अफगानिस्तान में फिर शर्मिंदगी... तालिबान ने 'गुलाम' रखना किया लीगल! अपराध करने पर भी मौलवियों को नहीं होगी सजा

इंसानों के बुनियादी अधिकारों और तालिबान की नीतियों का कोई मेल नहीं है. महिलाओं स्कूली शिक्षा से बाहर करने वाले तालिबान ने अब मध्य काल की बर्बर गुलामी प्रथा को मान्यता दे दी है. तालिबान के नए अपराध कानून में कई जगह पर 'गुलाम' शब्द का प्रयोग किया है.

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तालिबान शासन आज भी सैकड़ों साल पुराने नियमों पर चलता है. (File Photo: ITG) तालिबान शासन आज भी सैकड़ों साल पुराने नियमों पर चलता है. (File Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 27 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 8:29 PM IST

अफगानिस्तान ने अपने कानून में गजब का अमानवीय बदलाव किया है. जो गुलामी की प्रथा दुनिया से सैकड़ों साल पहले गायब हो चुकी थी उसे तालिबान प्रशासन ने फिर से मान्यता दे दी है.

अफगानिस्तान में हाल ही में तालिबान प्रशासन द्वारा जारी किए गए एक नए क्रिमिनल प्रोसीजर कोड को लेकर काफी विवाद हुआ है. जनवरी 2026 में यह कोड तालिबान के सर्वोच्च नेता मुल्ला हिबतुल्लाह अखुंदजादा द्वारा मंजूर किया गया और अदालतों में लागू करने के आदेश दिए गए. इस कानून में गुलामी को सीधे तौर पर मान्यता दी गई है. इस दस्तावेज में कई जगह "गुलाम" (Ghulam/slave) और "मालिक" (Master) जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है. 

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इस शब्द को लेकर दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों ने चिंता जताई है और तीखी प्रतिक्रिया दी है. मानवाधिकार समूहों का कहना है कि तालिबान कोड जो नागरिकों को चार असमान वर्गों में बांटता है. इस कैटेगरी में गुलामों को एक कानूनी कैटेगरी के रुप में रखा गया है. यह नया कानून मुल्लाओं या मौलवियों को अपराधों से भी इम्युनिटी देता है. इसका मतलब यह है कि अगर कोई मुल्ला अपराध करता है तो उनके खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है.  

तालिबान के नए कोड का आर्टिकल 9 अफगान समाज को चार क्लास में बांटता है, जिसमें सबसे ऊपर मुल्ला और मौलवी है. जिन्हें किसी अपराध के लिए कोई सजा नहीं दी जाएगी, बल्कि उन्हें सिर्फ समझाया जाएगा. जबकि सबसे निचले स्तर के लोगों को जेल और शारीरिक दंड दोनों भुगतना होगा. ये दावा रवादारी नाम के संगठन ने किया है. तालिबान-नियंत्रित अफगानिस्तान में अब एक ही अपराध के लिए सज़ा अपराधी के क्लास के आधार पर अलग-अलग होगी. 

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मानवाधिकार संगठन रवादारी ने कहा कि इससे समाज को "आजाद" और "गुलाम" में बांटा गया है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून में पूरी तरह प्रतिबंधित है. गुलामी को किसी भी रूप में मान्यता देना मानव गरिमा और समानता के खिलाफ है. तालिबान के कोड में समाज को चार वर्गों में बांटा गया है. ये वर्ग हैं- उलेमा, अशराफ, मध्यम वर्ग और निचला वर्ग. 

इस कोड के जरिये तालिबान गुलामी जैसी स्थिति को अप्रत्यक्ष रूप से वैध बनाने की कोशिश कर रहा है.  यह अफगानिस्तान में महिलाओं, बच्चों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर पहले से चल रहे प्रतिबंधों को और मजबूत करने वाला कदम माना जा रहा है. 

इस महीने की शुरुआत में  तालिबान के सर्वोच्च नेता अखुंदज़ादा ने 119 आर्टिकल वाले एक कानूनी दस्तावेज को मंजूरी दी है. इसका मकसद तालिबान-शासित अफगानिस्तान में न्यायिक प्रक्रियाओं को गाइड करना है. 

तालिबान शासन का विरोध करने वाले राजनीतिक नेताओं और गुटों के गठबंधन द सुप्रीम काउंसिल ऑफ नेशनल रेजिस्टेंस फॉर द सॉल्वेशन ऑफ अफगानिस्तान ने कहा है कि, 'ये प्रावधान समानता, मानवीय गरिमा और गुलामी पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के सिद्धांतों के खिलाफ हैं, और "मध्य युग से भी कहीं ज़्यादा बुरे हैं."

अफगानिस्तान के पूर्व अटॉर्नी जनरल मोहम्मद फरीद हामिदी ने X पर लिखा कि यह एक ऐसा डॉक्यूमेंट है जो सभी नागरिकों को दोषी ठहराता है. उन्होंने कहा कि लोगों को नीचा दिखाना एक साफ अपमान है, मानवीय गरिमा पर सीधा हमला है, और मानवीय मूल्य का गंभीर उल्लंघन है. 

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पहले महिलाओं का मानवाधिकार छीना, अब गुलामी प्रथा

बता दें कि महिला अधिकारों के मामले में तालिबान का रिकॉर्ड पहले ही बहुत खराब रहा है. पिछले साल तालिबान ने महिलाओं द्वारा लिखी गई 140 किताबों पर बैन लगा दिया था. अगस्त 2025 के आखिर में जारी किए गए इस आदेश में 18 ऐसे सब्जेक्ट्स को पढ़ाने पर भी रोक लगा दी गई थी, जिनके बारे में तालिबान अधिकारियों ने कहा कि वे शरिया कानून और उनकी नीतियों से टकराते हैं. अब तालिबान मध्यकाल की बर्बर दास प्रथा को मान्यता देने की कोशिश की है

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