पश्चिमी एशिया जंग अब और खतरनाक रूप ले चुका है. 28 फरवरी को शुरू हुए इस भीषण संघर्ष ने अब तक भारी तबाही मचाई है. रास लाफान इंडस्ट्रियल सिटी जैसे दुनिया के सबसे बड़े LNG हब पर मिसाइल हमले हुए हैं, और ग्लोबल गैस सप्लाई की सांसें उखड़ रही हैं. हालात इतने गंभीर हैं कि दुनिया के करीब 20% LNG सप्लाई देने वाला कतर अपना प्रोडक्शन रोकने तक को मजबूर है. हाल ही में कतर के LNG प्लांट पर हुए ड्रोन हमलों ने पूरी दुनिया को एक बार फिर यह समझा दिया है कि गैस सिर्फ एनर्जी नहीं, बल्कि जियो-पॉलिटिक्स का सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है.
कतर की सरकारी कंपनी ने हमलों के बाद LNG उत्पादन तक रोक दिया, जिससे भारत जैसे देशों की सप्लाई पर सीधा असर पड़ सकता है. आज जब जंग के साए में LNG प्लांट और शिपिंग रूट खतरे में हैं, तब यह समझना और भी जरूरी हो जाता है कि अलग-अलग रूपों में हमारे घर तक पहुंचने वाली LNG कितने कठिन और सेंसिटिव सिस्टम का हिस्सा है. तो आइये जानें LNG क्या है, यह CNG में कैसे बदलती है, और आखिर ये गैस हजारों किलोमीटर दूर देशों तक कैसे पहुंचती है. यही पूरा खेल समझते हैं आसान भाषा में.
लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) का इतिहास बहुत ही पुराना है. हालांकि इसक कोई एक अविष्कारक नहीं माना जाता, बल्कि यह तकनीक समय के साथ विकसित हुई. इसकी शुरुआत 19वीं सदी में गैस को ठंडा करके लिक्विड फॉर्म में बदलने के प्रयोगों से हुई, जिसमें ब्रिटिश वैज्ञानिक माइकल फैराडे (Michael Faraday) का बड़ा योगदान माना जाता है.
बाद में 1910–1920 के दशक में गैस को सेफ तरीके से लिक्विफाई और स्टोर करने की टेक्नोलॉजी डेवलप हुई. पहला कमर्शियल एलएनजी प्लांट 1941 में अमेरिका के क्लीवलैंड में बनाया गया, लेकिन 1950–60 के दशक में इसका बड़े पैमाने पर उपयोग शुरू हुआ जब समुद्री रास्ते से LNG को एक जगह से दूसरी जगह तक ट्रांसपोर्ट करना संभव हुआ. इस ट्रांसपोर्टेशन की शुरुआत 1964 में हुई, जब अल्जेरिया से यूनाइटेड किंगडम तक पहली बार LNG का कमर्शियल शिपमेंट हुआ, जिसने ग्लोबल गैस बिजनेस की दिशा ही बदल दी.
दरअसल, नेचुरल गैस को जब -162° सेटिग्रेट तक ठंडा किया जाता है तो वह लिक्विड यानी तरल रूप में बदल जाती है, जिसे लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) कहते हैं. इसका वॉल्यूम गैस की तुलना में लगभग 600 गुना कम हो जाता है, जिससे इसे स्टोर और ट्रांसपोर्ट करना आसान हो जाता है. दूसरी तरफ CNG यानी कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (CNG) वही गैस है, लेकिन इसे हाई प्रेशर में कंप्रेस करके रखा जाता है, इसमें लिक्विफिकेशन नहीं होता. यह काम बड़े-बड़े गैस प्लांट्स में होता है, जैसे कतर का रास लाफान कॉम्प्लेक्स, जो दुनिया का सबसे बड़ा LNG एक्सपोर्ट टर्मिनल है.
