युवराज की कार तीन दिन बाद बरामद, बिल्डर को भेजा गया जेल... अब इन सवालों के जवाब तलाशेगी SIT

एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमों ने मंगलवार को जब नाले से ग्रे रंग की ग्रैंड विटारा कार निकाली, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं. यह कार केवल लोहे का ढांचा नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की उस 'सरकारी कुव्यवस्था' का मेडल है, जो उन दावों की पोल खोल रही है जिनमें जनता की सुरक्षा की कसमें खाई जाती हैं.

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युवराज मेहता की कार को बरामद कर लिया गया है. (Photo: ITG) युवराज मेहता की कार को बरामद कर लिया गया है. (Photo: ITG)

आजतक ब्यूरो

  • नई दिल्ली,
  • 20 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 11:27 PM IST

उत्तर प्रदेश के शो-विंडो कहे जाने वाले नोएडा के सेक्टर-150 में 27 वर्षीय इंजीनियर युवराज मेहता की मौत ने पूरे देश के सरकारी तंत्र और प्रशासनिक संवेदनहीनता को कटघरे में खड़ा कर दिया है. जिस कार में बैठकर युवराज शुक्रवार रात गुरुग्राम से अपने घर के लिए निकले थे, उसे निकालने में प्रशासन को पूरे चार दिन (करीब 90 घंटे) लग गए. यह कार केवल लोहे का ढांचा नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की उस 'सरकारी कुव्यवस्था' का मेडल है, जो उन दावों की पोल खोल रही है जिनमें जनता की सुरक्षा की कसमें खाई जाती हैं.

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मंगलवार को जब एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमों ने उस मौत के नाले से ग्रे रंग की ग्रैंड विटारा कार निकाली, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं. यह वही कार है जिसके ऊपर चढ़कर युवराज दो घंटे से ज्यादा समय तक टॉर्च जलाकर मदद की गुहार लगाते रहे थे. मौके पर पुलिस, दमकल और राहत विभाग के करीब 80 लोग मौजूद थे, लेकिन किसी ने भी उस डूबते हुए युवक को बचाने के लिए पानी में छलांग नहीं लगाई. 

अगर उस रात रेस्क्यू टीम नीचे उतरती तो शायद दो घंटे से ज्यादा टॉर्च की रोशनी दिखाकर मदद मांगता युवराज आज जिंदा होता. मृतक के पिता राजकुमार मेहता का दर्द सिस्टम पर सबसे बड़ा प्रहार है. उनका कहना है कि अगर टीम के पास उनके पास अगर स्विमर और बोट नहीं थी तो उन्हें वहां क्यों भेजा गया था? अगर टीम में तैराक होते तो शायद बचाया जा सकता था. 

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घटना के 20 दिन पहले भी यही जगह खतरे में थी

इस पूरे मामले का सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या यह हादसा पहले से रोक जा सकता था? आजतक की ग्राउंड रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि 31 दिसंबर को इसी एल-शेप मोड़ पर एक ट्रक धुंध के बीच नाले की दीवार से टकराकर लटक गया था. तब ड्राइवर की जान बच गई थी और उस समय भी प्रशासन ने केवल क्रेन से ट्रक हटाया, लेकिन बोल्डर, बैरिकेड, चेतावनी बोर्ड जैसी सुरक्षा व्यवस्था नहीं की. अगर तब यह किया जाता, तो शायद आज युवराज की जान बच सकती थी. अब उस रास्ते पर सीमेंट के रोड ब्लॉकर, बैरिकेड और रस्सी लगाई गई है. लेकिन यह व्यवस्था सिर्फ उसी मोड़ तक है, बाकी जगहों पर खतरा वैसा ही बना हुआ है.

क्यों 4 दिन बाद डीएम-सांसद-विधायक पहुंचे?

सिस्टम की बेशर्मी का आलम यह रहा कि जिस जगह पर एक होनहार युवक की बलि चढ़ गई, वहां गौतम बुद्ध नगर की डीएम मेधा रूपम को पहुंचने में चार दिन लग गए. जब मीडिया ने उनसे सवाल पूछे, तो उन्होंने चुप्पी साध ली. यही हाल जनप्रतिनिधियों का रहा. सांसद महेश शर्मा और क्षेत्रीय विधायक तेजपाल नागर भी चार दिन बाद घटनास्थल पर नजीर बनाने वाली कार्रवाई का आश्वासन देते दिखे. सवाल यह है कि ढाई करोड़ के फ्लैट वाले इस इलाके को विकास के नाम पर 'मौत का जाल' किसने बनाया?

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बिल्डर गिरफ्तार, अब इन सवालों के जवाब तलाशी की SIT

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कड़े रुख के बाद नोएडा अथॉरिटी के सीईओ को पद से हटा दिया गया है. मामले में मुख्य आरोपी और एमजेड विशटाउन के मालिक अभय कुमार को हरियाणा के पलवल से गिरफ्तार कर लिया गया है. उसे एक दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया है. एडीजी भानु भास्कर के नेतृत्व में गठित एसआईटी (SIT) ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. एसआईटी मुख्य रूप से इन तीन सवालों के जवाब तलाशेगी कि जब 80 अधिकारी मौके पर मौजूद थे, तो दो घंटे तक रेस्क्यू क्यों नहीं शुरू हुआ? 6 साल से वो गड्ढा और नाला खुला क्यों रखा गया था और 31 दिसंबर के हादसे के बाद भी सुरक्षा इंतजाम क्यों नहीं किए गए? 

चश्मदीद का बयान और पुलिस दबाव का आरोप

इस मामले में एक और बड़ी बात सामने आई है- चश्मदीद मनिंदर का बयान बदलना. शुरुआती दिनों में वह मीडिया के सामने कह रहे थे कि पुलिस, दमकल और SDRF की टीम दो घंटे तक युवराज को बचाने के लिए पानी में नहीं उतरी. लेकिन बाद में उन्होंने बयान बदल दिया. अब वह कह रहे हैं कि उनके पहुंचने से पहले पुलिस और बाकी रेस्क्यू टीम अपने काम में जुटी थी, लेकिन घना कोहरा और अंधेरा होने के चलते युवराज व उसकी गाड़ी नजर नहीं आ रही थी. जानकारी मिली है कि पुलिस ने उसे पांच घंटे तक थाने में बैठाकर रखा था. ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या यह दबाव बनाने की कोशिश थी? अगर ऐसा हुआ है, तो यह न सिर्फ प्रशासन की लापरवाही है, बल्कि जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी सवाल है.

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मौत के बाद ही जागता है नोएडा-ग्रेटर नोएडा प्रशासन?

उत्तर प्रदेश के नोएडा में मौत के बाद ही जागने की बीमारी सरकारी अधिकारियों में किस कदर है. इसका उदाहरण मार्च में पिछले साल दिख चुका है. जब इसी तरह एक कार क्रेन से मौत के नाले के भीतर से निकाली गई थी. तब ग्रेटर नोएडा के पी-4 सेक्टर में कार तीन फीट गहरे नाले में गिरने से स्टेशन मास्टर की जान गई थी. इस मौत के बाद प्रशासन जागा था और आज इस जगह पर बोल्डर से लेकर सावधानी के बोर्ड तक नजर आते हैं. अब सवाल है कि क्या यूपी से लेकर देश के हर राज्य में ऐसी जानलेवा लापरवाही बंद होगी? या फिर किसी की मौत के बाद ही नींद टूटेगी?

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