ईरान जंग की मार चीन तक पहुंच गई है. चीन में मार्च में दूसरी बार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाये गये हैं. चीन ने ईंधन संकट की तैयारियों के तहत खुदरा ईंधन की कीमतें बढ़ा दी हैं. ऐसा इस आशंका के बीच किया गया है कि अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध लंबा खिंच सकता है, जिससे गैसोलीन और डीजल की कमी हो सकती है.
चीन की टॉप प्लानिंग संस्था राष्ट्रीय विकास और सुधार आयोग (NDRC) ने अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के बीच मंगलवार से शुरू होने वाले अस्थायी उपायों की घोषणा की है.
NDRC ने कहा कि ये उपाय अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों में असामान्य वृद्धि के असर को कम करने, उपयोगकर्ताओं पर बोझ घटाने, इकोनॉमी को स्थिर करने के लिए और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किए गए हैं.
चीन ने सोमवार को पेट्रोल यानी कि गैसोलीन की कीमतों में 1160 युआन यानी कि 168 अमेरिकी डॉलर प्रति टन का इजाफा किया है. जबकि डीजल की कीमतों में 1115 युआन यानी कि 159 अमेरिकी डॉलर प्रति टन का इजाफा किया गया है. इससे पहले 9 मार्च को भी चीन में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ी थीं.
1 टन यानी कि 1000 किलोग्राम डीजल में आमतौर पर लगभग 1136 से 1220 लीटर के बीच डीजल होता है.
जबकि 1 टन पेट्रोल में 1300 से 1400 लीटर पेट्रोल होता है.
चीन के पास आपातकाल के लिए 4 महीने का पेट्रोलियम रिजर्व है.
ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी की घोषणा के बाद पूरे चीन में वाहन मालिक अपने वाहनों की टंकी भरवाने के लिए गैस स्टेशनों की ओर दौड़ पड़े.
पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण 'स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़' अवरुद्ध हो गया है, यह एक प्रमुख समुद्री मार्ग है जिसके ज़रिए दुनिया की 20 प्रतिशत ऊर्जा का परिवहन होता है.
चीन अपने कच्चे तेल का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा आयात पर निर्भर रहता है, जिसमें से लगभग 45 प्रतिशत आयात होर्मुज़ स्ट्रेट से होता है. इसका अर्थ है कि देश में तेल की कुल आपूर्ति का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज में होने वाली किसी भी बाधा से संकट में आ जता है.
9 मार्च में भी चीन में पेट्रोल डीजल की कीमतें बढ़ी थीं. तब चीन की सरकार ने पेट्रोल 695 युआन प्रति टन बढ़ाई थी. जबकि डीजल 670 युआन प्रति टन बढ़ाई थी. यह बढ़ोतरी पंप पर लीटर के हिसाब से लगभग 0.53 से 0.57 युआन प्रति लीटर के बराबर थी.
चीन की नेशनल डेवलपमेंट एंड रिफॉर्म कमीशन हर 10 दिन में पेट्रोल-डीजल में कीमतों की समीक्षा करती है और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों के आधार पर इसका एडजस्टमेंट करती है.
चीन के लिए अच्छी बात यह है कि रूस के साथ इसका ईंधन सप्लाई का समझौता है और चीन ने रूस के साथ पाइपलाइन के जरिए गैस मंगाता है. इससे चीन को आपात स्थितियों में फायदा मिलता है.
ईरान जंग से चीन पर असर
ईरान में चल रही जंग का चीन पर मुख्य रूप से ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, कूटनीति और ग्लोबल सप्लाई चेन पर असर पड़ा है. चीन ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार रहा है, इसलिए युद्ध के कारण तेल आपूर्ति में अनिश्चितता बढ़ी और उसे वैकल्पिक स्रोतों जैसे सऊदी अरब और रूस की ओर देखना पड़ा है. इससे ऊर्जा लागत और महंगाई का दबाव बढ़ा है.
चीन ने ईरान में ऊर्जा और बुनियादी ढांचे में 100 अरब डॉलर से अधिक निवेश किया है. युद्ध लंबा खिंचने पर ये परियोजनाएं खतरे में पड़ सकती हैं.
हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव से शिपिंग और तेल परिवहन प्रभावित हुआ, जिससे चीन को जाने वाली न सिर्फ कंज्युमर सप्लाई बल्कि औद्योगिक सप्लाई भी प्रभावित हुई है.
हालांकि चीन ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप से दूरी रखकर खुद को “मध्यस्थ” की भूमिका में रखा है, ताकि पश्चिम से टकराव से बचते हुए अपने आर्थिक हित सुरक्षित रख सके.
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