आमतौर पर LNG के कई बाय-प्रोडक्ट हैं, मतलब इस्तेमाल के आधार पर इससे कई गैसें बनाई जाती हैं. मसलन, वाहनों में इस्तेमाल होने वाली CNG, पाइपलाइनों के जरिए रसोई घरों में प्रयोग की जाने वाली PNG इत्यादि. इसके अलावा बड़े पावर प्लांट्स में गैस टर्बाइन चलाने के लिए भी इसका इस्तेमाल होता है. कांच, सीमेंट, और स्टील के कारखानों में भट्टियों को गर्म करने के लिए और बड़े क्रूज शिप को चलाने के लिए भी LNG बहुत जरूरी फ्यूल है.
जब LNG को ट्रांसपोर्ट करके इसके डेस्टिनेशन कंट्री तक पहुंचाया जाता है, तो सबसे पहले इसे 'री-गैसीफिकेशन' प्लांट में गर्म किया जाता है. इससे यह फिर से गैस में बदल जाती है. इसके बाद इस गैस को हाई प्रेशर (200–250 बार) में कंप्रेस किया जाता है और यही CNG बन जाती है. इस पूरी प्रक्रिया में तीन स्टेप होते हैं-
1. LNG को टैंक से निकालकर हीट एक्सचेंजर में गर्म किया जाता है.
2. फिर इस गैस को हाई प्रेशर पर कंप्रेस किया जाता है.
3. यही गैस CNG बन जाती है और पाइपलाइ के जरिए पंप तक पहुंचती है.
LNG को सीधे गाड़ियों में इस्तेमाल नहीं किया जाता (कुछ भारी ट्रकों को छोड़कर). आम गाड़ियों में इस्तेमाल होती है CNG यानी कंप्रेस्ड नेचुरल गैस. पेट्रोल डीजल के मुकाबले ये फ्यूल का सबसे किफायती और बेहतर वर्जन माना जाता है. हालांकि, सीएनजी कारें रेगुलर पेट्रोल की तुलना में थोड़ी महंगी होती हैं और इनका पावर-आउटपुट भी कम होता है. लेकिन इनका माइलेज काफी बेहतर होता है, जिससे इनकी रनिंग कॉस्ट काफी हद तक कम हो जाती है.
LNG को बड़े-बड़े खास जहाजों में ले जाया जाता है जिन्हें एलएनजी कैरियर (LNG Carrier) कहा जाता है. ये जहाज सामान्य ऑयल टैंकर से काफी अलग होते हैं. इनमें गोल या मेम्ब्रेन टैंक लगे होते हैं, जो बेहद कम तापमान बनाए रखते हैं. पश्चिमी एशिया से निकलकर ये जहाज स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे तंग समुद्री रास्तों से होकर एशिया, यूरोप और अमेरिका तक जाते हैं. अभी हाल के तनाव में यह रास्ता सबसे बड़ा जोखिम बना हुआ है.
LNG का ट्रांसपोर्ट करना एक बहुत ही टफ प्रोसेस है. इसे सामान्य कंटेनर में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि यह बेहद ठंडी (-162°C) होती है. इसके लिए खास क्रायोजेनिक टैंक (Cryogenic Tanks) बनाए जाते हैं. ये डबल-लेयर इंसुलेटेड टैंक होते हैं, जो -162°C तापमान बनाए रखते हैं. इसकी बॉडी ऐसे तैयार की जाती है कि, जरा सा भी लीकेज का खतरा न हो. लोडिंग के दौरान पाइपलाइन के जरिए सीधे स्टोरेज टैंक से जहाज या कंटेनर में LNG भरी जाती है. इस दौरान बहुत सख्त सेफ्टी रूल्स को फॉलो किया जाता है. क्योंकि हल्की सी लीक भी खतरनाक हो सकती है.
आज LNG का स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट बेहद एडवांस टेक्नोलॉजी के जरिए होता है. इसे -162°C तापमान पर विशेष क्रायोजेनिक टैंकों में रखा जाता है, जो मोटी इंसुलेशन लेयर से लैस होते हैं ताकि गैस न उड़े. ये टैंक डबल-लेयर स्टील के बने होते हैं और काफी मजबूत होते हैं. इनके बीच वैक्यूम इंसुलेशन होता है, ताकि तापमान हर वक्त एक समान बना रहे. LNG को पाइपलाइन के जरिए सीधे इन टैंकों में भरा जाता है. इन टैंकों में थोड़ी गैस भाप (boil-off gas) बनती रहती है, जिसे फिर से कंप्रेस या लिक्विफाई किया जाता है. इन्हीं टैंकों को ट्रक, रेल या शिप पर लोड किया जाता है.
