Explainer: कितना बड़ा संकट... सिर्फ होर्मुज से हुई LPG की दिक्‍कत, फिर पेट्रोल-डीजल पर असर क्‍यों नहीं? जानिए सबकुछ

स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से LPG को लेकर ही दिक्‍कत क्‍यों हुई, पेट्रोल-डीजल पर इसका असर क्‍यों नहीं हुआ? इसके पीछे कई कारण हैं. इस खबर में हर एक फैक्‍टर को विस्‍तार से समझाया गया है.

Advertisement
स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज. (Photo: AI Generated/ITG) स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज. (Photo: AI Generated/ITG)

सुशीम मुकुल

  • नई दिल्‍ली,
  • 14 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 3:48 PM IST

मिडिल ईस्‍ट में चल रहे जंग के बीच भारत की LPG आपूर्ति चेन बुरी तरह से प्रभावित हुई है. गैस स्‍टेशनों पर सिलेंडर भरवाने के लिए लंबी कतारें लगी हैं. दर्जनों रेस्‍टोरेंट और ढाबे बंद हो गए हैं और घरों में लोग बुकिंग के लिए कई दिनों का इंतजार कर रहे हैं. लेकिन यह स्थिति क्‍यों पैदा हुई, जिसका जवाब क्‍या सिर्फ 'स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज' का बंद होना है? 

Advertisement

जंग के कारण यह रास्‍ता बंद है. यहीं से ग्‍लोबल एनर्जी का 20 फीसदी हिस्‍सा होकर गुजरता है. यह जीवाश्म ईंधन का प्रमुख निर्यातक भी है. इस रास्‍ते से होते हुए एनर्जी भारी मात्रा में भारत आती है, LPG, LNG और क्रूड ऑयल भारत के लिए इस रास्‍ते से 50 फीसदी से ज्‍यादा आते रहे हैं. ऐसे में यह भी सवाल खड़ा होता है कि LPG पर ही क्‍यों इतना दबाव दिखाई दिया, जबकि पेट्रोल-डीजल पर इसका कोई असर नहीं हुआ, इसके दाम भी नहीं बढ़े और लोगों को आसानी से मिल भी जा रही हैं? 

LPG को लेकर फैली दहशत 
एलपीजी गैस सिलेंडरों को लेकर 9 मार्च से शुरू हुई दहशत अब कई गुना बढ़ गई है. 12 मार्च से कुछ सीएनजी, डीजल और पेट्रोल स्टेशनों पर लगी लंबी कतारों में इस डर का असर साफ दिखाई दिया, हालांकि, ऐसे मामले बहुत कम थे. सरकार का कहना है कि पेट्रोलियम ईंधन की पर्याप्त आपूर्ति है, जिसे रिफाइन करके पेट्रोल और डीजल बनाया जाता है.

Advertisement

क्‍यों एलपीजी पर दिखा इतना दबाव? 
एलपीजी के मामले में भी सरकार ने दोहराया है कि घरेलू क्षेत्र में आपूर्ति में कोई बाधा नहीं आएगी. सड़कों पर फैली अफरा-तफरी, जिसमें लंबी कतारें, हाथापाई और सिलेंडर वितरण में देरी को लेकर केंद्र सरकार ने कहा कि यह अचानक बढ़ी डिमांड और पैनिक सिचुएशन के कारण है. सरकार ने स्थिति को कंट्रोल करने के लिए घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता दिया है और कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों की बिक्री रोक दी गई है. इसके साथ ही, काला बाजार में एलपीजी रिफिल की बढ़ती कीमतों के कारण कई भोजनालय बंद हो गए हैं. 

इसलिए जब फारस की खाड़ी में होर्मुज पर यातायात की गति तेज हुई, तो एलपीजी की आपूर्ति पर सबसे पहले इसका असर पड़ा. भारत के रसोई घरों ने पेट्रोल पंपों और निजी कारों से पहले इस तनाव को महसूस किया. 

