10% टैरिफ का दर्द यूरोप ही नहीं, अमेरिका भी झेलेगा... जानिए किसे क्‍या होगा नुकसान

अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप के नए टैरिफ से यूरोप को आने वाले समय में नुकसान का सामना करना पड़ सकता है. वहीं अमेरिका में भी यूरोप से आने वाले समानों पर ज्‍यादा चार्ज देना पड़ सकता है. अमेरिका के दवाएं, केमिकल्‍स और ऑटो पार्ट्स महंगे हो सकते हैं.

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ट्रंप के टैरिफ से किसे कितना नुकसान होगा. (Photo: Reuters) ट्रंप के टैरिफ से किसे कितना नुकसान होगा. (Photo: Reuters)

हिमांशु द्विवेदी

  • नई दिल्‍ली,
  • 18 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 6:43 PM IST

अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए अब नाटो के ही सदस्‍य देशों से बैर ले ली है. ट्रंप ने यूरोप के आठ देशों पर 10 फीसदी टैरिफ लगा दिया है और अगर ग्रीनलैंड पर डील फाइनल नहीं होती है तो 1 जून से 25 फीसदी टैरिफ लगाने की धमकी दी है. ट्रंप के इस कदम ने यूरोप और अमेरिका के बीच तनाव जैसी स्थिति पैदा कर दी है. 

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विशेषज्ञों का कहना है कि टैरिफ टेंशन और राजनीतिक मतभेद अगर आगे चलते रहे तो सिर्फ यूरोप को ही नहीं, बल्कि दोनों देशों को इसका सामना करना पड़ेगा. यह असर सीधे तौर पर व्‍यापार,  उद्योग, अर्थव्‍यवस्‍था और ग्‍लोबल आपूर्ति चेन पर पड़ेगा. 

व्यापारिक रिश्तों पर सीधा असर
अमेरिका और यूरोप दुनिया की सबसे बड़ी व्‍यापारिक साझेदार में से एक हैं. हर साल दोनों के बीच हजारों अरब डॉलर का कारोबार होता है, लेकिन हाल के सालों में टैरिफ सब्सिडी और इंडस्‍ट्रियल  पॉलिसी को लेकर विवाद बढ़े हैं. अमेरिका यूरोप को एनर्जी, टेक्‍नोलॉजी और डिफेंस से जुड़े कई आधुनिक चीजें सप्‍लाई करता है, बदले में यूरोप अमेरिका को मशीनरी, ऑटो पार्टस, केमिकल्‍स और फार्मास्‍यूटिकल्‍स उत्‍पाद निर्यात करता है. 

अगर दोनों तरफ से आयात शुल्‍क या प्रतिबंध बढ़ता है तो यूरोपीय कंपनियों की अमेकरिकी बाजार में कंम्‍पटीशन कमजोर हो सकती है, जिसका सीधार असर निर्यात मुनाफे ओर रोजगार पर पड़ सकता है. दूसरी ओर, अमेरिकी कंपनियों को भी यूरोप में महंगे कॉस्‍ट का सामना करना पड़ सकता है, जिससे उनके निर्यात में कमी आ सकती है. 

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एनर्जी को लेकर अमेरिका पर निर्भरता 
रूस पर प्रतिबंध के बाद यूरोप पूरी तरह से अमेरिका पर एनर्जी और क्रूड ऑयल को लेकर निर्भर हो चुका है. रूस से गैस और तेल की सप्लाई घटने के बाद यूरोप अब बड़े पैमाने पर अमेरिकी LNG और क्रूड ऑयल पर निर्भर हो गया है. इससे यूरोप को एनर्जी सेफ्टी तो मिली, लेकिन लागत बढ़ गई. अमेरिकी  LNG और लंबी दूरी से आने वाले क्रूड ऑयल की वजह से यूरोप में एनर्जी कीमतें अस्थिर हैं. 

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिका-यूरोप रिश्तों में तनाव और बढ़ता है, तो ऊर्जा सप्लाई चेन भी रणनीतिक दबाव का हथियार बन सकती है, जिससे यूरोप की अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ सकता है. 

टेक्‍नोलॉजी और डिफेंस पर असर 
एनर्जी के अलावा, अमेरिका यूरोप को सेमीकंडक्टर, AI, डिफेंस सिस्टम और हाई-टेक चिप्स सप्‍लाई करता है, जिसमें अमेरिकी कंप‍नियों का ही दबदबा है. हालांकि यूरोप लंबे समय से इन मामलों में लंबे समय से आत्‍मनिर्भर बनने की बात कर रहा है, लेकिन वह अमेरिका पर ही पूरी तरह से निर्भर है.  अगर दोनों के बीच तनाव बढ़ता है तो इसे एक हथियार के तौर पर इस्‍तेमाल किया जा सकता है. 

बैंक और निवेश पर दबाव  
अगर टैरिफ लंबे समय तक रहता है तो व्‍यापार और उद्योग में सुस्‍ती आ सकती है, जिसका सीधा असर बैंकिंग सेक्‍टर पर पड़ेगा. निर्यात घटने और कंपनियों की आय कम होने से लोन चूक होने का भी खतरा होगा. यूरोपीय बैंकों के लिए अमेरिका-यूरोप तनाव का मतलब- कम निवेश ज्‍यादा रिस्‍क होगा. 

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कितना नुकसान हो सकता है? 
इकोनॉमिक एक्‍सपर्ट्स की बात माने तो अगर यह तनाव सीमित रहता है तो नुकसान कंट्रोल में रहेगा, लेकिन अगर तनाव लंबे समय तक चला तो लंबे समय तक चला तो यूरोप की GDP पर 0.5 से 1% तक दबाव आ सकता है. यूरोप को निर्यात, निवेश और ग्‍लोबल चेन में बने रहने के लिए कीमत चुकानी पड़ सकती है. 

बता दें अमेरिका ने यूरोप के सिर्फ 8 देशों- डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, नीदरलैंड और फिनलैंड पर टैरिफ लगाया है. ये देश ग्रीनलैंड अमेरिका को देने का विरोध कर रहे हैं, जिस कारण इन्‍हें अमेरिका के व्‍यापारिक कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है.

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