भारत की खाद्य परंपरा में 'सादा जीवन उच्च विचार' का मंत्र हमेशा से रहा है. आयुर्वेद हमेशा से भोजन में सत्व यानी शुद्ध रूप शामिल करने की बात कहता रहा है. यानी कि भोजन का जो सबसे अधिक शुद्ध स्वरूप हो वही हमारी थाली का हिस्सा बने, लेकिन खेत से हमारी थाली तक पहुंचते हुए फूड प्रोसेसिंग के जरिये काफी कुछ बदल जाता है. कोशिश रहती है कि भोजन का आग से कम से कम कनेक्शन हो. उसे पकाना या तलना कम पड़े. इसलिए पारंपरिक थाली में ऐसे भोजन का महत्व हमेशा से अधिक रहा है.
सत्तू ऐसा ही प्राकृतिक भोजन है. जो अपने शुद्ध रूप में मौजूद है और इसमें सत्व होने के कारण ही इसका नाम सत्तू पड़ा है. आम तौर पर चना, जौ और मक्के का सत्तू बनता है, जो इन अनाजों को हल्का सेंककर और पीस कर बनाया जाता है. इसलिए सत्तू प्राकृतिक रूप से ठंडा रहता है. सत्तू, किसी अनाज को खाने का सबसे प्राचीन तरीका रहा होगा.
यानी खेती के बाद जब अनाज को पहली बार प्रोसेस कर खाने लायक बनाया गया तो पहला तरीका सत्तू ही रहा होगा. इसका जिक्र ऋग्वेद में भी मिलता है. ऋग्वेद के दशम मंडल में अत्रि मुनि की बेटी अपाला ने सत्तू के प्रयोग का जिक्र हवि के रूप में किया है. अपाला चर्म रोग से पीड़ित थीं.
वैदिक युग में सत्तू
अपाला ने ऋग्वेद के देवता इंद्र की तपस्या की और उन्हें सोम की बेल का रस और पिष्टान्न (पीसे हुए अनाज) अर्पित किया और उसे ही प्रसाद के रूप में ग्रहण किया. इस तरह इंद्र ने उनकी काया को सुंदर और रोगमुक्त बना दिया. इस कहानी में जो पिष्टान्न शब्द आया है, वह पीसे गए अनाज के लिए प्रयोग होता है. इससे वैदिक युग में सत्तू के भोजन परंपरा में शामिल रहने और प्रमुखता से अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का पता चलता है.
आगे चलकर यजुर्वेद में पिष्टान्न और पिष्टपाक शब्द भी आता है. पिष्टपाक का अर्थ है, पीसे हुए अनाज से बना पकवान. यजुर्वेद (तैत्तिरीय संहिता, 1.1.10) में "यवैष पिष्टो हविर्भवति" एक सूक्ति है, जिसका अर्थ है 'यह हवि जो पीसे हुए जौ से बना है.' यानी सत्तू की मौजूदगी वैदिक समय से रही है.
भारतीय परंपरा में हमारी रसोई और थाली मौसम के आधार पर बदलती है. यहां कहा गया है 'ऋतु भुक्तम' यानी ऋतु के आधार पर भोजन करें. जब 13-14 अप्रैल को सूर्य मेष राषि में प्रवेश करते हैं तो यह समय मेष संक्रांति का कहलाता है. इसी मौके पर बिहार, बंगाल, झारखंड, उत्तर प्रदेश में सतुआन पर्व मनाया जाता है. सतुआन पर्व गर्मी के आने का संदेश है.
इस तरह ऋतु के बदलने से भोजन की परंपरा भी बदलती जाती है. थाली से गर्म तासीर वाला भोजन हटाकर ठंडी तासीर वाले भोजन परोसे जाते हैं. ऐसे भोजन जो धूप, लू और गर्मी से बचाव करते हैं. सतुआन कई मायने में महत्वपूर्ण है. इस दिन लोग अपने पूजा घर में मिट्टी या पीतल के घड़े में आम का पल्लव स्थापित करके सत्तू, गुड़ और चीनी से पूजा की होती है.
धन दान की भी परंपरा रही है और सत्तू और कच्चे आम की चटनी को प्रसाद के तौर पर खाया जाता है. सतुआन के साथ ही बिहार में जूड़ शीतल भी मनाया जाता है, इस दिन आम, पीपल, बरगद, आंवला और शमी के वृक्षों में जल चढ़ाते हैं और इनके आस-पास बने चीटी के घरों पर सत्तू फैलाते हैं.