शुक्रवार शाम को लिए गए लाइव शिपिंग मैप के स्क्रीनशॉट में फारस की खाड़ी में होर्मुज जलडमरूमध्य के दोनों ओर जहाजों और मालवाहक पोतों की कतारें दिखाई दे रही हैं, जिनमें से कुछ ही मार्ग से गुजर रहे हैं. (Photo: Marinetraffic)

भारत में LPG की आपूर्ति पर होर्मुज का क्या प्रभाव?
पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक, भारत हर साल 31 मिलियन टन से ज्‍यादा LPG की खपत करता है. घरेलू उत्‍पादन इस मांग के आधे से भी कम की पूर्ति करता है. बाकी की पूर्ति सऊदी अरब, कतर, संयुक्‍त अरब अमीरात और कुवैत जैसे खाड़ी देशों से आयात द्वारा की जाती है. इस कारण इस फ्यूल को ले जाने वाले टैंकरों को भारत पहुंचने से पहले होर्मुज से होकर गुजरना पड़ता है, लेकिन भारत की एलपीजी खेपों का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है. मीडिया में अनुमान लगाया गया है कि भारत जाने वाले एलपीजी कार्गो का लगभग 80-90% हिस्सा 'स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज' से होकर गुजरता है. 

Advertisement

पेट्रोल-डीजल के आयात पर क्या असर?
वहीं कच्‍चे तेल की बात करें तो भारत 40 से अधिक देशों से कच्चे तेल का आयात करता है. हाल के सालों में रूस सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है, जिसके बाद इराक और सऊदी अरब का स्थान आता है. रूसी कच्चे तेल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होर्मुज से होकर न गुजरने वाले मार्गों से भारत पहुंचता है. केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि भारत के कच्चे तेल के आयात का 70% हिस्सा अब होर्मुज के बाहर के सोर्स से आता है.

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने हाल ही में रूस से 30 मिलियन बैरल कच्चा तेल खरीदा है, क्योंकि संयुक्त राज्य अमेरिका ने 30 दिनों की छूट जारी की थी. इसके बाद समुद्र में फंसे हुए तेल के शिपमेंट खरीदने की अनुमति मिल गई थी. कच्चे तेल के आने के बाद, भारतीय रिफाइनरियां इसे पेट्रोल, डीजल और अन्य ईंधनों में परिवर्तित करती हैं. देश में घरेलू मांग की तुलना में अतिरिक्त रिफाइनिंग की क्षमता भी है. इससे रिफाइनरों को आपूर्ति पैटर्न में बदलाव होने पर उत्पादन को समायोजित करने में कुछ लचीलापन मिलता है. 

इसके साथ ही भारत कच्चे तेल के लिए रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार रखता है. ये भूमिगत भंडारण सुविधाएं अचानक आपूर्ति में होने वाली बाधाओं से निपटने के लिए बनाई गई हैं. भारत विशाखापत्तनम, मंगलौर और पादुर में स्थित भूमिगत चट्टानी गुफाओं में आपातकालीन स्थितियों के लिए कच्चा तेल भंडारित करता है. रिफाइनरियों और तेल कंपनियों (OMC) के पास मौजूद कमर्शियल भंडारों के साथ मिलकर, ये भंडार कई हफ्तों की खपत को पूरा कर सकते हैं.

Advertisement
भारत अपनी एलपीजी की मांग को पूरा करने के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर है। 2024-25 में हुए इन आयातों में से 92% मध्य पूर्व से आए, जिनमें संयुक्त अरब अमीरात (40%), कतर (22%), सऊदी अरब (15%) और कुवैत (15%) का स्थान प्रमुख है. (Photo: DIU/India Today)

यह बफर भारतीय फ्यूल स्‍टेशनों पर पेट्रोल और डीजल की तत्‍काल कमी को कुछ समय के लिए हटा देता है, लेकिन LPG ज्‍यादा असुरक्षित रहता है. सवाल यह भी है कि क्‍या होर्मुज बंद होना ही भारत के नेचुरल गैस की आपूर्ति पर पड़ रहे दबाव का एकमात्र कारण है? 

एलपीजी संकट की वजह सिर्फ होर्मुज ही है? 
कच्चे तेल के विपरीत, भारत में LPG के भंडारण की क्षमता सीमित है. भारत कच्चे तेल के भंडारों की तरह एलपीजी के बड़े रणनीतिक भंडार नहीं रखता है. अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार , मंगलुरु और विशाखापत्तनम में एलपीजी के भंडार हैं , लेकिन उनकी कुल क्षमता 1.4 लाख टन है, जो दो दिनों की खपत से भी कम है.

