'एआई बाद में, पहले खाद-बीज और सही दाम मिलें...' बजट पर गांव के किसानों और मजदूरों ने क्या कहा

केंद्रीय बजट के बाद लखनऊ के ग्रामीण इलाके में लगी चौपाल में किसानों और मजदूरों ने अपनी उम्मीदें और नाराजगी खुलकर रखी. किसानों ने कृषि यंत्रों पर GST हटाने, खाद-बीज की समय पर उपलब्धता, प्रभावी फसल बीमा और किसान सम्मान निधि की राशि बढ़ाने की मांग की, वहीं मनरेगा मजदूरों ने भुगतान में देरी को बड़ा मुद्दा बताया.

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बजट को लेकर किसानों ने कही अपनी बात. (Photo: Screengrab) बजट को लेकर किसानों ने कही अपनी बात. (Photo: Screengrab)

समर्थ श्रीवास्तव

  • लखनऊ,
  • 01 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 4:30 PM IST

केंद्र का बजट पेश होने के बाद जहां शहरों में आंकड़ों और योजनाओं पर चर्चा चल रही है, वहीं गांवों में इसका सीधा सवाल है... हमारे लिए क्या बदला? इसी सवाल को लेकर लखनऊ के ग्रामीण इलाके में किसानों और मजदूरों के बीच बजट चौपाल लगी. खेत के किनारे, पेड़ों की छांव में बैठे किसानों ने खुलकर अपनी बात रखी.

किसी ने कृषि यंत्रों पर GST खत्म करने की मांग उठाई, तो किसी ने मनरेगा भुगतान में देरी और फसल के उचित दाम न मिलने की समस्या बताई. कई किसानों ने साफ कहा कि बजट में बड़े विजन की बातें हैं, लेकिन छोटे किसान तक उसका लाभ कैसे पहुंचेगा, यह स्पष्ट नहीं.

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बजट में कृषि के लिए AI टूल और टेक्नोलॉजी आधारित सलाह की घोषणा पर किसानों की प्रतिक्रिया मिली-जुली रही. चौपाल में मौजूद कई किसानों ने कहा कि उन्हें AI का मतलब तक ठीक से नहीं पता. एक किसान ने कहा कि हम तो मौसम विभाग की सूचना और अपने अनुभव से खेती करते आए हैं. एआई टूल क्या है, कैसे काम करेगा, गांव में कौन समझाएगा- ये भी बताना चाहिए.

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किसानों का कहना था कि नई तकनीक अच्छी बात है, लेकिन पहले बुनियादी समस्याएं हल हों- जैसे खाद-बीज समय से मिलना, सिंचाई की सुविधा और सही दाम.

कृषि यंत्रों पर GST खत्म करने की मांग

चौपाल में सबसे जोरदार मांग कृषि यंत्रों पर GST खत्म करने को लेकर उठी. किसानों ने कहा कि ट्रैक्टर, उपकरण और छोटे कृषि यंत्र पहले ही महंगे हैं, ऊपर से टैक्स लगने से लागत और बढ़ जाती है. छोटे और सीमांत किसान के लिए आधुनिक उपकरण खरीदना मुश्किल हो जाता है. किसानों का तर्क था कि अगर सरकार खेती को बढ़ावा देना चाहती है तो कृषि उपकरणों को टैक्स फ्री या कम टैक्स श्रेणी में लाना चाहिए.

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खाद-बीज की किल्लत और गुणवत्ता का मुद्दा

कई किसानों ने शिकायत की कि सीजन में खाद और बीज के लिए लंबी लाइनें लगानी पड़ती हैं. एक किसान ने कहा कि तीन-तीन दिन चक्कर लगाने के बाद खाद मिलती है. उनका आरोप था कि समय पर उपलब्धता और गुणवत्ता दोनों बड़ी समस्या हैं. बजट में सप्लाई चेन मजबूत करने की बात तो है, लेकिन जमीन पर असर दिखना जरूरी है.

फसल बीमा: कागजों से निकलकर जमीन पर आए

फसल बीमा योजना को लेकर भी किसानों ने नाराजगी जताई. उनका कहना था कि नुकसान होने पर क्लेम मिलना आसान नहीं है और भुगतान में बहुत देर लगती है. किसानों की मांग है कि बीमा व्यवस्था सरल और पारदर्शी हो तथा नुकसान का आकलन तेजी से हो, ताकि किसान को समय पर मुआवजा मिल सके.

