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क्या CM योगी के लिए 'मोदी की काशी' जैसा करिश्मा कर पाएगी अयोध्या?

उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी के लिए बीजेपी हिंदुत्व के मुद्दे पर उतरकर सियासी एजेंडा सेट करने में जुटी है. पीएम मोदी ने जिस तरह से काशी संसदीय सीट से चुनाव लड़कर विपक्ष का सफाया कर दिया था, क्या बीजेपी के लिए वैसा ही सियासी करिश्मा योगी आदित्यनाथ राम नगरी अयोध्या सीट से चुनाव लड़कर कर पाएंगे.

सीएम योगी आदित्यनाथ (फाइल फोटो) सीएम योगी आदित्यनाथ (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • लल्लू सिंह अयोध्या से पांच बार बीजेपी विधायक बने
  • अयोध्या से लड़ने पर पूर्वांचल-अवध पर पड़ेगा असर
  • योगी के लिए क्या अयोध्या सीट पर सपा देगी चुनौती

उत्तर प्रदेश की सत्ता पर दोबारा से वापसी के लिए बीजेपी हरसंभव कोशिश में जुटी है. सूबे में ओबीसी के दिग्गज नेताओं के पार्टी छोड़ने के बाद बीजेपी अब हिंदुत्व के मुद्दे को धार देने की रणनीति बनाई है. बीजेपी ने 2014 में जिस तरह से पीएम मोदी को वाराणसी संसदीय क्षेत्र से उतारकर यूपी में क्लीन स्वीप किया था. अब उसी तर्ज पर सीएम योगी आदित्यनाथ को अयोध्या सीट के चुनाव लड़ने की तैयारी में है. ऐसे में सवाल उठता है कि योगी अयोध्या सीट से लड़कर मोदी की तरह यूपी में सियासी करिश्मा दिखा पाएंगे? 

बीजेपी शीर्ष नेतृत्व दिल्ली में यूपी चुनाव के टिकट को लेकर मंथन में जुटा है. इस दौरान योगी आदित्यनाथ के अयोध्या सीट से चुनाव लड़ाने को लेकर भी चर्चा हुई. माना जा रहा है कि योगी को अयोध्या से उतारकर बीजेपी प्रदेश में हिंदुत्व का संदेश देने की रणीति है. बीजेपी और संघ के एजेंडे के लिहाज से भी अयोध्या काफी अहम हैं और यहां से सीएम के चुनाव लड़ने से पार्टी को बड़ा सियासी फायदा हो सकता है. 

योगी का पांच साल में 42 बार अयोध्या दौरा

राम की नगरी अयोध्या में राममंदिर निर्माण का कार्य तेजी से चल रहा है. सीएम बनने के बाद से योगी आदित्यनात लगातार अयोध्या का दौरा करते रहे हैं. पिछले पांच सालों में 42 बार योगी ने अयोध्या का दौरा किया है. इस दौरान उन्होंने अयोध्या को विकास की सौगात से भी नवाजा है. 

अयोध्या सीट पर भी बीजेपी का दबदबा रहा है. यहां हर गली में धर्म पर सियासत है, हर गली में धर्म के नाम पर वोट है. राम मंदिर के निर्माण ने तो इस 'धर्म वाली राजनीति' को और धार दे दी है. बीजेपी ने इस माहौल को अच्छे से परख लिया है और सीएम योगी को चुनाव मैदान में उतारकर उसे कैश कराने की रणनीति मानी जा रही है. अयोध्या सीट से योगी सियासी रण से उतरते हैं तो हिंदुत्व के एजेंडे को भी धार मिलेगी.  

अयोध्या में 93 फीसदी हिंदू मतदाता हैं और मात्र 6 प्रतिशत मुसलमान. अयोध्या यूपी के अवध क्षेत्र में पड़ता है और यहां से विधानसभा की 82 सीटें निकलती हैं. ऐसे में सीएम योगी का अयोध्या से चुनाव लड़ना अवध क्षेत्र ही नहीं बल्कि पूर्वांचल के सियासी समीकरण पर असर पड़ सकता है.

