अमेरिका हर रोज नया दांव चल रहा है. ईरान-इजरायल में युद्ध से दुनिया के सभी छोटे-बड़े देशों को भारी नुकसान हो रहा है. चीन के लिए भी बड़ा संकट है. लेकिन इस युद्ध और अमेरिका की भूमिका को लेकर चीन अब तक चुप रहा है, क्या अब चीन पलटवार कर सकता है?
दरअसल, अचानक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump China Tour) ने अपना प्रस्तावित चीन दौरा रद्द कर दिया है. ट्रंप 31 मार्च से 2 अप्रैल 2026 तक चीन की यात्रा पर रहने वाले थे, दोनों देशों के बीच इस यात्रा को सफल बनाने के लिए कूटनीतिक स्तर बातचीत चल रही थी. ट्रंप की शी जिनपिंग (Xi Jinping) से बीजिंग में मुलाकात होने वाली थी.
लेकिन अब अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा अब 6 सप्ताह बाद होगी. इसके लिए ट्रंप चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से बातचीत कर अपनी यात्रा को 'रीसेट' करेंगे. हालांकि अचानक दौरा रद्द के करने पीछे भी ट्रंप का कूतनीतिक दांव बताया जा रहा है, कहा जा रहा है कि युद्ध की बीच चीन पर दबाव बनाने के लिए अमेरिका की ओर से ये यात्रा रद्द करने का फैसला लिया गया है.
चीन दौरा स्थगन के पीछे क्या कारण
बता दें, ट्रंप ने हाल ही में 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को ईरान के हमले से सुरक्षित करने के लिए चीन सहित कई देशों से मदद मांगी है. उन्होंने कहा कि चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को अमेरिका का आभार मानना चाहिए, क्योंकि अमेरिका ईरान पर हमलों से उनके तेल सप्लाई की रक्षा कर रहा है. ट्रंप ने आश्चर्य जताते हुए कहा कि चीन युद्धपोत भेजने के लिए इच्छुक नहीं है. जिसके बाद ट्रंप के सहयोगियों ने चीन की आलोचना की.
लेकिन अब जब ट्रंप ने दौरा रद्द कर दिया है तो फिर चीन भी अपना दांव चल सकता है, अभी तक ईरान पर लगातार हमले, कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल के बावजूद चीन चुप रहा, क्योंकि ट्रंप चीन आने वाले थे, दोनों देशों के बीच टैरिफ समेत चिप टेक्नोलॉजी, निवेश प्रतिबंध और सप्लाई चेन पर भी चर्चा होने वाली थी. वैसे भी अमेरिका चाहता है कि चीन रूस और ईरान से कम तेल खरीदे. लेकिन तमाम प्रतिबंधों के बावजूद चीन लगातार इन दोनों देशों से सस्ता तेल खरीद रहा है.
दरअसल, फिलहाल ब्रेंट क्रूड की कीमत 102 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई है. कच्चा तेल आयात करने वाले देशों में चीन सबसे ऊपर है. उसके बाद भारत का नंबर आता है. हालांकि हमेशा से वैश्विक मामलों से सीधे बयान देने से बचता है, और चीन के पास कई महीनों का कच्चा तेल है.
1. चीन क्यों नहीं ले रहा है टेंशन?
चीन के पास कच्चे तेल का बहुत बड़ा भंडार है. पिछले कई वर्षों से चीन लगातार स्टोरेज बढ़ा रहा है. अनुमान है कि चीन के पास करीब 4 महीनों की जरूरत के बराबर कच्चा तेल स्टॉक में मौजूद है. इसलिए अचानक कीमत बढ़ने पर भी घबरा नहीं रहा है. चीन के पास लगभग 900 मिलियन बैरल (90 करोड़ बैरल) का रणनीतिक तेल भंडार माना जाता है, यह भंडार लगभग (120 दिन) की आयात जरूरत को पूरा कर सकता है.
2. एनर्जी के दूसरे विकल्पों पर फोकस
चीन ने कई तेल उत्पादक देशों के साथ लंबे समय के समझौते किए हुए हैं, जैसे सऊदी और UAE के साथ. इन समझौतों में कीमतें अक्सर स्पॉट मार्केट से कम उतार-चढ़ाव वाली होती हैं. बहुत ज्यादा तेल की कीमतें बढ़ने पर चीन आयात घटाकर स्टॉक इस्तेमाल कर सकता है. इसके अलावा तेल पर निर्भरता कम करने के लिए चीन ने कोयला, गैस, परमाणु और ग्रीन एनर्जी में भी बड़ा निवेश किया है, इसलिए तेल की कीमत बढ़ने का असर उसकी पूरी अर्थव्यवस्था पर सीमित रहता है.
चीन रोज कितना तेल आयात करता है?
साल 2025 में चीन ने करीब 557.7 मिलियन टन कच्चा तेल आयात किया था, जो औसतन लगभग 11.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन के बराबर है. 2024 में यह आंकड़ा लगभग 11.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन था. पिछले कुछ महीनों में आयात 12–13 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक भी पहुंच गया, जो कि अपने आप रिकॉर्ड में है, इसका मतलब है कि दुनिया में जितना तेल समुद्र के रास्ते व्यापार होता है, उसका बड़ा हिस्सा चीन अकेला खरीदता है. लेकिन फिर भी दाम बढ़ने से चुप है.
आजतक बिजनेस डेस्क