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Gyanvapi Case: ज्ञानवापी में शिवलिंग है या फव्वारा? जानिए विवाद पर क्या कहते हैं इतिहासकार

Gyanvapi Case: यह मामला अदालत की चौखट पर है, लेकिन इस विवाद को इतिहास और इतिहासकारों के नजरिए से देखने की भी जरूरत है. इसीलिए ज्ञानवापी प्रकरण पर इतिहास की रोशनी डालने के लिए हमने जाने-माने इतिहासकार और इंडोलॉजिस्ट ललित मिश्रा से बातचीत की.

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स्टोरी हाइलाइट्स
  • हिंदू पक्ष शिवलिंग तो मुस्लिम पक्ष बता रहा फव्वारा
  • ज्ञानवापी यानी ज्ञान देने वाला कुआं

इन दिनों वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद का मुद्दा देशभर में छाया हुआ है. ज्ञानवापी को लेकर उठे विवाद पर अलग पक्षों के अलग-अलग तर्क हैं. कोई इसे सांस्कृतिक विरासत मानता है तो कोई इसे धार्मिक स्थल. ज्ञानवापी के भीतर अदालत के आदेश पर सील किए गए शिला को हिंदू पक्ष शिवलिंग मान रहा है तो मुस्लिम पक्ष उसे फव्वारा करार दे रहा है. मामला अदालत की चौखट पर है, लेकिन इस विवाद को इतिहास और इतिहासकारों के नजरिए से देखने की भी जरूरत है. इसीलिए ज्ञानवापी प्रकरण पर इतिहास की रोशनी डालने के लिए हमने जाने-माने इतिहासकार और इंडोलॉजिस्ट ललित मिश्रा से मुलाकात की.

ज्ञानवापी का उल्लेख पहली बार कब हुआ था? 
ज्ञानवापी यानी ज्ञान देने वाला कुआं. यूं तो इसका जिक्र पुराणों में है लेकिन आधुनिक लेख जो इस पर मौजूद है वह 16वीं शताब्दी महाराष्ट्र के दत्तात्रेय समाज द्वारा लिखे गए किताब में ज्ञानवापी का जिक्र आता है. इतिहासकार ललित मिश्रा कहते हैं कि ज्ञानवापी प्राचीन काल के विश्वेश्वर मंदिर का एकांश था, जिसका जिक्र स्कंद पुराण में किया जाता है, लेकिन हमारे पास इसका नवीनतम उल्लेख भी उपलब्ध है जोकि 16वीं शताब्दी में लिखे गए ग्रंथ गुरुचरित्र में होता है जोकि महाराष्ट्र के दत्तात्रेय संप्रदाय के संन्यासियों द्वारा लिखा गया है. उसमें ज्ञानवापी में किए गए स्नान और उसके उपरांत मंदिर में मंदिर जाकर भगवान के दर्शन करने का उल्लेख है.

गुरु चरित्र का श्लोक नंबर 57 कहता है - 
ज्ञानवापीं करी स्नान । नंवदका श्वर ऄचोन ।
तारका श्वर पूजोन । पुढें जावें मग तुवां ॥५७॥

यानी पौराणिक कथाओं के अलावा 16वीं शताब्दी में दत्तात्रेय संप्रदाय ने जो ग्रंथ लिखा था उसमें भी ज्ञानवापी का जिक्र है. लेकिन इसका उल्लेख मुगलिया सल्तनत में भी पाया जाता है. मसीर-ए-आलम गिरी हो किताब है जिसमें औरंगजेब द्वारा जारी किए गए तमाम फरमान दर्ज किए गए हैं जो 1658 से लेकर 17वीं सदी तक के तमाम औरंगजेब के आदेशों को समावेशित करता है. इस किताब में औरंगजेब के आदेशों का क्रोनोलॉजिकल रिकॉर्ड है. 

इतिहासकार ललित मिश्रा इस किताब के हवाले से बताते हैं कि 16वीं सदी में औरंगजेब ने 8 अप्रैल 1669 को मुगल सियासत में टट्टा और मुल्तान जो कि इस समय पाकिस्तान में है और बनारस के तमाम मंदिरों को ध्वस्त करने का आदेश दिया. औरंगजेब का यह फरमान मसीर-ए-आलम में दस्तावेज किया गया है. इतिहासकार बताते हैं कि इसी किताब में आगे जिक्र है 2 जून 1669 को औरंगजेब की सभा में उसे यह जानकारी दी गई कि उसके फरमान पर अमल किया जा चुका है यानी टट्टा मुल्तान और बनारस के मंदिरों को ध्वस्त किया जा चुका है.

यानी 2 महीने के भीतर औरंगजेब के आदेश की तामील की गई और तीन मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया था जिसका जिक्र नवीनतम मुगल इतिहास में दर्ज है. लेकिन इतिहासकार मानते हैं कि मस्जिद का निर्माण कब हुआ इसकी जानकारी इतिहास में दर्ज नहीं है. 

