उत्तर भारत के कई राज्यों में मौसम ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं. अभी तो यह सिर्फ शुरुआत है, आने वाले कई महीने भीषण लू और तपती गर्मी के नाम रहने वाले हैं. ऐसे में हमारे घर किसी 'भट्टी' से कम नहीं लगते. राहत पाने के लिए हम दिन-रात एसी चलाते हैं, जिसका नतीजा महीने के अंत में करंट मारने वाले बिजली बिल के रूप में सामने आता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे पूर्वजों के घर बिना किसी एसी या कूलर के भी ठंडे क्यों रहते थे.
अगर आप नया घर खरीदने या बनाने की सोच रहे हैं, तो थोड़ी सी समझदारी आपको इस आग उगलती गर्मी और भारी बिल दोनों से बचा सकती है. आइए जानते हैं वे पारंपरिक और वैज्ञानिक 'पुराने' फीचर्स, जो आपके आधुनिक घर को कुदरती तौर पर ठंडा रख सकते हैं.
पुराने घरों में खिड़कियां और दरवाजे आमने-सामने होते थे. इसे वैज्ञानिक भाषा में 'क्रॉस वेंटिलेशन' कहा जाता है. आज के फ्लैट्स में अक्सर एक ही तरफ खिड़की होती है, जिससे गर्म हवा घर के अंदर ही कैद होकर रह जाती है.
नया घर देखते समय सुनिश्चित करें कि कमरे में हवा के आने और निकलने का रास्ता अलग-अलग हो. अगर उत्तर और दक्षिण की दिशा में खिड़कियां हैं, तो यह सबसे बेहतर है, क्योंकि भारत में गर्मियों में ठंडी हवाएं इसी दिशा से चलती हैं. इससे गर्म हवा घर में रुकती नहीं है और रात के समय कमरा जल्दी ठंडा हो जाता है, जिससे एसी चलाने की जरूरत कम पड़ती है.
यह भी पढ़ें: घर बैठे कैसे खरीदें दुबई में प्रॉपर्टी, न वीजा की टेंशन और न जाने की जरूरत
ऊंची छतें: गर्मी को ऊपर रखने का तरीका
अगर आपने पुराने सरकारी बंगले या पुश्तैनी हवेलियां देखी होंगी, तो गौर किया होगा कि उनकी छतें 12 से 15 फीट ऊंची होती थीं. आधुनिक निर्माण में लागत बचाने के लिए छत की ऊंचाई 10 फीट या उससे भी कम कर दी गई है. कोशिश करें कि आपके घर की छत की ऊंचाई कम से कम 11-12 फीट हो. चूंकि गर्म हवा हल्की होकर ऊपर की ओर उठती है, इसलिए छत जितनी ऊंची होगी, फर्श के पास रहने वाले लोगों को उतनी ही कम गर्मी महसूस होगी.
पुराने घरों में छतों के पास 'रोशनदान'होते थे, जो ऊपर जमा हुई गर्म हवा को बाहर निकाल देते थे. आधुनिक घरों में अब यह फीचर गायब है, लेकिन इसे फिर से अपनाना समझदारी है.
यह भी पढ़ें: घर खरीदने से पहले जान लें वो छिपे हुए खर्चे, जो बिल्डर आपको नहीं बताता
कुदरती एयर कंडीशनिंग
आधुनिक 'ग्लास फिनिश' वाली इमारतें दिखने में तो अच्छी लगती हैं, लेकिन वे गर्मी को सोख लेती हैं. पुराने घरों में खिड़कियों के ऊपर गहरे छज्जे और दीवारों पर जाली का काम होता था. घर लेते समय देखें कि क्या खिड़कियों के ऊपर पर्याप्त छज्जे हैं, जो दोपहर की सीधी धूप को कांच पर पड़ने से रोकें. जालीदार दीवारें या बालकनी न केवल धूप को फिल्टर करती हैं. सीधी धूप न पड़ने से घर का तापमान 3 से 5 डिग्री तक कम रह सकता है.
आजकल घर पूरी तरह कंक्रीट और ईंटों से बनते हैं, जो दिनभर गर्मी सोखते हैं और रात भर उसे छोड़ते रहते हैं. पुराने समय में चूना, मिट्टी और मिट्टी की खपरैल का उपयोग होता था. घर लेते समय देंखे कि छत पर 'हीट रिफ्लेक्टिव टाइल्स' या 'टेराकोटा' का इस्तेमाल किया है या नहीं.
अगर आप खुद घर बना रहे हैं, तो बाहरी दीवारों के लिए 'हॉलो ब्रिक्स' या 'रैट-ट्रैप बॉन्ड' तकनीक का इस्तेमाल करें. ये ईंटें बीच में हवा की एक परत छोड़ती हैं, जो बाहर की गर्मी को अंदर आने से रोकती है. यह तकनीक घर के अंदर के तापमान को स्थिर रखती है, जिससे एसी को कम मेहनत करनी पड़ती है.
यह भी पढ़ें: ईंट-सीमेंट की छुट्टी! ₹1.5 लाख में बनेगा अपना घर, भूकंप भी बेअसर
भारतीय वास्तुकला का सबसे बड़ा वरदान 'आंगन' था. यह घर का फेफड़ा होता था जो गर्म हवा को ऊपर फेंककर ठंडी हवा को कमरों में भेजता था. आज के छोटे फ्लैट्स में आंगन मुमकिन नहीं, लेकिन आप 'बफर जोन' देख सकते हैं. क्या घर के चारों तरफ या बालकनी में पेड़-पौधे लगाने की जगह है. क्या सोसायटी में 'ग्रीन कवर' अच्छा है. कंक्रीट की तुलना में पौधों वाली जगह काफी ठंडी होती है. अगर आपकी बालकनी में सघन पौधे हैं, तो अंदर आने वाली हवा का तापमान 2-3 डिग्री तक कम हो सकता है.
अगर हम अपने घर के डिजाइन में पारंपरिक सुधारों को शामिल कर लें, तो न केवल हम अपनी सेहत सुधारेंगे बल्कि पर्यावरण को भी बचाएंगे.
यह भी पढ़ें: स्पेन में मिल रहा है मुफ्त में घर, जॉब का भी ऑफर, बस पूरी करनी होगी एक शर्त
aajtak.in