पुरानी कहावत है- दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है. चीन और अमेरिका के बीच कुछ इसी तरह का खेल चल रहा है. चीन और ताइवान के बीच भी तनाव चरम पर है. दोनों देशों की सीमाओं पर सैन्य गतिविधियां बढ़ गई हैं. रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि ताइवान सीमा के नजदीक चीन ने 34 लड़ाकू विमान और 11 युद्धपोत तैनात कर दिए हैं. यानी स्थिति बेहद तनावपूर्ण है, लेकिन इस तनाव के बीच ताइवान और अमेरिकी की दोस्ती नई कहानी लिख रही है. वैसे भी चीन को चिढ़ाने के लिए अमेरिका कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा है. ताइवान को हर तरह से समर्थन देकर अमेरिका दरअसल चीन पर दबाव बनाना चाहता है. अमेरिकी समर्थन की वजह से ताइवान भी चीन से डटकर मुकाबला कर रहा है.
इस बीच अमेरिका ने ताइवान के साथ ट्रेड डील (Trade Deal) को अंतिम रूप दे दिया है. जिसका एलान 16 जनवरी को कर दिया गया. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस डील को ऐतिहासिक करार दिया है. यह डील करीब 250 अरब डॉलर के निवेश पर आधारित है और इसका उद्देश्य- दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी और रणनीतिक सहयोग को मजबूत करना है.
सेमीकंडक्टर इंडस्ट्रीज में सबसे आगे ताइवान
दरअसल, अमेरिका और ताइवान के बीच हुआ यह समझौता मुख्य रूप से सेमीकंडक्टर (चिप्स) और हाई टेक्नोलॉजी सेक्टर पर केंद्रित है. बता दें, दूसरे कार्यकाल के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने सबसे पहले ताइवान से आने वाली कई वस्तुओं पर 32% तक टैरिफ लगाया था, फिर बातचीत के बाद इसे घटाकर 20% कर दिया गया.
लेकिन अब इस नए समझौते के तहत केवल 15% टैरिफ पर सहमति बन गई है, जो जापान और दक्षिण कोरिया के साथ अमेरिका के कारोबारी साझेदारों पर लागू दर के बराबर है. यानी अब ताइवानी प्रोडक्ट्स पर केवल 15 फीसदी अमेरिकी टैरिफ लगेगा. समझौते के तहत ताइवान की कंपनियां 250 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष निवेश अमेरिका में करेंगी. जो कि सेमीकंडक्टर, एनर्जी और टेक्नोलॉजी सेक्टर में होगा.
इसके अलावा अमेरिका ने कुछ ताइवानी प्रोडक्ट्स को टैरिफ मुक्त करने यानी उनपर शून्य टैरिफ लगाने का भी एलान किया है. जिसमें मुख्यतौर पर जेनरिक फार्मा, एयरक्राफ्ट कंपोनेंट्स और कुछ प्राकृतिक संसाधन हैं.
अमेरिका-ताइवान में डील से चीन बिफरा
अमेरिकी वाणिज्य मंत्रालय ने कहा है कि इस समझौते से अमेरिका में घरेलू उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा. साथ ही ताइवान द्वारा अमेरिका में इंडस्ट्रीज लगाने पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे. ताइवान सरकार ने भी इसे दोनों देशों के बीच रणनीतिक सहयोग को गहरा करने वाला कदम बताया है.
हालांकि चीन ने अमेरिका-ताइवान के बीच इस डील पर नाराजगी जाहिर की है. उसने इसे अपनी संप्रभुता के खिलाफ बताया है, क्योंकि वह ताइवान को अपना हिस्सा मानता है. इससे चीन-अमेरिका के बीच जारी तनाव और बढ़ सकता है, खासकर सेमीकंडक्टर आपूर्ति और तकनीकी प्रतिस्पर्धा को लेकर. इस समझौते के साथ ही, अमेरिका ने हाल ही में ताइवान को करीब 11 अरब डॉलर के हथियार और सैन्य उपकरण बेचने की भी घोषणा की थी, जिससे चीन ने और कड़ा रुख अपनाया था. हालांकि चीन और ताइवान के बीच अच्छा खासा कारोबार होता है.
बता दें, ताइवान दुनिया के सबसे हाईटेक सेमीकंडक्टर चिप्स का प्रमुख उत्पादक है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है और चीन को ताइवान पर नजर रखने का एक अहम कारण है. सैन्य ताकत में चीन के मुकाबले ताइवान काफी कमजोर है. लेकिन ताइवान अमेरिका से हथियार खरीदता है, जिससे उसकी रक्षा क्षमता बढ़ती है.
अमित कुमार दुबे