भारत की गैस प्रणाली भंडारण के बजाय निरंतर प्रवाह के लिए डिज़ाइन की गई है. भारतीय गैस एजेंसी (IEA) ने अपनी इंडिया गैस मार्केट रिपोर्ट-आउटलुक टू 2030 में बताया है कि देश में वर्तमान में भूमिगत गैस भंडारण सुविधाओं की कमी है और इसकी एलएनजी भंडारण क्षमता केवल लगभग 1.9 बीसीएम (लगभग 1.9 क्यूबिक मीटर) तक सीमित है. 

Advertisement

आईईए ने फरवरी 2025 की रिपोर्ट में कहा कि 4 बीसीएम तक की प्रारंभिक भूमिगत गैस भंडारण क्षमता की अनुमानित लागत 1-2 बिलियन डॉलर है, और परियोजना की मंजूरी के बाद निर्माण में 3-4 साल लगने की उम्मीद है. एलपीजी भंडारण टर्मिनल और बोतल भरने वाले प्‍लांट मुख्य रूप से नियमित आपूर्ति सर्किल को संभालते हैं. एक अन्य कारक यह है कि केंद्र सरकार की योजनाओं के बाद पिछले दशक में एलपीजी सिलेंडरों की मांग में भी भारी बढ़ोतरी हुई है. 

केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने लाखों ग्रामीण परिवारों को खाना पकाने की गैस तक पहुंच प्रदान की. इस कारण देशभर में एलपीजी कनेक्शनों की संख्या 33 करोड़ से अधिक हो गई. ये संख्या 2010 में लगभग 10.6 करोड़ से बढ़कर 2014 में 14.5 करोड़ हो गई और फिर 2018 में 22.4 करोड़ से बढ़कर 2025 तक लगभग 33 करोड़ हो जाएगी.

लकड़ी और बायोमास से एलपीजी की ओर यह बदलाव सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक बड़ी सफलता है, लेकिन इसका यह भी मतलब है कि भारत की रसोई कोकिंग ईंधन की निरंतर आपूर्ति पर बहुत अधिक निर्भर करती है.

भारत एलपीजी की स्थिति को संभालने के लिए क्या प्रयास कर रहा है?
केंद्र सरकार और गैस कंपनियों ने एलपीजी की उपलब्धता को स्थिर करने के लिए आपातकालीन उपाय शुरू कर दिए हैं.

Advertisement

रिफाइनरियों को कच्चे तेल के रिफाइन से एलपीजी की अधिकतम रिकवरी करने के लिए कहा गया है. प्रोपेन और ब्यूटेन जैसे कुछ पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक स्ट्रीम को भी अस्थायी रूप से अधिक खाना पकाने की गैस के उत्पादन के लिए डायवर्ट किया जा रहा है.

सरकार खाड़ी देशों के बाहर के आपूर्तिकर्ताओं से भी अतिरिक्त माल की आपूर्ति की तलाश कर रही है. हालांकि, इन खेपों को पहुंचने में अधिक समय लगेगा और लागत भी अधिक हो सकती है. इसलिए, कमर्शिलय उपयोग की तुलना में घरेलू उपभोग को प्राथमिकता दी जा रही है.

केंद्र सरकार ने कहा कि फिलहाल डीजल और पेट्रोल पंपों पर पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, लेकिन गैस स्टेशनों के बाहर सिलेंडरों के लिए लगी लंबी कतारें दिखाती हैं कि वैश्विक भू-राजनीति कितनी जल्दी दूर-दराज के समुद्रों से भारतीय रसोई तक पहुंच सकती है.

तो, होर्मुज जलप्रपात के कारण पेट्रोल या डीजल की बजाय एलपीजी की आपूर्ति पर सबसे पहले असर क्यों पड़ा, इसका जवाब भारत में अलग-अलग ईंधनों की सोर्स और भंडारण व्यवस्था पर निर्भर करता है. इसका एक कारण पिछले दशक में भारतीयों के बीच एलपीजी कनेक्शनों में हुई भारी वृद्धि और भारत में प्राकृतिक गैस भंडारण की सीमित क्षमता भी है. 

इसके अलावा, एलपीजी का आयात मुख्य रूप से खाड़ी देशों में फोकस है. इनमें से अधिकांश आयात होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. वहीं, पेट्रोल और डीजल कच्चे तेल से प्राप्त होते हैं, जिसे भारत कई अन्य आपूर्तिकर्ता देशों से खरीदता है. साथ ही, प्राकृतिक गैस के विपरीत, भारत के पास कच्चे तेल का बड़ा भंडार है. इस भंडार के कारण ऑटोमोबाइल ईंधन पर तत्काल प्रभाव नहीं पड़ता है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement