ईरान युद्ध के कारण होर्मुज स्ट्रेट बंद है जिससे खाड़ी देशों से तेल और गैस सप्लाई पर बहुत बुरा असर हुआ है. इस बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने तेल बाजार को चौंकाते हुए तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक और ओपेक प्लस से बाहर होने का ऐलान कर दिया है. ओपेक के लीडर सऊदी अरब से अंदरूनी मतभेदों के बीच यूएई ने कहा है कि वो 1 मई से ओपेक और ओपेक प्लस दोनों ही तेल संगठनों की सदस्यता छोड़ रहा है.
ओपेक यानी Organization of the Petroleum Exporting Countries तेल निर्यात करने वाले देशों का समूह है, जो वैश्विक तेल उत्पादन नीतियों पर तालमेल के साथ काम करता है ताकि तेल बाजार में स्थिरता बनी रहे.
इसकी स्थापना 1960 में हुई थी. प्रमुख सदस्य देशों में आमतौर पर सऊदी अरब, यूएई, इराक, ईरान, कुवैत, वेनेजुएला, नाइजीरिया जैसे देश शामिल रहे हैं.
वहीं, ओपेक+ (OPEC Plus) ओपेक का विस्तारित समूह है, जिसमें ओपेक देशों के साथ कुछ गैर-ओपेक तेल उत्पादक देश भी शामिल होते हैं.
सबसे अहम गैर-ओपेक सदस्य रूस है. यह समूह खासकर 2016 के बाद ज्यादा सक्रिय हुआ, जब तेल कीमतों को संभालने के लिए ओपेक ने दूसरे बड़े उत्पादकों को अपने साथ ले लिया.
ओपेक देशों के पास संयुक्त रूप से दुनिया का 80% तेल रिजर्व है और ये मिलकर वैश्विक तेल उत्पादन का लगभग 40% हिस्सा उत्पादित करते हैं. समूह के देश जब उत्पादन घटाते या बढ़ाते हैं, तो दुनिया में तेल की कीमत बदलती है, जिसका असर भारत में पेट्रोल-डीजल, महंगाई और आयात बिल पर पड़ता है.
यूएई के ओपेक और ओपेक प्लस से बाहर होने का भारत पर कैसा असर होगा?
यूएई का ओपेक छोड़ना भारत-चीन जैसे दुनिया के बड़े तेल खरीदारों के लिए बेहद अहम खबर है. यूएई के ओपेक छोड़ने से कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है.
फरवरी के अंत में ईरान युद्ध की शुरुआत से होर्मुज स्ट्रेट लगभग बंद है. ईरान ने शिपिंग रोक दी और अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों पर ब्लॉकेड लगा दिया. इससे दुनिया का लगभग 20% तेल-गैस ट्रांसपोर्ट प्रभावित हुआ. सऊदी अरब, यूएई, इराक, कुवैत जैसे खाड़ी देशों का निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ है और ये देश रोजाना लाखों बैरल का नुकसान उठा रहे हैं.
भारत पर भी होर्मुज बंद होने का बड़ा असर हुआ है और मध्य पूर्व से तेल आयात 60% तक गिरा जबकि कुल आयात ~13% घटा है. भारत ने रूस से आयात लगभग दोगुना कर दिया, लेकिन फिर भी सप्लाई दबाव और ऊंची कीमतें बनी हुई हैं.
लेकिन यूएई का ओपेक छोड़ना भारत के लिए एक तरह से फायदेमंद साबित हो सकता है. यूएई के पास हबशान-फुजैरा (ADCOP) पाइपलाइन है, जो पूरी तरह होर्मुज से बाहर है. इसकी क्षमता 1.5-1.8 मिलियन बैरल प्रति दिन है और यूएई इसके जरिए अपना तेल आसानी से बेच रहा है.
समूह छोड़ते ही यूएई को OPEC+ कोटा से मुक्ति मिल जाएगी और इस वजह से वो अपनी पूरी क्षमता (4.8-5 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक) उपयोग कर सकता है. इससे यूएई का अतिरिक्त तेल बाजार में आएगा जिससे कीमतें कम हो सकती हैं.
भारत की रिफाइनरियां यूएई के मरबान (Murban) क्रूड को पसंद करती हैं. अब यूएई बिना रोक-टोक ज्यादा उत्पादन करेगा और अपनी मर्जी से तेल बेचेगा. वैश्विक सप्लाई में थोड़ी बढ़ोतरी से कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल रुक सकता है या कुछ गिरावट आ सकती है. इससे भारत को राहत मिल सकती है और उसका आयात बिल कम हो सकता है.
हालांकि, अगर OPEC+ में फूट पड़ने से ग्लोबल तेल बाजार और अस्थिर हुआ तो कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है.
आजतक इंटरनेशनल डेस्क