दक्षिण भारत में विषुकानी पर्व
तमिलनाडु और कर्नाटक में 14-15 अप्रैल या सूर्य के राशि परिवर्तन दिवस को विषु कानी पर्व के तौर पर मनाते हैं. यह पर्व भगवान विष्णु को समर्पित है और दक्षिण भारत में एक तरह से नव वर्ष का प्रतीक है. दरअसल विषु कानी पर्व कृषि आधारित पर्व है, जिसमें खेतों में बुआई का उत्सव मनाते हैं.
पांडवों के वनवास में सत्तू
वनवास के दौरान सत्तू पांडवों के भी जीवन का आधार बना था. जब वह घरों से अनाज की भिक्षा मांगकर लाते थे तो माता कुंती सभी अनाज को पीसकर उससे सत्तू तैयार कर देती थीं. माता कुंती ऐसा इसलिए करती थीं ताकि उनके पांचों बेटों में आपसी प्रेम हमेशा बना रहे. वह सभी के लाए हुए अनाजों को मिला देती थीं, ताकि सभी को सभी अनाजों का पोषण मिले.
भारत की यात्रा परंपरा का हिस्सा है सत्तू
इसके अलावा सत्तू भारत की यात्रा परंपरा का हिस्सा भी रहा है. क्योंकि यह यात्रा में ले जाने लायक, लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाला और शरीर को ऊर्जा देने वाला भोजन है.
संत-महात्माओं के लिए भी सत्तू सात्विक भोजन रहा है. आयुर्वेद में सत्तू को वात-पित्त-कफ संतुलित करने वाला बताया गया है. यह शरीर को ठंडक देता है, पाचन में सहायक होता है और शरीर को प्राकृतिक रूप से ऊर्जा देता है.
बिहार की विवाह परंपरा में सत्तू
बिहार में विवाह के समय 'सात्विकता' और शुद्धता का प्रतीक मानकर दुल्हन को ससुराल जाते समय सत्तू दिया जाता है, जिसे 'सत्तू-दान' कहा जाता है. लड़की के लिए वर देखने जाने वाले कन्या के पिता भी साथ में सत्तू लेकर यात्रा करते थे. यह शुभ का प्रतीक होता था,
पुराने समय में जब लोग बड़ी यात्राओं पर निकला करते थे तो साथ में सत्तू लेकर चलते थे. लंबी यात्राओं पर जाने वालों के लिए आस-पास के लोग भी अपने घरों से भी थोड़ा ही सही, लेकिन सत्तू बांध कर दिया करते थे. बिहार में बेटियों के लिए वर खोजने जाने वाले पिता जब घर में इस बारे में बात करते थे और एक खास लोकोत्ति प्रयोग करते थे, अब सत्तू बांध ही दो, दूल्हा खोज कर ही लाऊंगा. सत्तू बांधने का अर्थ ही लंबी यात्राओं पर निकलना होता था.
जंग और क्रांति में ऊर्जा देता रहा सत्तू
सत्तू सिर्फ यात्राओं नहीं बल्कि जंग के दौर में भी पेट की भूख शांत करने का विकल्प बना. कहते हैं कि लिट्टी युद्ध के दौरान बनी थी. जब आटे की लोइयों में सत्तू भरकर गर्म राख के नीचे दबा दी गई. थके-हारे सैनिकों ने इन्हें खाकर अपनी भूख मिटाई. क्रांति के दौर में कई क्रांतिकारियों ने सत्तू के सहारे ही वंदेमातरम् के नारे को बुलंद किया. चंद्रशेखर आजाद, दिनभर में सिर्फ एक बार भोजन कर पाते थे. तब वह चना-चबैना और सत्तू पर ही निर्भर रहे थे.
सत्तू सिर्फ एक भोजन नहीं, बल्कि भारतीय जीवन का वह विज्ञान है, जो मौसम, शरीर और संस्कृति—तीनों को एक सूत्र में बांधता है. यह भारतीय जीवनशैली की सांस्कृतिक पहचान है, जो हमें हमारी जमीन से जोड़े रखता है.
विकास पोरवाल