MSP और बाजार भाव का अंतर

चौपाल में MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) बड़ा मुद्दा रहा. किसानों ने कहा कि सरकार MSP घोषित करती है, लेकिन हर किसान की फसल उस दाम पर नहीं खरीदी जाती. बाजार में कई बार MSP से काफी कम रेट मिलते हैं. किसानों ने मांग की कि खरीद व्यवस्था ऐसी हो कि छोटे किसान से लेकर बड़े किसान तक सभी की उपज MSP पर खरीदी जाए़.

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एक किसान ने कहा कि सरकारी रेट और बाजार रेट में हजार-पंद्रह सौ रुपये तक का फर्क हो जाता है, इसका फायदा बिचौलिये उठाते हैं.

किसान सम्मान निधि बढ़ाने की उम्मीद

किसान सम्मान निधि योजना को किसानों ने उपयोगी बताया, लेकिन राशि बढ़ाने की मांग रखी. अभी सालाना 6,000 रुपये मिलते हैं. किसानों का कहना है कि यह मदद अच्छी है, लेकिन आज की लागत के हिसाब से बहुत कम है. यदि बजट में इसकी राशि बढ़ती है तो छोटे किसानों को सीधा फायदा होगा.

युवा किसानों ने भी कहा कि यह रकम बुवाई और कटाई के समय काम आती है. अगर बढ़ाई जाती है तो स्वागत योग्य कदम होगा.

किसान क्रेडिट कार्ड और सस्ते ऋण पर सवाल

बजट में किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) की ऋण सीमा बढ़ाने और सस्ते कर्ज की बात दोहराई गई है, लेकिन किसानों का अनुभव अलग है. कई किसानों ने कहा कि उन्हें कम ब्याज दर पर कर्ज का लाभ नहीं मिल रहा. कागजों में 3 से 4% ब्याज की बात है, लेकिन असल में ज्यादा ब्याज देना पड़ रहा है. किसानों कहना था कि बैंकिंग प्रक्रिया सरल हो और वास्तविक दर पर ऋण मिले, तभी इसका फायदा होगा.

भंडारण सुविधा: छोटे किसान कैसे उठाएंगे लाभ?

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भंडारण (स्टोरेज) क्षमता बढ़ाने की घोषणा पर भी चर्चा हुई. किसानों ने माना कि यह अच्छी पहल है, लेकिन छोटे किसान के लिए फसल रोककर रखना आसान नहीं. उन्हें तुरंत नकदी की जरूरत होती है... अगली बुवाई, खाद, मजदूरी और अन्य खर्चों के लिए. ऐसे में बड़े किसान तो भंडारण का लाभ उठा सकते हैं, छोटे किसान मजबूर होकर तुरंत बेच देते हैं.

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गांव की चौपाल में सामाजिक मुद्दे भी उठे. सोने-चांदी की बढ़ती कीमतों को लेकर किसानों ने चिंता जताई. उनका कहना था कि बेटियों की शादी में सोना खरीदना परंपरा है, लेकिन दाम इतने बढ़ गए हैं कि कई परिवारों को जमीन तक बेचनी पड़ रही है.

मनरेगा मजदूरों की शिकायत: भुगतान में देरी

मजदूर वर्ग ने मनरेगा भुगतान में देरी की समस्या उठाई. उनका कहना था कि काम के बाद समय पर पैसा नहीं मिलता, जिससे घर चलाना मुश्किल हो जाता है. बजट में ग्रामीण रोजगार और इंफ्रास्ट्रक्चर की बात है, लेकिन मजदूर चाहते हैं कि भुगतान प्रणाली तेज और भरोसेमंद बने.

पशुपालन और सब्सिडी- बड़े किसानों तक सीमित?

पशुधन और डेयरी सेक्टर पर जोर को लेकर भी सवाल उठे. किसानों का कहना था कि सब्सिडी और ऋण योजनाओं का फायदा अक्सर बड़े किसानों तक सीमित रह जाता है. छोटे किसानों के लिए प्रक्रिया जटिल है और जानकारी भी कम पहुंचती है.

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कुल मिलाकर: उम्मीद, उलझन और शर्तों वाला भरोसा

लखनऊ की इस बजट चौपाल से साफ तस्वीर उभरती है- किसान पूरी तरह निराश नहीं हैं, लेकिन संतुष्ट भी नहीं. उन्हें नई घोषणाओं से उम्मीद है, पर वे चाहते हैं कि योजनाएं कागज से निकलकर खेत तक पहुंचें. तकनीक, AI और बड़े विजन के साथ-साथ बुनियादी जरूरतों- खाद, बीज, सही दाम, सस्ता कर्ज, समय पर भुगतान पर ठोस काम दिखे.

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