LNG कैरियर्स कई कैटेगरी में आते हैं, जिनमें सबसे बड़े Q-Max और Q-Flex कैटेगरी के शिप होते हैं. जैसे कि मोज़ा (Mozah) दुनिया के सबसे बड़े LNG जहाजों में से एक है. इस जहाज़ का नाम शेख़ मोज़ा बिंत नासिर के नाम पर रखा गया है, जो उस समय कतर के अमीर शेख़ हमाद बिन खलीफा अल थानी की पत्नी थीं. इसे सैमसंग हैवी इंडस्ट्री ने साल 2008 में बनाया था. इसकी लंबाई करीब 345 मीटर है और यह एक बार में लगभग 2,66,000 क्यूबिक मीटर LNG ढो सकता है. इसी तरह Q-Flex जहाजों की क्षमता 1,65,000 से 2,16,000 क्यूबिक मीटर तक होती है, जो ट्रेडिशनल शिप से काफी ज्यादा है.
कतर की सरकारी कंपनी नकिलात (Nakilat) दुनिया की सबसे बड़ी LNG शिपिंग कंपनियों में से एक है. इसके पास दर्जनों LNG कैरियर शिप्स हैं और कुल क्षमता करोड़ों क्यूबिक मीटर गैस ढोने की है. अगर आसान भाषा में समझें तो एक बड़ा LNG जहाज इतना गैस लेकर चलता है, जो गैस बनने पर लाखों घरों को कई दिनों तक सप्लाई दे सकता है. उदाहरण के तौर पर, एक Q-Max जहाज का LNG जब गैस में बदलता है, तो यह 16 करोड़ क्यूबिक मीटर से ज्यादा गैस के बराबर होता है.
दुनिया भर में LNG स्टोरेज टर्मिनल समुद्र किनारे बनाए जाते हैं, जहां बड़े टैंक लाखों क्यूबिक मीटर गैस स्टोर कर सकते हैं. इसके अलावा फ्लोटिंग स्टोरेज यूनिट (FSRU) भी इस्तेमाल हो रही हैं, जो समुद्र में ही LNG को स्टोर और री-गैसीफाई कर सकती हैं.
भारत में LNG का प्रोडक्शन सीमित है क्योंकि देश में नेचुरल गैस के भंडार अपेक्षाकृत कम हैं और अधिकांश गैस सीधे पाइपलाइन या डोमेस्टिक यूज के लिए निकाली जाती है. भारत में LNG बनाने के बड़े लिक्विफिकेशन प्लांट नहीं हैं, इसलिए यहां प्रोडक्शन से ज्यादा 'री-गैसीफिकेशन' और डिस्ट्रीब्यूशन पर फोकस है. भारत दुनिया के सबसे बड़े LNG आयातकों में शामिल है और अपनी कुल गैस जरूरतों का करीब 45-50% हिस्सा आयात से पूरा करता है.
दुनिया में LNG उत्पादन कुछ चुनिंदा देशों में ही होता है. कतर आज दुनिया का सबसे बड़ा LNG एक्सपोर्टर है, जिसके पास सबसे बड़ा नॉर्थ फील्ड गैस रिजर्व है. इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका, रूस और मलेशिया भी बड़े उत्पादकों में शामिल हैं. इन देशों में बड़े-बड़े LNG प्लांट हैं, जहां नेचुरल गैस को लिक्विफाई करके जहाजों के जरिए दुनिया भर में भेजा जाता है.
ग्लोबल लेवल पर LNG इंडस्ट्री तेजी से बढ़ रही है क्योंकि यह कोयला और तेल के मुकाबले क्लीन फ्यूल माना जाता है. एनर्जी सेविंग के लिहाज से भी LNG काफी बेहतर है. खासकर उन देशों के लिए जिनके पास खुद के गैस भंडार नहीं हैं. यही वजह है कि LNG अब सिर्फ एक फ्यूल नहीं, बल्कि ग्लोबल एनर्जी पॉलिटिक्स और इकोनॉमी का का अहम हिस्सा बन चुका है.
अश्विन सत्यदेव