काला सागर यानी ब्लैक सी में रूसी टैंकर से तेल रिसाव होने से 32 डॉल्फिन मारी गईं हैं. ब्लैक सी में तेल का रिसाव 15 दिसबंर को शुरू हुआ जब क्रीमिया को दक्षिणी रूस से जोड़ने वाली Kerch स्ट्रेट के पास आए तूफान में रूस के दो पुराने तेल टैंकर फंस गए. रूसी अधिकारियों का कहना है कि एक जहाज समुद्र में डूब गया और एक तूफान के बीच फंस गया जिससे 2,400 टन भारी तेल, जिसे माजुत कहा जाता है, आसपास के समुद्री इलाके में फैल गया और तटों तक पहुंच गया.
रविवार को रूस के डॉल्फिन रेस्क्यू सेंटर Delfa सेंटर ने कहा कि तेल रिसाव की घटना के बाद से 61 समुद्री स्तनधारियों (Cetaceans) की मौत रजिस्टर हुई है जिनमें से 32 की मौत संभवतः तेल रिसाव की वजह से हुई है. Cetaceans समुद्री स्तनधारियों के एक समूह को कहा जाता है जिसमें व्हेल, डॉल्फिन और पोर्पोइज आते हैं.
डेल्फा सेंटर ने कहा कि शवों को देखते हुए ऐसा लगता है कि इनमें से अधिकांश जीवों की मृत्यु आपदा के बाद के पहले 10 दिनों में हुई होगी.
तेल रिसाव का समुद्री पौधों और जीवों पर कैसा होता है असर?
तेल अघुलनशील होता है यानी यह पानी में घुलता नहीं बल्कि पानी के ऊपर ही तैरता रहता है. अगर तेल पानी की सतह पर फैल जाए तो समुद्री जीवों और पौधों के लिए बेहद खतरनाक साबित होता है क्योंकि इसके रासायनिक घटक जहरीले होते हैं.
तेल समुद्री जीवों को बाहरी और अंदरूनी, दोनों तरफ से प्रभावित करता है. तेल रिसाव के बाद निगलने और सांस लेने के दौरान समुद्री जीव अंदरूनी तौर पर प्रभावित होते हैं और उनकी बाहरी त्वचा, आंखों को नुकसान होता है.
तेल फर वाले स्तनधारियों, जैसे समुद्री ऊदबिलाव, की ऊष्मारोधी क्षमता को नष्ट कर देता है और पक्षियों के पंखों की जलरोधी क्षमता को भी बर्बाद कर देता है जिससे ये जीव समुद्र के कठोर तत्वों से अपना बचाव नहीं कर पाते. पानी को रोकने और समुद्र के ठंडे पानी से बचाव की इनकी क्षमता नष्ट हो जाती है जिस कारण समुद्री पक्षियों और स्तनधारियों के हाइपोथर्मिया से मरने का खतरा बढ़ जाता है.
तेल छोटे समुद्री कछुओं के लिए भी बेहद खतरनाक होता है और कई कछुए इसे अपना भोजन समझकर खा जाते हैं जिससे कई मामलों में उनकी मौत हो जाती है. तट पर रहने वाले पक्षी और जानवर समुद्री पानी में नहाते वक्त तेल निगल लेते हैं जिससे उनके शरीर के अंदर जहर फैल सकता है.
मछलियां, शेलफिश (शंख) और कोरल तेल रिसाव के बाद तुरंत इसके संपर्क में नहीं आते लेकिन अगर तेल पानी के नीचे वाले हिस्सों में चला जाए तो वो तेल के संपर्क में आ जाते हैं. तेल के संपर्क में आने पर छोटी मछलियों का विकास कम होता है, उनका लीवर बढ़ जाता है, सांस लेने की दर और हृदय गति में बदलाव आ सकता है, पंख गिर सकते हैं और उनकी प्रजनन क्षमता भी कम हो सकती है. मछलियों के अंडे और लार्वा भी तेल रिसाव से प्रभावित होते हैं.
समुद्र में अगर तेल रिसाव ज्यादा नहीं भी है और इंसान तेल रिसाव के संपर्क में आए मछलियों या दूसरे समुद्री जीवों को खा रहा है तो इससे इंसानों को नुकसान हो सकता है.
तेल रिसाव का सबसे बुरा असर किन जीवों पर होता है?
रूसी तेल रिसाव में सबसे अधिक डॉल्फिन की मौत हुई है. अधिकारियों ने बताया कि मरने वाले जीवों में से अधिकांश 'अजोव' डॉल्फिन थे. ये एक प्रकार के समुद्री जीव हैं जो डॉल्फिन की तरह दिखते हैं लेकिन सफेद व्हेल और नरव्हेल की प्रजाति के अधिक करीब होते हैं.
अमेरिका के नेशनल ऑशन सर्विस के मुताबिक, जब तेल रिसाव होता है तब डॉल्फिन और व्हेल तेल को सांस के जरिए अंदर ले लेती हैं जिससे उनके फेफड़े, इम्यून सिस्टम और प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है. तेल रिसाव के कारण गंभीर स्थितियों में इनकी मौत भी हो जाती है.
समुद्र में जब तेल रिसाव होता है और हवाएं और लहरें तेज होती हैं तो तेल के ज्यादा फैलने, उनके तटों तक पहुंचने का खतरा ज्यादा रहता है. रूसी तेल रिसाव के मामले में भी कुछ ऐसा ही देखा गया. तेज हवाओं और लहरों के कारण कुछ समुद्र तटों पर तेल फैल गया. रूस के आपातकालीन मंत्रालय ने रविवार को कहा कि 68 किलोमीटर (42 मील) से अधिक तटीय क्षेत्र को साफ कर दिया गया है.
