प्रयागराज के संगम पर लगे माघ मेले में आस्था के अनेक रंग देखने को मिल रहे हैं. साधु-संत और नागा संन्यासी यहां अपनी धूनी रमाए हुए हैं. इस बार माघ मेले में ऐसे-ऐसे संत पहुंचे हैं, जिन्हें लोग आमतौर पर महाकुंभ में देखा करते थे. अब वे माघ मेले में भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं. उनकी कठिन तपस्या सभी को हैरान कर रही है. कोई वर्षों से खड़े होकर तप कर रहा है, कोई एक हाथ उठाकर संकल्प पूरा कर रहा है तो कोई पिछले 20 साल से अन्न का एक दाना भी नहीं खा रहा.
वर्षों से खड़े होकर हठयोग करने वाले संत महेशानंद गिरि महाराज बगलामुखी तपस्या कर रहे हैं. उन्होंने 12 वर्षों तक खड़े रहकर तप करने का संकल्प लिया है. अभी उनके इस संकल्प को 5 वर्ष पूरे हुए हैं. उनका कहना है कि उनका यह हठयोग राष्ट्र कल्याण के लिए है. माघ मेले की व्यवस्थाओं को लेकर उन्होंने संतोष भी जताया है.
वर्षों से एक हाथ आसमान की ओर
उर्दबाहु हठयोग की तपस्या करने वाले संत सोमेश्वर गिरि भी मेले में लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं. वे वर्षों से अपना एक हाथ आसमान की ओर उठाए हुए हैं और उसे कभी नीचे नहीं करते. उनके हाथ के नाखून काफी बढ़ चुके हैं और हाथ भी पतला हो गया है. उनका यह हठयोग मोक्ष की प्राप्ति के लिए है. उनका कहना है कि यदि उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है तो इससे दूसरों को भी मुक्ति का मार्ग मिलेगा. वे पिछले कुंभ मेले में भी प्रयागराज आए थे और इस बार भी माघ मेले में चर्चा का विषय बने हुए हैं.
20 साल से नहीं खाया अन्न का एक दाना
संगम तट पर लगे माघ मेले में जहां साधु-संतों और कल्पवासियों की तरह-तरह की साधनाएं देखने को मिल रही हैं, वहीं एक अनोखे गृहस्थ कल्पवासी भी लोगों का ध्यान खींच रहे हैं. उत्तर प्रदेश के रायबरेली निवासी रंजीत सिंह पिछले करीब 20 वर्षों से अन्न का सेवन नहीं कर रहे हैं. वर्ष 2006 से वे केवल फल और सूखे मेवों पर जीवन यापन कर रहे हैं. भारतीय सेना से सेवानिवृत्त 60 वर्षीय पूर्व हवलदार रंजीत सिंह आज भी पूरी तरह सक्रिय और स्वस्थ हैं.
2005 में हुए थे रिटायर
रंजीत सिंह बताते हैं कि 2005 में सेना से रिटायर होने के बाद उन्होंने आध्यात्मिक जीवन की ओर कदम बढ़ाया. 10 जुलाई 2006 को उन्होंने भोजन में अनाज पूरी तरह छोड़ने का फैसला लिया. संतों के संपर्क में आने पर एक महात्मा ने उनसे कहा था कि फलाहार संतों का मार्ग है और गृहस्थ इसे नहीं अपना पाते. उसी समय उन्होंने बजरंगबली का स्मरण कर संकल्प लिया कि वे अन्न नहीं ग्रहण करेंगे. तब से उन्होंने एक दाना भी नहीं खाया.
उनका कहना है कि सेना में मिले अनुशासन ने उन्हें सात्विक और सीमित भोजन की ओर प्रेरित किया. शुरुआत में यह एक प्रयोग था, लेकिन धीरे-धीरे यही उनकी जीवनशैली बन गई. वे दावा करते हैं कि न उन्हें कमजोरी महसूस होती है और न ही शुगर या ब्लड प्रेशर जैसी कोई बीमारी है. 60 वर्ष की उम्र में भी वे कामकाज और गृहस्थी दोनों संभाल रहे हैं. उनका मानना है कि अधिक अनाज और तनाव ही अधिकांश बीमारियों की वजह बनते हैं.
क्या है दिनचर्या?
माघ मेले में भी उनकी दिनचर्या बेहद अनुशासित रहती है. वे ब्रह्म मुहूर्त में उठते हैं, संगम स्नान करते हैं और ध्यान व योग करते हैं. दिन में तय समय पर वे सेब, केला, पपीता और अमरूद जैसे मौसमी फल खाते हैं. इसके साथ नारियल, मूंगफली, किशमिश और बादाम सीमित मात्रा में लेते हैं. वे सूखे मेवों को भिगोकर और फल ताजे रूप में खाते हैं. रंजीत सिंह कहते हैं कि हल्का और सरल आहार पाचन को बेहतर बनाता है और शरीर को स्वस्थ रखता है, लेकिन इसके साथ नियमित और अनुशासित दिनचर्या सबसे अधिक जरूरी है.
पंकज श्रीवास्तव