'जो ईश्वर चाहेंगे वही होगा, बजरंगबली का आशीर्वाद है...' अलंकार अग्निहोत्री के हर कदम पर साथ खड़ी हुई पत्नी

बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट पद से इस्तीफा देने और निलंबन के बाद अलंकार अग्निहोत्री सुर्खियों में हैं. जबरदस्ती लखनऊ भेजे गए अलंकार ने इसे संयोजित बताया. उन्होंने कहा कि उन्हें पूरे परिवार का समर्थन है. वे मेरे हर फैसले के साथ खड़े हैं. बजरंगबली का आशीर्वाद है. जब तक वो कुछ नहीं चाहेंगे तब कोई बुरा नहीं कर सकता. 

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इस्तीफे के बाद अलंकार अग्निहोत्री का पूरा परिवार उनके साथ खड़ा है (Photo: ITG) इस्तीफे के बाद अलंकार अग्निहोत्री का पूरा परिवार उनके साथ खड़ा है (Photo: ITG)

समर्थ श्रीवास्तव

  • लखनऊ,
  • 29 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 1:58 PM IST

बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट पद से इस्तीफा देने के बाद सस्पेंड हुए अलंकार अग्निहोत्री इन दिनों सुर्खियों में हैं. जबरदस्ती लखनऊ भेजे गए अलंकार कई दिनों पर अपने पत्नी और बच्चे से मिले. मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि जो ईश्वर चाहेगा वही होगा और जहां तक लिखा है वह होकर ही रहेगा.बजरंगबली का आशीर्वाद है जब वह तक चाहेंगे सब अच्छा ही होगा. 

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निलंबित सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने लखनऊ में मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि उन्हें एक संयोजित योजना के तहत बरेली से हटाकर लखनऊ भेजा गया. उनके मुताबिक, यह कार्रवाई औपचारिक आदेशों से अधिक मौखिक निर्देशों के जरिए की गई. उन्होंने कहा, बरेली में ऐसा कोई इंसिडेंट नहीं था जिसकी वजह से मुझे हटाने की जरूरत पड़ती. प्रशासनिक स्तर पर यह तय किया गया कि मैं वहां न रहूं. सरकार का अधिकार है कि वह इस्तीफा स्वीकार करे या न करे, लेकिन मौखिक रूप से जिला बदर जैसा व्यवहार उचित नहीं है. उनका कहना था कि पूरे घटनाक्रम में सुरक्षा का सवाल भी उठाया गया, लेकिन उन्होंने इसे प्रशासन का विषय बताते हुए कहा कि सुरक्षा मांगने की जरूरत नहीं होती अगर प्रशासन को लगेगा, तो वह खुद उपलब्ध कराएगा.

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अलंकार अग्निहोत्री ने फिर कहा कि माघ मेले के दौरान सनातन संस्कृति का अपमान हुआ है. उनका कहना है कि बटुक ब्राह्मणों के साथ जिस तरह का व्यवहार सामने आया, उसने उन्हें आहत किया. उन्होंने कहा कि उन्होंने इस मुद्दे पर खुलकर बात की, शंकराचार्य जी ने आशीर्वाद दिया. उन्होंने कहा कि अगर सनातन संस्कृति के प्रतीकों का अपमान हो रहा है, तो उस पर सवाल उठाना हर नागरिक का अधिकार है.  अलंकार ने यह भी सवाल उठाया कि जब कथित तौर पर बटुक ब्राह्मणों के साथ दुर्व्यवहार हुआ, तब जनप्रतिनिधि कहां थे ? उन्हें बोलना चाहिए था कि यह गलत है. सनातन संस्कृति का अपमान क्यों हो रहा है ?

यूजीसी गाइडलाइन पर आपत्ति, जाति आधारित भेदभाव का आरोप

अलंकार अग्निहोत्री ने यूजीसी की हालिया गाइडलाइन को लेकर भी गंभीर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि 13 जनवरी को भारत सरकार के गजट में प्रकाशित दिशा-निर्देशों में जाति आधारित भेदभाव को लेकर जो वर्गीकरण किया गया है, वह स्वर्ण समाज के लिए नुकसानदायक हो सकता है. उनका तर्क है कि इसमें स्वघोषित अपराधी जैसी अवधारणाएं भविष्य में छात्रों के लिए परेशानी का कारण बन सकती हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि बेटे-बेटियां आपके हैं, और निराधार रूप से अपराधी मान लिया जाए यह किस तरह का न्याय है?” 

