प्रॉपर्टी एजेंट से किराये का घर ले रहे हैं, इन 5 बातों का रखें ध्यान, वरना जेब पर पड़ेगा भारी  

किराए का घर ढूंढना जितना मुश्किल है, उतना ही जोखिम भरा भी, खासकर जब मामला प्रॉपर्टी एजेंट का हो. जल्दबाजी में हम कई जरूरी बातें नजरअंदाज कर देते हैं, जिनका खामियाजा बाद में भारी पड़ता है. घर फाइनल करने से पहले किन बातों पर ध्यान देना जरूरी है? यहां जानिए...

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रेंट एग्रीमेंट में हर छोटी शर्त लिखवाना है बेहद जरूरी (Photo: Pexels) रेंट एग्रीमेंट में हर छोटी शर्त लिखवाना है बेहद जरूरी (Photo: Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 04 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 11:14 AM IST

शहरों की भागदौड़ भरी जिंदगी में एक अच्छा किराए का घर ढूंढना किसी जंग जीतने से कम नहीं है. अक्सर हम ब्रोकर के जरिए घर तो देख लेते हैं, लेकिन जल्दबाजी में कुछ ऐसी बारीकियां छोड़ देते हैं जो बाद में जेब और सुकून दोनों पर भारी पड़ती हैं. अगर आप भी प्रॉपर्टी एजेंट के जरिए आशियाना तलाश रहे हैं, तो घर फाइनल करने से पहले ये 5 बातें जरूर जान लें, ताकि आपकी जेब और सुकून दोनों सलामत रहें.

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1. सिर्फ घर नहीं, मोहल्ला भी परखें

घर कितना भी शानदार क्यों न हो, अगर बेसिक सुविधाएं दूर हैं तो रोजमर्रा की जिंदगी मुश्किल हो जाएगी. खासकर दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में घर फाइनल करने से पहले यह देखना जरूरी है कि मार्केट, हॉस्पिटल और बस-ऑटो स्टैंड जैसे साधन कितने करीब हैं. इसके साथ ही सुरक्षा के लिहाज से इलाके की साख जरूर जांचनी चाहिए. आप वहां रह रहे लोगों या आसपास के दुकानदारों से भी माहौल, पानी की सप्लाई और बिजली की स्थिति के बारे में पूछ सकते हैं, जिससे आपको वहां के रहन-सहन का सही अंदाजा मिल जाएगा.

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2. फ्लैट का बारीकी से मुआयना

ब्रोकर के 'सब चकाचक है' कहने पर यकीन करने के बजाय खुद गहराई से जांच करना बेहतर होता है. घर में कदम रखते ही दीवारों की सीलन, प्लंबिंग की लीकेज और बिजली के स्विच बोर्ड्स को बारीकी से चेक करें. अगर कोई टूट-फूट या खराबी दिखे, तो उसे शिफ्ट होने से पहले ही ठीक करवा लेना चाहिए या फिर रेंट एग्रीमेंट में दर्ज करवा देना चाहिए, ताकि भविष्य में इसकी मरम्मत का बोझ आपकी जेब पर न आए.

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3. सिक्योरिटी डिपॉजिट की शर्तें

अक्सर मकान मालिक और किरायेदार के बीच विवाद की जड़ यही पैसा होता है. मकान मालिक को डिपॉजिट की रकम देने से पहले यह पूरी तरह स्पष्ट कर लें कि यह राशि कितनी होगी और घर छोड़ते समय इसमें से कटौती किन परिस्थितियों में की जाएगी. ध्यान रहे कि डिपॉजिट वापसी की पूरी प्रक्रिया लिखित रूप में होनी चाहिए ताकि बाद में आपको अपने ही पैसों के लिए चक्कर न काटने पड़ें.

4. मेंटेनेंस और यूटिलिटी का हिसाब

मकान का किराया तो तय हो जाता है, लेकिन मेंटेनेंस, बिजली, पानी और गैस जैसे अतिरिक्त खर्चे अक्सर बाद में बजट बिगाड़ देते हैं. फ्लैट फाइनल करने से पहले ही मकान मालिक से वार्षिक और मासिक चार्जेस पर खुलकर चर्चा कर लेनी चाहिए. इसके साथ ही यह भी तय कर लें कि घर की छोटी-मोटी टूट-फूट या सालाना रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी होगी, ताकि बाद में कोई कन्फ्यूजन न रहे.

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5. ब्रोकरेज और ररा (RERA) की जानकारी

ब्रोकर की फीस शहर और इलाके के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है, इसलिए कमीशन की राशि पर शुरुआत में ही बात करना बुद्धिमानी है. आमतौर पर यह एक महीने के किराए के बराबर होती है, लेकिन इसमें मोलभाव की गुंजाइश रहती है. इसलिए, धोखाधड़ी से बचने के लिए हमेशा कोशिश करें कि आपका एजेंट RERA में रजिस्टर्ड हो, क्योंकि इससे आपको कानूनी सुरक्षा मिलती है और काम भी पारदर्शिता के साथ होता है.
 

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