नोटबंदी के दौरान पूरा देश एटीएम व बैंक की लाइन पर लगा था. 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट बंद होने के बाद उन्हें बदलने के लिए ये कतारें लग रही थीं. लेकिन यह पहली बार नहीं था कि जब लोग एटीएम और बैंक की लाइन में खड़े हुए.
इससे पहले 2008 में कुछ ऐसा ही माहौल पैदा हुआ था. हालांकि नोटबंदी के
मुकाबले भीड़ कुछ कम थी. इस दौरान आईसीआईसीआई बैंक के ग्राहकों ने बड़ी
संख्या में अपने खातों से पैसे विद्ड्रॉ करना शुरू कर दिया. हालात ये हो गए
कि बैंक को बड़ी मात्रा में कैश मंगाना पड़ा.
सितंबर, 2008 को अमेरिका की सबसे बड़ी वित्तीय फर्म में से एक लेहमन ब्रदर्स ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया. 2008 में शुरू हुई मंदी का ने पूरी दुनिया पर असर डाला. हालांकि भारत में इसका सबसे ज्यादा असर आईसीआईसीआई बैंक पर दिखा.
दरअसल आईसीआईसीआई बैंक का इस दौरान ग्लोबल बिजनेस पर ज्यादा फोकस था. ऐसे में अफवाह उड़ने लगी कि आईसीआईसीआई बैंक दिवालिया हो जाएगा. इसकी वजह से लोगों ने बैंक से अपने पैसे निकालने शुरू कर दिए.
फोर्ब्स ने 30 सितंबर, 2008 को इस संबंध में एक खबर छापी थी. इसमें बताया गया है कि किस तरह इस अफवाह के फैलने के बाद लोगों ने अपने पैसे निकालने शुरू कर दिए. हालात इतने बद्तर हो गए कि भारतीय रिजर्व बैंक को दखल देना पड़ा.
आरबीआई ने ग्राहकों को भरोसा दिलाया कि आईसीआईसीआई बैंक के पास लिक्विडिटी अथवा कैश की कोई कमी नहीं है. हालांकि जब तक केंद्रीय बैंक की तरफ ये आश्वासन दिया गया, तब कई लोग अपना पैसा यहां से निकाल चुके थे.
बैंक की सीईओ चंदा कोचर ने इस दौरान बैंक को संभालने की खातिर ग्लोबल बिजनेस से अपना फोकस हटाया और रीटेल बिजनेस पर ध्यान देना शुरू किया. इससे बैंक संभल गया. (सभी फोटो प्रतीकात्मक)