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राजनीतिक और सामाजिक संगठनों से मिला समर्थन

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान अलंकार अग्निहोत्री को विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों से फोन आए. उन्होंने बताया कि क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं ने उनसे संपर्क कर सहानुभूति जताई. उन्होंने कहा कि नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय का भी फोन आया था. उन्होंने कहा कि आपने जो मुद्दे उठाए हैं, वे सही हैं और हम उसका समर्थन करते हैं.  इसके अलावा किसान यूनियनों, ब्राह्मण सभाओं और स्वर्ण समाज से जुड़े कई संगठनों ने भी यूजीसी गाइडलाइन और पूरे प्रकरण को लेकर चिंता जताई है.

जनप्रतिनिधि कॉरपोरेट कर्मचारी बन गए हैं

अलंकार अग्निहोत्री ने जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए. उनका कहना था कि कई चुने हुए प्रतिनिधि अब अपने समाज की जिम्मेदारी नहीं उठाते. वे कॉरपोरेट के एंप्लॉई की तरह काम कर रहे हैं. जब सीईओ आदेश देगा, तब बोलेंगे. अपने समाज के बारे में सोचने का समय नहीं है. 

आत्मसम्मान की परंपरा: परिवार की कहानी

अलंकार अग्निहोत्री के परिवार की भी कई कहानियां सामने आईं हैं. कानपुर के श्याम नगर निवासी, सेवानिवृत्त विंग कमांडर और अलंकार के ताऊ एसके सिंह ने बताया कि उनके परिवार में आत्मसम्मान को हमेशा सर्वोपरि रखा गया है.
उन्होंने कहा, यह फैसला किसी राजनीतिक या धार्मिक संगठन के समर्थन में नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और संवैधानिक मूल्यों के लिए लिया गया है. एसके सिंह ने बताया कि अलंकार की मां ने भी एक समय आत्मसम्मान को ठेस पहुंचने पर बैंक की नौकरी छोड़ दी थी. यह परंपरा परिवार में पहले से रही है.

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परिवार ने झेले संघर्ष, फिर भी नहीं किया समझौता

परिवार ने बताया कि अलंकार के पिता का निधन तब हो गया था, जब वे मात्र 10 वर्ष के थे. इसके बाद उन्होंने कठिन परिस्थितियों में पढ़ाई की, भाइयों को संभाला और प्रशासनिक सेवा तक पहुंचे. छोटे भाई विजय के निधन के बाद उनकी पत्नी गीता ने बैंक में वर्षों तक कैशियर के रूप में सेवा दी. परिजनों का आरोप है कि प्रबंधन की ओर से अनावश्यक दबाव और आरोप लगाए गए, जिसके बाद उन्हें भी नौकरी छोड़नी पड़ी. परिवार का कहना है कि यही कारण है कि अलंकार अग्निहोत्री ने भी समझौते की बजाय पद छोड़ने का रास्ता चुना.

यह किसी शंकराचार्य का मुद्दा नहीं

परिजनों ने स्पष्ट किया कि पूरे मामले को किसी तथाकथित शंकराचार्य या व्यक्ति विशेष से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. उनका विरोध कथित तौर पर बटुकों के साथ शिखा पकड़कर किए गए व्यवहार को लेकर है. उन्होंने कहा कि यदि किसी अन्य समुदाय चाहे सिखों हो या मुसलमान के साथ ऐसा व्यवहार होता, तब भी वे विरोध दर्ज कराते.

पत्नी और बच्चों का साथ बना संबलइन तमाम विवादों और प्रशासनिक कार्रवाइयों के बीच अलंकार अग्निहोत्री की पत्नी और बच्चे उनके साथ मजबूती से खड़े हैं. परिवार का कहना है कि वे हर फैसले में अलंकार के साथ हैं और इस कठिन समय को एक परीक्षा की तरह देख रहे हैं.

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