तेल के तट पर आने की स्थिति में सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले समुद्री जीव उदबिलाव और समुद्री पक्षी होते हैं जो समुद्र की सतह या तटरेखा पर पाए जाते हैं. तेल रिसाव के ज्यादातर मामलों में अन्य समुद्री जीवों की तुलना में समुद्री पक्षी ज्यादा प्रभावित होते हैं और वो मारे जाते हैं.
तेल रिसाव से समुद्री ऊदबिलाव के फर को नुकसान पहुंचता है. साफ फर उदबिलाव को गर्म रखने में मदद करते हैं लेकिन तेल के संपर्क में आने पर उनके फर चिपचिपे और गंदे हो जाते हैं जिससे उनकी गर्म रहने की क्षमता कम या खत्म हो जाती है और उनकी मौत तक हो जाती है.
अगर समुद्र तट पर फैले तेल को जल्दी न साफ किया जाए तो यह घोंघे और स्थलीय जानवरों को भी नुकसान पहुंचा सकता है.
समुद्र में फैला तेल कब तक वहां रह सकता है?
समुद्र में जैसे ही तेल रिसाव होता है, समुद्र की सतह पर तेजी से तेल की एक पतली परत बनती चली जाती है. कुछ ही दिनों में समुद्र के तेल रिसाव वाले हिस्से में सेंटीमीटर या मिलीमीटर मोटी तेल की परत बन जाती है जो इधर से उधर बहती रहती है. तेल को साफ करने में जितना ज्यादा देरी होती है, उसे साफ करना उतना ही मुश्किल होता जाता है.
समुद्र में तेल कितना ज्यादा फैलेगा, यह कई कारकों पर निर्भर करता है जैसे- कितनी मात्रा में तेल का रिसाव हुआ है, तेल की प्रकृति क्या है यानी वो डीजल, गैसोलीन जैसा लाइट तेल है या बड़े जहाजों के इंजन में इस्तेमाल के लिए भारी तेल, कोलतार आदि है. समुद्र में फैले तेल की सफाई में दिन, महीनों से लेकर सालों लग जाते हैं.
कैसे होती है समुद्र में रिसे तेल की सफाई?
समुद्र में फैले तेल की सफाई के लिए रिसाव की मात्रा, मौसम और लहरों को ध्यान में रखते हुए कई तरीके अपनाए जाते हैं. बूम्स से तेल की सफाई उनमें से एक तरीका है. बूम्स तकिए जैसे तैरने वाले बैरियर होते हैं जिनका इस्तेमाल तेल को फैलने से रोकने और उसे समुद्र से हटाने के लिए किया जाता है. इसका इस्तेमाल कर समुद्र के तेल रिसाव वाले हिस्से को घेर दिया जाता है.
बूम्स का एक हिस्सा पानी के अंदर कुछ फीट तक फैला होता है जो तेल को समुद्र की गहराई तक जाने से रोकता है. जब बूम्स की मदद से तेल को एक जगह कर लिया जाता है फिर स्किमर्स की मदद से तेल को हटाया जाता है. स्किमर्स समुद्र से तेल अलग करने वाला एक डिवाइस है जो सतह से तेल हटाने का काम करता है.
हालांकि, जब समुद्र अशांत होता है और तेज लहरें उठ रही होती हैं तब यह तकनीक काम नहीं करती. ऐसी स्थिति में हवाई जहाज या समुद्री जहाज से तेल रिसाव वाले क्षेत्र में Dispersants का इस्तेमाल होता है. Dispersants केमिकल्स होते हैं जो तेल को छोटे-छोटे कणों में बांट देते हैं. तेल के ये अत्यंत छोटे कण समुद्र की सतह पर जमा होने के बजाए पानी में घुल मिल जाते हैं. Dispersants के छिड़काव के बाद तेल के छोटे कण कुछ समय बाद अपनेआप नष्ट हो जाते हैं.
इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि यह ठीक वैसे ही काम करता है जैसे कपड़ों पर जमी मैल को साफ करने में डिटर्जेंट पाउडर काम करता है. इस विधि से तेल को तोड़ने के बाद तेल तटों तक नहीं पहुंचता और वहां के इकोसिस्टम को नुकसान नहीं पहुंचाता.
हालांकि, कुछ शोध में देखा गया है कि Dispersants कोरल रीफ के लिए जहरीले साबित हो सकते हैं जिससे वहां के जीवों और पौधों को नुकसान होता है.
आधुनिक समय में समुद्र में रिसे तेल को निकालने के लिए एक नई विधि विकसित की गई है जिसमें केमिकल से बनी स्पॉन्जी लकड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है जिन्हें Nanofibrilliated Cellulose कहा जाता है. ये लकड़ियां समुद्र की सतह से तेल को सोख लेती हैं. कई लैब टेस्ट में देखा गया है कि ये लकड़ियां अपने वजन से 50 गुना ज्यादा तेल सोख ले रही हैं.
समुद्र की सतह पर फैले तेल को साफ करने का एक और तरीका है जो काफी विवादित रहा है. वो है- तेल को जला देना. समुद्री सतह पर फैला तेल अगर कम से कम 2-3 मिलीमीटर मोटा है तो उसे जलाकर खत्म कर सकते हैं. लेकिन अगर समुद्र में तूफान है या लहरे तेज हैं तो यह तकनीक काम नहीं करती.
यह तरीका विवादित इसलिए है क्योंकि तेल को समुद्र में जलाने से पर्यावरण और मनुष्यों को भारी नुकसान होता है. इससे बड़े पैमाने पर वायु प्रदूषण होता है जिससे तेल जलाने का काम कर रहे कर्मचारियों को अस्थमा जैसी दिक्कतें हो जाती हैं.
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