पाकिस्तान में ईरान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता होने जा रही है. पाकिस्तान इस बातचीत में मध्यस्थता की भूमिका निभा रहा है, लेकिन इसे ईरान और इजरायल से फटकार भी मिली है. इजरायल ने तो इसे 'नाकाबिल और अविश्वसनीय' मध्यस्थ बता दिया है. वहीं ईरान भी इसे समय-समय पर फटकार लगाता रहा है. ईरान भी इसे आतंकवादी ठिकानों का पहनागार मानता है.
विरोध के बाद भी अमेरिका ने पाकिस्तान को ईरान जंग में शांति वार्ता के लिए एक चुना है, लेकिन सवाल अब भी है कि पाकिस्तान ही क्यों इस सीजफायर के लिए अमेरिका का मोहरा बना? इसका जवाब अमेरिका पर निर्भरता के तौर पर दिखाई देता है. अमेरिका ने पाकिस्तान को भारी कर्ज दे रखा है, साथ ही पश्चिमी संस्थाओं जैसे आईएमएफ और विश्व बैंक की ओर से लोन देने के फैसले को भी सपोर्ट करते हुए दिखाई दिया है, इसी कारण अमेरिका समय-समय पर पाक से अपनी बातें मनवाता रहता है.
हाल के सालों में पाकिस्तान पर बढ़ते कर्ज और IMF- वर्ल्ड बैंक जैसे संस्थानों पर निर्भरता ने उसकी विदेश नीति की स्वतंत्रता को सीमित किया है. यही वजह है कि कई एक्सपर्ट्स मानते हैं कि क्षेत्रीय तनाव या संघर्ष के समय अमेरिका पाकिस्तान को अक्सर मोहरा की तरह इस्तेमाल करता है.
पाकिस्तान पर भारी कर्ज
ताजा आंकड़ों के मुताबिक, पाकिस्तान का कुल बाहरी कर्ज करीब 138 अरब डॉलर के आसपास है, जो भारतीय रुपये में 11 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा है. वहीं कुल सार्वजनिक कर्ज, जिसमें घरेलू और विदेशी दोनों मिलाकर 286 अरब डॉलर से ज्यादा है.
अमेरिका का पाकिस्तान पर भारी कर्ज
अमेरिका और आईएमएफ जैसी जगहों से पाकिस्तान की भारी निर्भरता रही है. 1948 से अब तक अमेरिका ने पाकिस्तान को लगभग 60–70 अरब डॉलर से अधिक की कुल सहायता (आर्थिक और डिफेंस) दी है. केवल 1947–2006 के बीच ही अमेरिका ने पाकिस्तान को 33.6 अरब डॉलर आर्थिक सहायता और 8.9 अरब डॉलर डिफेंस सपोर्ट दिया था. इसी तरह, 2001 में भी पाकिस्तान को 15 अरब डॉलर की सहायत दी गई थी. साल 2024 में अमेरिका ने पाकिस्तान को करीब 169 मिलियन डॉलर सहायता दी है.
आईएमएफ का पाकिस्तान पर कर्ज
पाकिस्तान की आर्थिक व्यवस्था लंबे समय से IMF, विश्व बैंक और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से मिलने वाले कर्ज पर निर्भर रही है. IMF ने हाल ही में पाकिस्तान को लगभग 3.3 अरब डॉलर की किस्त जारी की है, जो बड़े 7 अरब डॉलर के बेलआउट पैकेज का हिस्सा है. इसके साथ ही विश्व बैंक ने भी आर्थिक स्थिरता के तहत 700 मिलियन डॉलर का फाइनेंस मंजूर किया है.
चीन, अमेरिका और जियो-पॉलिटिकल कंट्रोल
पाकिस्तान पर कर्ज सिर्फ पश्चिमी संस्थानों का ही नहीं है, बल्कि चीन भी उसका बड़ा कर्जदाता रहा है. चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) परियोजनाओं के तहत चीन ने बड़े स्तर पर निवेश और लोन दिया है. ऐसे में जब क्षेत्रीय तनाव की स्थिति बनती है, तो पाकिस्तान पर वैश्विक शक्तियों का दबाव बढ़ जाता है. यही कारण है कि अमेरिका ने पाकिस्तान को मोहरा बनाया है और सीजफायर में इसे इस्तेमाल कर रहा है.
आजतक बिजनेस डेस्क