्च अब विलासिता नहीं, बल्कि जरूरत बन गया है. रिपोर्ट बताती है कि मुंबई में एक मध्यम वर्ग का परिवार महीने में कम से कम 3-4 बार बाहर खाना खाता है, जिसका औसत खर्च 8,000 से 12,000 रुपये तक होता है.
टियर-II शहरों की ओर पलायन
इस बढ़ती महंगाई का परिणाम यह है कि अब लोग इन महानगरों से ऊबकर पुणे, हैदराबाद, अहमदाबाद और इंदौर जैसे शहरों की ओर रुख कर रहे हैं. पुणे और कोलकाता अभी भी दिल्ली-मुंबई की तुलना में काफी सस्ते हैं. वहां रहने की लागत मुंबई के मुकाबले 20-30% कम है, जबकि जीवन की गुणवत्ता बेहतर है.
aajtak.in