'ये यूरोप के लिए वेक-अप कॉल...', जंग के माहौल के बीच ऐसा क्यों बोले इटली के राजदूत बार्तोली

नई दिल्ली में इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026 के दूसरे दिन यूरोप और अमेरिका के राजदूतों ने वैश्विक राजनीति, रणनीतिक स्वायत्तता और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका पर गहन चर्चा की.

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इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026 में इटली के राजदूत ने कहा ये यूरोप के लिए जागने का समय इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026 में इटली के राजदूत ने कहा ये यूरोप के लिए जागने का समय

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 14 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 12:52 PM IST

नई दिल्ली में हो रहे इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026 का शनिवार को दूसरा दिन है. इस मौके पर देश-विदेश के राजनीतिक एक्सपर्ट, प्रतिनिधि, पॉलिटिकल लीडर, खिलाड़ी और  अभिनेता एक मंच पर जुड़ रहे हैं और तमाम जरूरी मुद्दे पर अपनी राय रख रहे हैं. 

इसी दौरान कार्यक्रम के एक खास सेशन 'AMBASSADORS’ DEBRIEF Europe & America: The Diplomatic Frontline' में भारत में जर्मनी के राजदूत  Dr Philipp Ackermann, भारत में इटली के राजदूत Antonio Bartoli और भारत में स्पेन के राजदूत Juan Antonio March Pujol ने शिरकत की.

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इस दौरान तेल के लिए अमेरिकी परमिशन को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में इटली के राजदूत एंटोनिओ बार्तोली ने कहा कि इटली का अटलांटिक के उस पार वाले देशों के साथ हमेशा से एक खास संबंध रहा है. हम यूरोपीय संघ और नाटो के संस्थापक देशों में से हैं, और यही हमारी विदेश नीति को संतुलित बनाए रखने में रास्ता दिखाता है. 

उनसे पूछा गया कि, मिनाब स्कूल हमले के बाद इटली ने ईरान में हो रही कार्रवाई की आलोचना की और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे से बाहर बताया. ऐसे में इटली अमेरिका के साथ अपने पारंपरिक संबंधों को कैसे संतुलित करता है और साथ ही ईरान के खिलाफ उसकी कार्रवाई पर सवाल भी उठाता है? इस पर बार्तोली ने कहा कि यूरोप और अमेरिका सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक और ऐतिहासिक कारणों से कभी भी पूरी तरह समान नहीं रहे हैं. आपको याद करें तो रॉबर्ट कागन ने कहा था कि, 'अमेरिकी मंगल ग्रह से हैं और यूरोपीय शुक्र ग्रह से'

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असल बात यह है कि हमने हमेशा संवाद और मध्यस्थता के जरिए मतभेदों को सुलझाने की कोशिश की है. यहां तक कि मार्को रुबियो ने भी कहा था कि मतभेदों के बावजूद यूरोप और अमेरिका को यह अहसास है कि वे पश्चिमी दुनिया का हिस्सा हैं. 'पश्चिम' कोई मिथकीय या एकरूप इकाई नहीं है. यह एक साझा पहचान और जुड़ाव की भावना है. मेरा मानना है कि हमें इस भावना को ईमानदारी, पारदर्शिता और बिना किसी अधीनता के आगे बढ़ाना चाहिएय

हालांकि अब निश्चित रूप से बदलाव आ रहा है. शीत युद्ध के दौर में यूरोप वैश्विक राजनीति का केंद्र था, लेकिन अब ध्यान इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की ओर जा रहा है. अमेरिका की शैली अब ज्यादा आक्रामक और मुखर हो गई है, और उसकी सैन्य प्रतिबद्धताएं भी अधिक चयनात्मक हो रही हैं. मेरा मानना है कि यह एक ग्लोबल टेंडेसी का हिस्सा है, दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की शक्ति कमजोर हो रही है.

इस व्यवस्था को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य रूस ने यूक्रेन पर हमला किया. यह संयुक्त राष्ट्र के मूल सिद्धांतों का खुला उल्लंघन था. दूसरी बात यह है कि ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ों से हमें हमेशा सबक लेना चाहिए और सही संकेतों का उपयोग करना चाहिए. यह यूरोप के लिए एक चेतावनी है कि उसे अपनी रणनीतिक स्वायत्तता मजबूत करनी होगी. यह कहने के बाद मैं यह भी जोड़ना चाहूंगा कि यूरोप को अपने ढांचे को मजबूत करना होगा. तकनीक, क्षमता और अन्य क्षेत्रों में जो कमियां हैं, उन्हें दूर करना जरूरी है.  लेकिन यह नाटो गठबंधन के खिलाफ नहीं है.

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