वैशाख का महीना शुरू होते ही गर्मी अपने चरम की ओर बढ़ने लगती है. तेज धूप, बढ़ता तापमान और तपती दोपहरें इस बात का संकेत देती हैं कि प्रकृति अब पूरी तरह ग्रीष्म ऋतु में प्रवेश कर चुकी है. यही कारण है कि सनातन परंपरा में इस महीने को शीतलता, दान और पितरों की शांति से जोड़ा गया है.
बैसाख महीने में पितृ शांति के उपाय
बहुत कम लोगों को पता है कि पितृ पक्ष के अलावा इस महीने भर पितरों की शांति के लिए दान व तर्पण किए जाते हैं. इससे पितरों को संतुष्टि मिलती है और उनका आशीर्वाद मिलता है. वैशाख के महीने में कृ्ष्ण पक्ष की तेरस, चौदस और अमावस्या के दिन पूर्वी और उत्तर भारत में जूड़ शीतल मनाया जाता है.
इस दिन पंच पेड़ों यानी पीपल, नीम, बरगद, पाकड़ और आम में जल दान करने की परंपरा है. वैशाख की शुक्ल पक्ष की तृतीया, जिसे अक्षय तृतीया कहते हैं इस दिन सत्तू दान किया जाता है. वैशाख की शुक्ल पंचमी और शुक्ल एकादशी को घड़े में जल भरकर और उसके ऊपर गुड़ रखकर दान किया जाता है.
गन्ने के रस, सत्तू और शरबत का दान
वैशाख की शुक्ल पक्ष की द्वादशी को गन्ने का रस, सत्तू का शरबत, दही का शरबत का दान किया जाता है. वैशाख की त्रयोदशी और चतुर्दशी को तरबूज और खरबूज जैसे तरावट वाले फल दान किए जाते हैं. इसी तरह वैशाख की चतुर्दशी को चप्पल-खड़ाऊं और वैशाख की पूर्णिमा को छाता दान किया जाता है.
ये सभी दान ब्राह्मण और पुरोहित को तो किए ही जाते हैं, लेकिन निर्णय सिंधु ग्रंथ में जरूरतमंद को दान करने की अधिक महिमा बताई गई है.
मजदूरों और मेहनत कश वर्ग को दान
जैसे वैशाख की गर्मी में कोई मजदूर जो कठिन शारीरिक मेहनत कर रहा हो उसे, गुड़ खिलाकर घड़े का जल पिलाना चाहिए. इसीलिए वैशाख महीने की तिथियों को शुभ समय देखकर प्याऊ बैठाई जाती रही है, ताकि कोई भी प्यास से व्याकुल और परेशान न हो.
इसी तरह घूम-घूमकर सब्जी बेचने वाली महिला को तरावट वाले फल दान किए जाते हैं, ताकि उसे लू और गर्मी न लगे. खेतों में दोपहर के वक्त काम करने वाले किसानों को मिठाई, जल और सत्तू का दान करना ताकि उनके शरीर में ऊर्जा बनी रहे. चौकीदार, सेवादार, कहांर, सफाई कर्मी और ऐसे सभी मेहनत कश लोगों को दही का शरबत, गन्ने का रस आदि पिलाना चाहिए.
क्या कहता है ज्योतिष?
अब इस बात को ज्योतिष के नजरिए से समझें कि क्यों ये दान महत्वपूर्ण बन जाता है. ज्योतिष में पितरों का सीधा संबंध शनि, राहु और केतु से माना जाता है. शनि पूर्व जन्म के कर्मों और पितरों की स्थिति को दर्शाते हैं, जबकि केतु मोक्ष और राहु पितृ ऋण के कारक हैं. पितृदोष का अर्थ है शनि-राहु-केतु द्वारा पिछले जन्मों के कर्मों का लेखा-जोखा तय करना. इनकी शांति के लिए पितृ की विशेष पूजा, दान और तर्पण जरूरी है.
इसके अलावा जो भी निचले स्तर के मेहनत कश और कामगार लोग हैं, जैसे साफ-सफाई करने वाले, चौकीदार, मजदूर, नौकर-चाकर इन सभी का संबंध केतु से माना जाता है. इनके साथ अच्छा और सम्मानजनक व्यवहार करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं. वहीं राहु भी इन कर्मचारियों का प्रतिनिधि है. अगर ये सभी ठीक रहते हैं तो राहु भी नकारात्मक असर नहीं डालता है. इस तरह वैशाख मास में किया गया दान और पुण्य की गुना होकर लौटता है. इसके साथ ही यह पितृ देवों को भी प्रसन्न करता है. क्योंकि शनि और केतु को पितरों से खास कनेक्शन है.
इसलिए वैशाख मास के पूरे महीने को श्राद्ध पक्ष की ही तरह देखना चाहिए और इनमें से किसी भी दिन अपनी श्रद्धानुसार दान करना चाहिए. यह दान की परंपरा भारत की सनातन संस्कृति का हिस्सा रही है. ग्रामीण भारत इस दान-पुण्य के काम को बिना किसी पूजा-पाठ और अनुष्ठान का हिस्सा बनाए करता आया है. इसे निभाता आया है.
कई गुना बढ़ जाता है दान का फल
वैशाख के महीनों में खास तौर पर अमावस्या और पूर्णिमा पर सूर्य और चंद्रमा का संयोग विशेष प्रभाव डालता है, जिससे दान और तपस्या का फल कई गुना बढ़ जाता है. इस दिन किए गए दान से ग्रहों की शांति होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है. मान्यता यह भी है कि इस दिन किए गए कर्मों से पितृ दोष कम होता है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है.
वैशाख के महीने में पवित्र नदियों में स्नान विशेष फलदायी माना जाता है. इससे पापों का नाश और आत्मिक शुद्धि होती है. स्नान के बाद दान करने का महत्व बहुत अधिक होता है. शनि और पितृ दोष शांति के लिए वैशाख के शनिवार को तिल और तेल का दान विशेष रूप से शुभ माना जाता है. इसके साथ ही मंदिर या नदी किनारे दीपदान करने से अंधकार और नकारात्मकता दूर होती है.
विकास पोरवाल