दुबई में मकान मालिक नहीं कर सकता है मनमानी, किराएदारों को हैं ये अधिकार

दुबई में एक किरायेदार के रूप में आपकी सबसे बड़ी ताकत आपकी जानकारी है. यहां के नियम मनमानी बढ़ोतरी को रोकते हैं और एक पारदर्शी माहौल देते करते हैं.

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दुबई में खरीदारों के पास है कई अधिकार (Pixabay) दुबई में खरीदारों के पास है कई अधिकार (Pixabay)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 10 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 4:00 PM IST

दुबई सपनों का वो शहर जहां दुनिया भर से लोग घूमने के लिए आते हैं और जिनके जेब में पैसा होता हो वो अपना घर तक बना लेता है. यहां की आबादी का एक बड़ा हिस्सा प्रवासी है, जो किराए के घरों में रहते हैं. यहां की रियल एस्टेट मार्केट को विनियमित करने के लिए दुबई सरकार ने सख्त कानून बनाए हैं.

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अगर आपका मकान मालिक लीज के बीच में किराया बढ़ाने की कोशिश कर रहा है या मनमाने ढंग से बढ़ोतरी की मांग कर रहा है, तो आपको घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि कानून पूरी तरह से किरायेदारों के पक्ष में खड़ा है. दुबई के रेंटल नियम, विशेष रूप से 2013 का डिक्री संख्या 43 और 2008 का कानून संख्या 33, यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी भी पक्ष के साथ अन्याय न हो.

दुबई के कानून के अनुसार, कोई भी मकान मालिक चालू अनुबंध के दौरान किराया नहीं बढ़ा सकता है. किराए में किसी भी प्रकार की वृद्धि केवल लीज की अवधि समाप्त होने पर, यानी नवीनीकरण के समय ही संभव है. कानून ने इस वृद्धि पर भी एक 'सीलिंग' या अधिकतम सीमा तय की है. किसी भी स्थिति में किराया 20 प्रतिशत से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता. यह वृद्धि कितनी होगी, यह पूरी तरह से रियल एस्टेट रेगुलेटरी एजेंसी के रेंटल इंडेक्स पर निर्भर करता है. मकान मालिक को यह सुनिश्चित करना होता है कि प्रस्तावित वृद्धि दुबई लैंड डिपार्टमेंट (DLD) द्वारा उस विशेष क्षेत्र के लिए निर्धारित सीमा के भीतर हो.

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नोटिस की अवधि और पारदर्शिता

नियमों का एक सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा 90 दिनों का नोटिस पीरियड है. अगर मकान मालिक अगले साल के लिए किराया बढ़ाना चाहता है, तो उसे वर्तमान अनुबंध समाप्त होने से कम से कम 90 दिन पहले किरायेदार को औपचारिक रूप से सूचित करना अनिवार्य है. अगर मकान मालिक इस समय सीमा का पालन नहीं करता है, तो वह कानूनी रूप से किराया बढ़ाने का हकदार नहीं है. इसके अलावा, किराया तय करते समय केवल बाजार भाव ही नहीं, बल्कि संपत्ति की भौतिक स्थिति, इलाके में मौजूद समान इकाइयों का मूल्य और अमीरात की वर्तमान आर्थिक स्थितियों को भी आधार बनाया जाता है.

विवाद सुलझाने की प्रक्रिया 

अक्सर ऐसी स्थितियां आती हैं जहां मकान मालिक और किरायेदार किराए की राशि पर सहमत नहीं हो पाते. ऐसे मामलों में, मामला बीच में नहीं लटकता. दुबई में 'रेंटल डिस्प्यूट सेंटर' (RDC) या ट्रिब्यूनल एक निर्णायक भूमिका निभाता है. अगर आपसी बातचीत विफल रहती है, तो किरायेदार ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटा सकते हैं. ट्रिब्यूनल सभी तथ्यों, जैसे संपत्ति की गुणवत्ता और RERA कैलकुलेटर की जांच करने के बाद एक 'उचित किराया' निर्धारित करता है, जो दोनों पक्षों के लिए बाध्यकारी होता है.

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अगर आप अपने अधिकारों को जानते हैं और समय पर कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हैं, तो आप किसी भी अनुचित वित्तीय दबाव से बच सकते हैं. नवीनीकरण के समय हमेशा RERA रेंटल कैलकुलेटर की जांच करें और सुनिश्चित करें कि हर बदलाव लिखित और कानूनी दायरे में हो.

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