देश में किफायती घरों की भारी कमी, 4.5 लाख प्रोजेक्ट्स सालों से अटके

देश में किफायती घरों का संकट लगातार गहराता जा रहा है, जहां एक तरफ मांग के बावजूद बाजार में इनकी हिस्सेदारी 26% से घटकर सिर्फ 10% रह गई है. यह स्थिति तब है जब साल 2030 तक भारत को 2.5 करोड़ अतिरिक्त सस्ते घरों की आवश्यकता होगी.

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₹40 लाख से कम वाले घरों का मार्केट 26% से घटकर हुआ 10% (Photo-ITG) ₹40 लाख से कम वाले घरों का मार्केट 26% से घटकर हुआ 10% (Photo-ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 21 मई 2026,
  • अपडेटेड 4:40 PM IST

देश में किफायती घरों का संकट लगातार गहराता जा रहा है, जहां एक तरफ मांग के बावजूद बाजार में इनकी हिस्सेदारी 26% से घटकर सिर्फ 10% रह गई है. ANAROCK Capital की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इस समय देश भर के 1,500 से अधिक प्रोजेक्ट्स में 4.5 लाख से ज्यादा बजट घर सालों से अटके पड़े हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए करीब ₹55,000 करोड़ के वित्तीय सहयोग की जरूरत है. 

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लेकिन बड़े निवेशकों और डेवलपर्स का ध्यान अब प्रीमियम और लग्जरी प्रोजेक्ट्स की तरफ ज्यादा है. ANAROCK Capital की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, देश के रियल एस्टेट सेक्टर को अगले 10 सालों में लगभग ₹50 लाख करोड़ ($600 बिलियन) की भारी-भरकम पूंजी की आवश्यकता होगी.

यह अनुमान इस सेक्टर की महत्वाकांक्षी विकास योजनाओं को देखते हुए लगाया गया है, जिसके तहत भारतीय रियल एस्टेट बाजार का लक्ष्य साल 2030 तक 1 ट्रिलियन डॉलर ($1 Trillion) और साल 2047 संभावित रूप से 5 से 7 ट्रिलियन डॉलर का विशाल बाज़ार बनना है. 

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इंडियाज़ रियल एस्टेट फाइनेंस ट्रांसफॉर्मेशन स्टोरी’ (Powering the Next Decade: India’s Real Estate Finance Transformation Story) शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि कैसे भारत का रियल एस्टेट फाइनेंसिंग इकोसिस्टम एक बड़े संरचनात्मक बदलाव से गुजर रहा है.

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यह सेक्टर पहले के बिखरे हुए और एनबीएफसी के नेतृत्व वाले मॉडल से निकलकर अब अधिक संस्थागत, विनियमित (और विविध पूंजी बाजार की ओर बढ़ रहा है, जिसे बैंकों, एआईएफ (AIFs), रीट्स (REITs), प्राइवेट क्रेडिट और सरकार समर्थित पहलों द्वारा संचालित किया जा रहा है. 

इस सेक्टर की बड़ी चुनौती

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का होम लोन बाजार अभी ही ₹38 लाख करोड़ से ज्यादा का हो चुका है. उम्मीद है कि अगले कुछ सालों में (2029-30 तक) यह 15% की सालाना रफ्तार से बढ़कर करीब ₹77 लाख करोड़ तक पहुंच जाएगा, देश में रियल एस्टेट को मिलने वाले कुल पैसे में सबसे बड़ा हिस्सा आम लोगों द्वारा लिए जाने वाले होम लोन का ही है.

चुनौती यह है कि क्या यह पैसा बड़े बिल्डरों और बड़े शहरों से आगे निकलकर छोटे बिल्डरों, किफायती मकानों और छोटे शहरों तक पहुंच पाएगा या नहीं. रिपोर्ट में इस बात पर रेखांकित किया गया है कि संस्थागत निवेशकों की बढ़ती भागीदारी के बावजूद, किफायती आवास अभी भी भारत के प्रॉपर्टी बाजार का सबसे बड़ा ऐसा क्षेत्र है जहां फंड की सबसे ज्यादा कमी है. एक अनुमान के मुताबिक, साल 2030 तक भारत को 2.5 करोड़ (अतिरिक्त किफायती घरों की जरूरत होगी, जबकि इस सेगमेंट में घरों की सप्लाई लगातार घट रही है.

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अगर आंकड़ों को देखें, तो ₹40 लाख से कम कीमत वाले घर साल 2021 में लॉन्च हुए कुल नए प्रोजेक्ट्स का 26% थे, जो साल 2026 की पहली तिमाही (Q1 2026) में घटकर सिर्फ 10% रह गए हैं. दूसरी ओर, ₹1.5 करोड़ से अधिक कीमत वाले प्रीमियम और लग्जरी घरों की हिस्सेदारी नए लॉन्चेस में बढ़कर 53% हो गई है.

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि देश भर के 1,500 से अधिक प्रोजेक्ट्स में 4.5 लाख से ज्यादा किफायती और मध्यम-आय वाले घर अभी भी अटके हुए हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए करीब ₹55,000 करोड़ की वित्तीय सहायता की जरूरत है. हालांकि, सरकार समर्थित स्वामी फंड (SWAMIH Fund) की पहलों से अब तक लगभग 58,600 घरों को पूरा करने में मदद मिली है, और इसके जरिए कुल मिलाकर 1 लाख से अधिक घरों को पूरा करने में मदद मिलने की उम्मीद है.

दूसरी ओर, कमर्शियल रियल एस्टेट की बात करें, तो इस क्षेत्र को कर्ज देने में बैंकों का दबदबा बरकरार है. कुल कमर्शियल रियल एस्टेट लोन में बैंकों की हिस्सेदारी लगभग 56% है, जो करीब ₹5.2 लाख करोड़ होने का अनुमान है. हालांकि, इस तरह के कुल कर्ज का लगभग 80% हिस्सा सिर्फ तीन बड़े क्षेत्रों मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन (MMR), दिल्ली-एनसीआर (NCR) और बेंगलुरु में ही केंद्रित है.

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