पीएम मोदी और सीएम योगी अयोध्या में (फाइल फोटो)

बता दें कि पीएम मोदी ने 2014 में काशी से चुनाव मैदान में उतरते तो इसका फायदा बीजेपी के सिर्फ पूर्वांचल में नहीं बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में हुआ था. वहीं, सीएम योगी अयोध्या से उतरते हैं तो अवध और पूर्वांचल के तमाम सीटों पर खास असर हो सकता है. 2019 के चुनाव में भी पीएम मोदी ने काशी से लड़ा और सपा-बसपा गठबंधन के सारे समीकरण को ध्वस्त कर दिया. इस तर्ज पर अब बीजेपी योगी को भी यूपी में चुनाव में धर्म नगरी अयोध्या से लड़ने का मन बना रही.

अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण बीजेपी के लिए बड़ा मुद्दा रहा है. बीजेपी राम मंदिर निर्माण का श्रेय मोदी सरकार को देती है और अपनी चुनावी सभाओं में बीजेपी नेता अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को जोर शोर से उठाते आ रहे हैं. योगी आदित्यनाथ के अयोध्या से चुनाव लड़ने पर बीजेपी को ऐसी उम्मीद है कि वह हिंदू मतों का कुछ और हिस्सा अपने पाले में खींच सकती है. 
 

अयोध्या के पड़ोसी जिले में नहीं खिला कमल

दरअसल, अयोध्या के पड़ोसी जिले अंबेडकरनगर, आजमगढ़, जौनपुर और रायबरेली में बीजेपी 2017 के चुनाव में मोदी लहर के बाद भी विपक्षी दलों की तुलना में बेहतर सफलता नहीं हासिल कर सकी थी. वहीं, जिस तरह से सपा ने ओबीसी नेताओं को भी साथ लिया है, उनमें ज्यादातर का सियासी असर इसी इलाके में है. रामअचल राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्य, लालजी वर्मा, दारा सिंह चौहान इसी इलाके से आते है. बीजेपी का साथ छोड़कर सपा के साथ गठबंधन करने वाले ओम प्रकाश राजभर की पार्टी का सियासी आधार भी पूर्वांचल इलाके में है. 

पूर्वांचल और अवध में ही सबसे ज्यादा जातिगत राजनीति भी है, जो बीजेपी के लिए चुनौती पूर्ण बनी है.  ऐसे में योगी अयोध्या से लड़ते हैं तो धर्म की राजनीत के आगे जाति की राजनीति कुंद हो सकती है. ऐसे में योगी अयोध्या के आसपास के जिलों के सियासी प्रभाव डालने के साथ-साथ यूपी के सियासी समीकरण को भी दुरुस्त कर सकते हैं. इसकी वजह यह भी है कि दो दशक से पूर्वांचल में अपना पिछला नतीजा नहीं दोहरा पाता है. 

राजनीति के लिहाज से भी अयोध्या सीएम योगी की छवि को एकदम सूट करती है. सूबे के मुख्यमंत्री बनने के बाद से उनके 42 दौरे अयोध्या के रहे हैं. दीपावली पर तो उन्होंने दीपोत्सव वाला जो कार्यक्रम शुरू करवाया है, उसने पूरे देश में सुर्खियां बटोरी हैं. हर साल दीप प्रज्वलित करने का नया रिकॉर्ड बनाया जा रहा है. साधु-संतों से लेकर बीजेपी नेता भी योगी से अयोध्या से चुनाव लड़ने की अपील भी लगातार करते रहे हैं, लेकिन राम मंदिर के पुजारी उनके चुनाव लड़ने के पक्ष में नहीं है.

राममंदिर के पुजारी की चिंता क्या है

राम मंदिर के मुख्य पुजारी सत्येंद्र दास ने आजतक के पंचायत कार्यक्रम में कहा था, 'बीजेपी के लोग और योगी अपने हिसाब से चुनाव लड़ने के लिए स्थान तय करेंगे. जहां तक अयोध्या की बात है तो अयोध्या एक मत में या एक पार्टी के अंतर्गत नहीं है. इसलिए मैं तो मुख्यमंत्री के प्रति समर्पित हूं. ऐसी स्थिति में उन्हें यहां से चुनाव लड़ने पर विचार नहीं करना चाहिए. योगी जी को गोरखपुर में ही किसी स्थान से चुनाव लड़ना चाहिए. अयोध्या की स्थिति भी अन्य जगहों जैसी है. वो यहां पर कुछ ऐसे काम करेंगे और कर रहे हैं, जिससे बहुत लोगों का नुकसान हो रहा है. इससे बहुत सारे लोग परेशान भी हैं.' 

