देश में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर मचा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है. खास तौर पर सवर्ण समाज में इन नियमों को लेकर नाराज़गी खुलकर सामने आ रही है. इसी बीच जब केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय से इस आक्रोश को लेकर सवाल किया गया, तो उनका जवाब चर्चा का विषय बन गया. सवाल सुनते ही मंत्री नित्यानंद राय सीधे तौर पर जवाब देने से बचते नजर आए और 'हर-हर महादेव , भारत माता की जय, भगवान विष्णु की जय और हरिहरनाथ की जय' के नारे लगाने लगे.
यह दृश्य उस वक्त देखने को मिला जब नित्यानंद राय बिहार के वैशाली के हाजीपुर स्थित कौनहारा घाट पहुंचे थे. यहां गजग्राह की मूर्ति के शिलान्यास और अनावरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया था. कार्यक्रम से पहले उन्होंने विधिवत पूजा-अर्चना की. धार्मिक माहौल और कार्यक्रम की गरिमा के बीच जब पत्रकारों ने UGC के नए नियमों को लेकर सवर्ण समाज के विरोध पर सवाल किया, तो मंत्री ने सीधे तौर पर किसी भी राजनीतिक या नीतिगत टिप्पणी से परहेज किया.
सवालों से बचते नजर आए मंत्री
पत्रकारों ने जब उनसे पूछा कि UGC में हुए नियम बदलाव को लेकर सवर्ण समाज में गहरा आक्रोश है, इस पर सरकार का क्या पक्ष है, तो नित्यानंद राय ने सवाल का सीधा जवाब देने के बजाय धार्मिक नारे लगाने शुरू कर दिए. पत्रकारों ने जब लगातार सवाल दोहराए, तब भी मंत्री अपनी बात स्पष्ट करने के बजाय नारे लगाते रहे. यह पूरा घटनाक्रम कैमरों में कैद हो गया और सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो गया. इसके बाद यह बहस और तेज हो गई कि आखिर सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर खुलकर बोलने से क्यों बच रही है.
क्या है UGC का नया नियम
दरअसल, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 13 जनवरी को प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026 लागू किया है. इस नियम का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS), महिलाओं और दिव्यांग छात्रों, शिक्षकों व कर्मचारियों के साथ होने वाले भेदभाव को समाप्त करना बताया गया है. इन नियमों के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में 9 सदस्यों वाली एक समानता समिति यानी इक्विटी कमेटी गठित करने का प्रावधान किया गया है. इस समिति में संस्थान प्रमुख, तीन प्रोफेसर, एक कर्मचारी, दो सामान्य नागरिक, दो विशेष रूप से आमंत्रित छात्र और एक को-ऑर्डिनेटर शामिल होंगे. नियमों के अनुसार इस समिति की कम से कम पांच सीटें अनिवार्य रूप से SC, ST, OBC, दिव्यांगजन और महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. यहीं से विवाद की शुरुआत हुई.
सवर्ण समाज की आपत्ति क्या है
नए नियमों का विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि समानता समिति में सामान्य वर्ग यानी जनरल कैटेगरी के लिए कोई अनिवार्य प्रतिनिधित्व तय नहीं किया गया है. उनका तर्क है कि जब समिति भेदभाव की शिकायतों की जांच करेगी, तो सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को बिना पर्याप्त प्रतिनिधित्व के एकतरफा कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है. आलोचकों का यह भी कहना है कि नियम इस धारणा पर आधारित लगते हैं कि एक वर्ग हमेशा शोषित है और दूसरा वर्ग हमेशा शोषक. इससे शिक्षा परिसरों में अविश्वास का माहौल बन सकता है. सवर्ण समाज के कई संगठनों ने आशंका जताई है कि झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के जरिए सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को परेशान किया जा सकता है.
झूठी शिकायतों पर सजा का प्रावधान नहीं
विरोध करने वालों की एक बड़ी चिंता यह भी है कि नए नियमों में झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ किसी तरह के दंड या जुर्माने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है. उनका कहना है कि इससे शिकायत तंत्र का दुरुपयोग होने का खतरा बढ़ जाता है. सामान्य वर्ग के छात्र और शिक्षक यह सवाल उठा रहे हैं कि अगर कोई शिकायत गलत साबित होती है, तो शिकायतकर्ता पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं होगी. उनका तर्क है कि समानता का अर्थ सभी वर्गों के लिए समान सुरक्षा और समान जवाबदेही भी होना चाहिए.
UGC का पक्ष
वहीं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का कहना है कि ये नियम उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और समावेशन की भावना को मजबूत करने के लिए लाए गए हैं. आयोग का तर्क है कि बीते कुछ वर्षों में जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में लगातार बढ़ोतरी हुई है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. UGC की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2019-20 में भेदभाव से जुड़ी 173 शिकायतें दर्ज की गई थीं, जो 2023-24 में बढ़कर 378 हो गईं. पांच वर्षों में कुल 1160 शिकायतें सामने आई हैं, यानी करीब 118 प्रतिशत की वृद्धि. आयोग का कहना है कि ये आंकड़े यह दर्शाते हैं कि उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव एक गंभीर समस्या है और इसे रोकने के लिए मजबूत तंत्र की जरूरत है.
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