Gratuity Rules: न्‍यू लेबर कोड में बढ़ जाएगी आपकी ग्रेच्‍युटी... लेकिन फंसा ये बड़ा पेच, जानिए नया नियम

नए लेबर कोड के तहत ग्रेच्‍युटी बढ़ रही है, लेकिन उसके साथ ही एक और चीज में इजाफा हो रहा है, जो आपके इनकम को प्रभावित कर सकता है. आइए जानते हैं क्‍या दिक्‍कत आई है.

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ग्रेच्‍युटी को लेकर आई ये दिक्‍कत. (Photo: File/ITG) ग्रेच्‍युटी को लेकर आई ये दिक्‍कत. (Photo: File/ITG)

आजतक बिजनेस डेस्क

  • नई दिल्‍ली,
  • 17 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 8:21 AM IST

भारत में नए श्रम कानूनों के तहत कई बदलाव किए गए हैं. खासकर जटिल नियम को समझने के लिए आसान बना दिया गया है. साथ ही सैलरी स्‍ट्रक्‍चर, पीएफ और सोशल सिक्‍योरिटी के लिए भी मापदंड़ को पहले की तुलना में सरल बना दिया है. 

वहीं ग्रेच्‍युटी के नियम भी बदल गए हैं. इसके अलावा, ये भी कहा जा रहा है कि कर्मचारियों के ग्रेच्‍युटी में इजाफा भी हो सकता है. लेकिन एक दिक्‍कत ये भी है कि कर्मचारियों को टैक्‍स भी भरना पड़ सकता है. आइए जानते हैं आपको टैक्‍स क्‍यों देना पड़ सकता है. 

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इसे और सरल भाषा में समझें तो पहले ग्रेच्‍युटी का कैलकुलेशन सिर्फ बेसिक + डीए पर होता था, लेकिन नए नियम के तहत अब बेसिक + DA + कुछ अन्य भत्तों को लेकर होगा. इसका सीधा मतलब होगा कि आपकी सैलरी का बेस बढ़ने से ग्रेच्‍युटी भी बढ़ जाएगा. लेकिन दिक्‍कत ये भी है कि टैक्‍स छूट अभी भी पुराने आधार Basic + DA पर ही मिलता है. इसका मतलब है कि आपको ज्‍यादा ग्रेच्‍युटी तो मिलेगी, लेकिन टैक्‍स भी चुकाना पड़ सकता है. 

अगर मान लीजिए आपको पुराने आधार पर ग्रेच्‍युटी 10 लाख रुपये मिलती है और नए आधार पर ग्रेच्‍युटी 15 लाख रुपये मिलती है तो 10 लाख रुपये वाली ग्रेच्‍युटी तो पूरी तरह टैक्‍स फ्री मानी जाएगी, लेकिन 15 लाख रुपये वाली ग्रेच्‍युटी के तहत 5 लाख रुपये टैक्‍स के दायरे में आएगा. 

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एक्‍सपर्ट्स से समझें ये नियम 
आयकर के पूर्व प्रधान आयुक्त ओ.पी. यादव के अनुसार, पहले के पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 के तहत, ग्रेच्युटी की गणना केवल बेसिक पे और महंगाई भत्ते (DA) का उपयोग करके की जाती थी. इस सीमित परिभाषा ने एम्प्लॉयर्स को सैलरी स्ट्रक्चर को इस तरह से ऑप्टिमाइज करने की अनुमति दी कि वे बेसिक पे को ज्‍यादातर कम ही रखते हैं और हाउस रेंट अलाउंस (HRA), बोनस और स्पेशल अलाउंस जैसे भत्तों को ज्‍यादा देते हैं. इस कारण, ग्रेच्युटी की गणना के लिए उपयोग किया जाने वाला वेतन आधार सीमित रहा, जिससे एम्प्लॉयर की देनदारी प्रभावी रूप से कंट्रोल रही. 

नया लेबर कोड इस समीकरण को बदलता है. हालांकि, ग्रेच्युटी का फॉर्मूला सेवा के प्रत्येक पूरे वर्ष के लिए 15 दिनों का वेतन अपरिवर्तित रहता है, लेकिन वेतन की परिभाषा का काफी विस्तार किया गया है. अब इसमें बेसिक पे, DA और रिटेनिंग अलाउंस के साथ-साथ एक खास 50% नियम भी शामिल है. अगर कुल सैलरी में से अलाउंस 50% से ज्‍यादा हो जाते हैं, तो उस अतिरिक्त राशि को वेतन में वापस जोड़ना होगा, जिससे ग्रेच्युटी की गणना के लिए उपयोग किया जाने वाला आधार बढ़ जाएगा. यानी आपकी ग्रेच्‍युटी बढ़ जाएगी. 

ग्रेच्युटी भुगतान
इस बदलाव से ग्रेच्युटी भुगतान में काफी बढ़ोतरी होने की उम्मीद है, खासकर उन कर्मचारियों के लिए जिनकी सैलरी का ज्‍यादातर हिस्‍सा अलाउंस में जाता है. IT, फ़ाइनेंशियल सर्विसेज़ और कॉर्पोरेट रोल जैसे सेक्टर, जहां फ़्लेक्सिबल कंपनसेशन डिज़ाइन आम है, में इसका सबसे ज़्यादा असर देखने को मिल सकता है. लंबे समय तक काम करने पर, सैलरी बेस में थोड़ी सी भी बढ़ोतरी रिटायरमेंट के समय मिलने वाले फायदे में काफी बढ़ोतरी कर सकती है.

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हालांकि, इस बदलाव को दिखाने के लिए टैक्स के नियमों को अभी तक अपडेट नहीं किया गया है. जहां पुराने नियमों के तहत ग्रेच्युटी पर ₹20 लाख तक की छूट मिलती थी, वहीं इनकम-टैक्स के नियम अभी भी सिर्फ़ बेसिक पे और DA के आधार पर ही छूट की गणना करते हैं. इससे लेबर लॉ और टैक्स लॉ के बीच एक टैक्‍स संबंधी दिक्‍कत पैदा होती है. 

यादव ने कहा कि सोशल सिक्योरिटी कोड के तहत ग्रेच्युटी की गणना जिस तरह से की जाती है और मौजूदा इनकम-टैक्स नियमों के तहत उस पर जिस तरह से टैक्स लगाया जाता है, उन दोनों के बीच एक तालमेल की कमी है. इसका नतीजा यह हो सकता है कि कर्मचारियों को कागजों पर तो ज्‍यादा ग्रेच्युटी मिले, लेकिन असल में उन्हें अचानक ज्‍यादा टैक्स का बोझ उठाना पड़े.

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