नवरात्र, नवरेह, पड़वा, उगादि... उत्तर से दक्षिण तक कितने नववर्ष?

भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है, जिसे उत्तर और मध्य भारत में विक्रम संवत के रूप में मनाया जाता है. दक्षिण भारत, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में नववर्ष मनाने की परंपराएं अलग हैं.

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चैत्र नवरात्रि की मान्यता उत्तर भारत में है चैत्र नवरात्रि की मान्यता उत्तर भारत में है

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 19 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 8:02 AM IST

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन नवरात्रि की शुरुआत होती है. एक आम धारणा और परंपरा है कि इस दिन से नया साल शुरू होता है. सदियों से हिंदू इसे इसी तरह मनाते हैं. हालांकि मनाने का तरीका अलग-अलग हो सकता है. इसे मनाने में दूसरी बड़ी बात स्थान के आधार पर है. यानी भारत देश का भौगोलिक बंटवारा सबसे अहम है. दक्षिण भारतीय प्रदेशों में चैत्र नवरात्र नहीं मनाया जाता है. इसी तरह पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भी चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष के पहले दिन नया साल मनाने की परंपरा नहीं है. चैत्र मास का पहला दिन सिर्फ उत्तर भारत और मध्य भारत के प्रदेशों में मनाया जाता है, जिसमें भी अलग-अलग प्रदेशों में इसके अलग-अलग नाम हैं.

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दरअसल, भारतीय नववर्ष मनाने की तिथियां दो मुख्य आधारों पर तय होती हैं. यह हैं चंद्र पंचांग और सौर पंचांग. इन्हें लूनर और सोलर पंचांग कहते हैं.

चैत्र नवरात्र, युगाब्दि और उगादि का कनेक्शन
उत्तर भारत का नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है, जिसे विक्रम संवत कहते हैं. वहीं इसी दिन महाराष्ट्र का गुड़ी पड़वा भी मनाया जाता है.  आंध्र प्रदेश/तेलंगाना और कर्नाटक का उगादी भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन मनाया जाता है, लेकिन वहां यह अधिक प्रचलित है. उगादि शब्द युगाब्दि जैसा ही है और माना जाता है कि महाभारत युद्ध के बाद श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर का राज्याभिषेक कराया था.

इस दिन को एक नए युग की शुरुआत कहा गया. इसलिए इसका नाम युगाब्द हुआ. कुछ विद्वान इसे श्रीकृष्ण के शरीर छोड़ने के समय से भी जोड़ते हैं, क्योंकि जैसे ही श्रीकृष्ण ने देह का त्याग किया उस दिन से द्वापर युग बीत गया और नया युग कलियुग शुरू हुआ.

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कश्मीर में नवरेह
कश्मीरी पंडितों के लिए चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन नवरेह कहलाता है. यह भी नया और नौ दोनों का ही प्रतीक है. कश्मीरी पंडितों की पुरानी परंपरा में नौ दिनों का अनुष्ठान शामिल है. नवरेह की पहली सुबह, परिवार के सदस्य सबसे पहले एक थाली का दर्शन करते हैं. इसे घर की महिलाएं एक रात पहले ही सजाती हैं. रात को चावल (समृद्धि), दही (शीतलता), अखरोट, फूल, सिक्के, औषधीय जड़ी-बूटी, दर्पण और नई जंत्री (पंचांग) इस थाली में सजाकर रखी जाती है. 

फिर इसके बाद कश्मीरी पंडित इस दिन को अपनी आराध्य देवी शारिका (हरि पर्वत की देवी) को जंत्री समर्पित करते हैं और उनकी पूजा करते हैं. त्योहार से एक दिन पहले, लोग पवित्र 'विचर नाग' झरने में स्नान करते हैं और 'व्ये' (प्रसाद) ग्रहण करते हैं.  नवरेह के तीसरे दिन, विवाहित महिलाएं अपने माता-पिता के घर (माल्युन) जाती हैं और नए वर्ष की शुभकामनाएं देती हैं.

इस दिन विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाते हैं, जिसमें केसरिया भात और चावल के पकवान विशेष होते हैं. नवरेह केवल नया साल नहीं, बल्कि यह संकल्प, त्याग और कश्मीरी पंडितों की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का एक पावन उत्सव है.
 
विक्रम संवत के साथ उत्तर और मध्य भारत में सिर्फ इसी तरह अलग-अलग नाम से उत्सव मनाकर नया साल मनाया जाता है. यानी विक्रम संवत् वाकई हिंदू कैलेंडर को बदलने का दिन जरूर है, लेकिन इसकी मान्यता पूरे भारत में एक जैसी नहीं है. भारत वैसे भी विविधता का देश है, इसलिए हर इलाके, या प्रदेश का अपनी स्थानीय परंपरा के अनुसार अपना-अपना नया साल है.

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सौर पंचांग के नववर्ष
कई जगहों पर सोलर कैलेंडर से नया साल मनाया जाता है. ये सूर्य की स्थिति (विशेषकर मेष संक्रांति) पर आधारित होते हैं. जैसे पंजाब की बैसाखी, तमिलनाडु का पुथांडु, केरल का विशु, बंगाल का पोइला बैशाख, असम का बोहाग बिहू और ओडिशा की महाविशुव संक्रांति. ये सभी उत्सव नए साल के हैं और लगभग हर साल 13–15 अप्रैल के बीच आते हैं. भारतीय नववर्ष केवल कैलेंडर बदलने का दिन नहीं, बल्कि प्रकृति, खगोल और वैदिक चिंतन का अद्भुत संगम है. 

चंद्र कैलेंडर चंद्र पंचांग में महीनों की गणना चंद्रमा के चरणों के आधार पर होती है. यह समय अमावस्या के बाद चंद्रमा के बढ़ते चरण का प्रतीक है, जो वृद्धि और नई शुरुआत का संकेत देता है. वहीं सौर पंचांग सूर्य की गति पर आधारित होता है. जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, तो उसे नववर्ष का प्रारंभ माना जाता है. इस घटना को मेष संक्रांति कहा जाता है, 

वसंत के ही आसपास होते हैं नव वर्ष
दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही तरह के पंचांग का सिस्टम आखिरकार एक ही ऋतु वसंत के आसपास केंद्रित हैं. वसंत को जीवन के पुनर्जन्म का समय माना जाता है. इसी समय दिन और रात लगभग बराबर होते हैं, जिसे वसंत विषुव कहा जाता है. इस संतुलन को प्रकृति में सामंजस्य और नई ऊर्जा के रूप में देखा जाता है. पेड़-पौधों में नई कोंपलें फूटती हैं, मौसम संतुलित होता है और जीवन में एक नई शुरुआत का एहसास होता है.

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तो कुल मिलाकर यह है कि भारतीय परंपरा में समय को केवल तिथियों में नहीं बांधा गया, बल्कि इसे प्रकृति, ब्रह्मांड और मानव जीवन के गहरे संबंध के रूप में समझा गया है. यही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है.

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