ज्ञानवापी में शिवलिंग है या फव्वारा? 
इंडोलॉजिस्ट ललित मिश्रा बताते हैं कि यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है क्योंकि मुगल काल में जितने मुगल गार्डन बनाए गए जो आज भी भारत में मौजूद हैं उसमें सफदरजंग मकबरे में एक मुगल फव्वारा मजबूत मौजूद है जो 1780 के दौरान बनी है जो कि फंक्शनल था अगर हमारे विशेषज्ञ चाहे या एएसआई के लोग चाहें तो सफदरजंग के फव्वारे और ज्ञानवपी में जो शिवलिंग प्राप्त हुआ है. उन दोनों का कंपैरेटिव एनालिसिस किया जा सकता है और ऐसे में निष्कर्ष पर पहुंचना कठिन नहीं होगा. 

इतिहास कार्य मानते हैं कि इस बात के सबूत नहीं कि जब ज्ञानवापी मंदिर को नष्ट किया गया तो शिवलिंग को बचाने की कोशिश की गई होगी, लेकिन स्थानों में यह जरूर माना जाता है कि उस समय पंडितों ने शिवलिंग को बचाने के लिए उसे कहीं छुपा दिया था लेकिन उसे कहां छुपाया गया था इसका कोई ऐतिहासिक दस्तावेजी उल्लेख मौजूद नहीं है. ललित मिश्रा यह भी कहते हैं कि ज्ञानवापी में कोई फव्वारा था इसके भी कोई ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद नहीं है.
अगर वह 40-50 साल पहले भी फव्वारा फंक्शनल था, तो उससे संबंधित फोटो या दस्तावेज मौजूद नहीं है इसलिए फव्वारे के सवाल पर अब भी सवाल खड़ा हुआ है. लेकिन उन लेखों के मुताबिक, शिवलिंग को बचाने का प्रयत्न किया गया था जोकि अभी प्राप्त हुआ है लेकिन शिवलिंग को कहां रखा गया और वह उस स्थल पर कैसे पहुंचा यह सिलसिला अब भी अज्ञात है लेकिन इस पर हमें सरकमस्टेंशियल एविडेंस को स्वीकार करना चाहिए. 

तो शिवलिंग मानने का आधार क्या है? 
'आजतक' के साथ विशेष इंटरव्यू में इतिहासकार ललित मिश्रा ने कहा कि जब मैंने भी मंदिर का भ्रमण किया और उस भ्रमण के दौरान देखा कि नंदी की प्रतिमा वर्तमान शिवद्वार की तरफ नहीं है जो कि एक आश्चर्य का विषय है तब मैंने तत्कालीन पंडितों से पूछा था कि आखिर यह निर्माण कैसा है जहां मंदिर कहीं और है मूर्ति कहीं और देख रही है जो कि एक अपवाद है. एक लॉजिकल कंक्लुजन यह हो सकता है कि संभवत जिस तरफ नंदी का मुख है, उसी तरफ ही प्राचीनतम विश्वेश्वर मंदिर हुआ करता था जहां फिलहाल मस्जिद मौजूद है.

तो क्या ताजमहल कुतुब मीनार जामा मस्जिद के नीचे भी मंदिरों के अवशेष हैं? 
इतिहासकार बताते हैं कि मुगलिया दस्तावेज यह इशारा करते हैं कि कुतुब मीनार के नीचे जो मस्जिद है उसके पूर्वी हिस्से में एक आलेख मिला जिसमें 27 मंदिरों के भग्नावशेष के बनाए जाने का जिक्र और पुष्टि होती है जो कि एक अभिषेक अभिलेख है और मुस्लिम आक्रांता उन्हें ही निर्मित किया हुआ है उस पर संदेह नहीं है. आजादी के पहले दशक में ही एक राष्ट्रीय नीति होती तो यह विवाद खड़े नहीं होते. 

रोज उठ रहे विवादों का समाधान कैसे? 
भारत का इतिहास सीधा-सपाट नहीं है. ऐसे में एक राष्ट्रीय नीति बननी चाहिए थी कि ऐसे विवादित जगहों की ऐसी पहचान हो ताकि समरसता भी बनी रहे. उदाहरण के तौर पर इंडोनेशिया में ऐसे विवादों को एक राष्ट्रीय नीति के तहत इनका समाधान किया गया जो कि स्वीकारोक्ति के साथ होता है जिसमें इतिहासकार दोनों पक्ष पुरातत्व सभी लोग शामिल होते हैं और ऐसे विवादों का पटाक्षेप किया जा सकता है ताकि हर दूसरे दिन नए-नए विवाद खड़े नहीं होंगे ना ही उससे कटुता का वातावरण बनेगा. 

 

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