राममंदिर निर्माण के चलते अयोध्या भले ही सुर्खियों में है, लेकिन यहां निर्माण कार्य की वजह से काफी दिक्कतें भी खड़ी हुई हैं. इसके अलावा अयोध्या सीट पर ब्राह्मण, वैश्य और यादव वोटर काफी बड़ी संख्या में है, जिन्हें बीजेपी अगर एक साथ लाने में सफल नहीं होती है तो उनके लिए सियासी चुनौती भी कड़ी हो सकती है. सपा पूर्व मंत्री पवन पांडेय के जरिए ब्राह्मण कार्ड खेलने की तैयारी में है. सीएम योगी को पूरे राज्य के चुनाव पर भी फोकस करना है, जिसके चलते वो खुद को अयोध्या तक सीमित नहीं रखना चाहेंगे? 

अयोध्या में 90 के बाद सिर्फ एक बार हार मिली

हालांकि, अयोध्या सीट के चुनावी नतीजे को देखें तो 1991 से लेकर साल 2007 तक लगातार बीजेपी ने जीत करती रही है. लल्लू सिंह बीजेपी के टिकट पर लगातार पांच बार जीत दर्ज की है और अभी अयोध्या सीट से सांसद हैं. राममंदिर आंदोलन के बाद बीजेपी को पहली बार अयोध्या सीट पर साल 2012 में हार का मूंह देखना पड़ा था, लेकिन 2017 में बीजेपी ने वेद प्रकाश गुप्ता को उतारकर यह सीट फिर से अपने कब्जे में ले ली है. 
 

33 फीसदी सीटें पूर्वांचल में आती हैं

दरअसल, पूर्वांचल की जंग फतह करने के बाद ही यूपी की सत्ता पर कोई पार्टी काबिज हो सकती है, क्योंकि सूबे की 33 फीसदी सीटें इसी इलाके की हैं. हालांकि, पिछले तीन दशक में पूर्वांचल का मतदाता कभी किसी एक पार्टी के साथ नहीं रहा. वह एक चुनाव के बाद दूसरे चुनाव में एक का साथ छोड़कर दूसरे का साथ पकड़ता रहा है. सपा 2012 और बसपा 2007 में पूर्वांचल में बढ़िया प्रदर्शन करने के बाद भी इस इलाके पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए नहीं रख सकी थी. 2017 में बीजेपी ने इस इलाके में क्लीन स्वीप किया था, लेकिन 2019 में चार लोकसभा सीटें गवां दी है और 2022 के लिए जिस तरह से विपक्ष पूर्वांचल में सक्रिय है, उसे लेकर बीजेपी भी अपने गढ़ को मजबूत करने में जुट गई है. 

पूर्वांचल के 28 जिले मं 164 सीटें हैं

पूर्वांचल में 28 जिले आते हैं, जो सूबे की राजनीतिक दशा और दिशा तय करते हैं. इनमें वाराणसी, जौनपुर, भदोही, मिर्जापुर, सोनभद्र, प्रयागराज, गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, महाराजगंज, संतकबीरनगर, बस्ती, आजमगढ़, मऊ, गाजीपुर, बलिया, सिद्धार्थनगर, चंदौली, अयोध्या, गोंडा, बलरामपुर, श्रावस्ती, बहराइच, सुल्तानपुर, अमेठी, प्रतापगढ़, कौशांबी और अंबेडकरनगर जिले शामिल हैं. इन 28 जिलों में कुल 162 विधानसभा सीट शामिल हैं. 

पूर्वांचल में हर चुनाव में बदलता मिजाज

बीजेपी ने 2017 के चुनाव में पूर्वांचल की 164 में से 115 सीट पर कब्जा जमाया था जबकि सपा ने 17, बसपा ने 14, कांग्रेस को 2 और अन्य को 16 सीटें मिली थी. ऐसे ही 2012 के चुनाव में सपा ने 102 सीटें जीती थीं जबकि बीजेपी को 17, बसपा को 22, कांग्रेस को 15 और अन्य को 8 सीटें मिली थीं. वहीं, 2007 में मायावती पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई थी तो पूर्वांचल की अहम भूमिका रही थी. बसपा 85 सीटें जीतने में कामयाब रही थी जबकि सपा 48, बीजेपी 13, कांग्रेस 9 और अन्य को 4 सीटें मिली थी. 

 

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