'मेरा पूरा शरीर भूरा हो गया था', शख्स ने बताया परमाणु विस्फोट के रेडिएशन का असर कैसा होता है

परमाणु बम और इसके विस्फोट के विनाशकारी प्रभाव की काफी चर्चा होती रहती है. दुनिया में काफी कम लोग बचे हैं, जिन्होंने ऐसी किसी घटना का प्रत्यक्ष अनुभव किया हो. उस वक्त के सोवियत रूस और मौजूदा समय में यूक्रेन में स्थित चेर्नोबिल में हुई परमाणु दुर्घटना में बचे ऐसे ही एक शख्स ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि तब उनके बॉडी पर इसका क्या असर हुआ था.

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चेर्नोबिल परमाणु हादसे में जिंदा बचे शख्स ने सुनाई कहानी (Photo - Pexels) चेर्नोबिल परमाणु हादसे में जिंदा बचे शख्स ने सुनाई कहानी (Photo - Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 30 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 6:02 PM IST

दुनिया की सबसे भीषण परमाणु दुर्घटना ने एक शहर को ऐसे तबाह कर दिया, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. आज भी ये इलाका प्रतिबंधित है और यहां रेडिएशन का प्रभाव साफ दिखाई देता है. उस वक्त जब ये हादसा हुआ था, इसके दायरे में आने वाले लोगों पर तुरंत इसका क्या प्रभाव पड़ा,  इस बारे में काफी चर्चा होती है, लेकिन काफी कम लोग हैं, जिन्होंने इसका प्रत्यक्ष अनुभव किया है. 

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चेर्नोबिल के परमाणु संयंत्र में काम करने वाले ओलेक्सी ब्रेउस नाम के एक शख्स ने खुलासा किया है कि रेडिएशन का मानव शरीर पर तुरंत क्या प्रभाव पड़ता है. द मिरर की एक रिपोर्ट के मुताबिक,   ओलेक्सी ने बताया कि जब वो हादसा हुआ, मैं चेर्नोबिल आपदा स्थल पर था. इसका मेरी बॉडी पर बहुत ही भयानक असर पड़ा.  मेरी त्वचा तुरंत भूरी हो गई थी.  इस कर्मचारी ने  26 अप्रैल 1986 की सुबह सोवियत संघ को बदल देने वाले उस हादसे के भयावह परिणामों को प्रत्यक्ष देखा था.उस विनाशकारी विस्फोट के कुछ ही घंटों बाद वह संयंत्र के कंट्रोल रूम में दाखिल हुआ था.

67 साल के ओलेक्सी ने 1982 में संयंत्र में काम करना शुरू किया था. वह कंट्रोल रूम में अंतिम व्यक्ति था जब सुरक्षा परीक्षण के दौरान रिएक्टर नंबर 4 फेल हो गया था. उन्होंने बीबीसी को बताया कि अवार्ड विनिंग सीरीज चेर्नोबिल ने विस्फोट के कारण मानव शरीर पर होने वाले गंभीर, तीव्र और स्पष्ट प्रभावों को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं दिखाया.

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सामूहिक कब्रगाह जैसे था नजारा
ओलेक्सी ने  बताया कि वहां का नजारा ऐसा लग रहा था जैसे यह एक सामूहिक कब्रगाह हो. उस दिन काम पर पहुंचने का वर्णन करते हुए बताया कि मुझे यकीन था कि पूरी रात की शिफ्ट के लोग वहीं मर गए होंगे. विस्फोट के समय मैं प्रिपीट में अपने फ्लैट में था. मैं गहरी नींद में सो रहा था, मैंने कुछ सुना नहीं, कुछ देखा नहीं. सुबह मुझे काम पर जाना था और मैं चला गया. मुझे उस आपदा के बारे में कुछ भी पता नहीं था. मैं बस में बैठा और काम पर चला गया.

जब मैं स्टेशन के करीब आ रहा था, तो मैंने बस से देखा कि वह इमारत पूरी तरह से नष्ट हो चुकी थी. मुझे समझ नहीं आया कि मुझे और अन्य श्रमिकों को वहां क्यों लाया गया था. लेकिन बाद में पता चला कि अभी भी बहुत काम करना बाकी था. घटना के तुरंत बाद ओलेक्सी ने शिफ्ट लीडर ओलेक्सांद्र अकिमोव और ऑपरेटर लियोनिद टोपटनोव से बात की.

ओलेक्सी ने कहा कि उनकी हालत बहुत खराब थी. यह स्पष्ट था कि वे बीमार थे. उनका चेहरा पीला पड़ गया था. टोपटनोव का तो चेहरा बिल्कुल सफेद हो गया था. दोनों की कुछ ही हफ्तों के भीतर तीव्र विकिरण सिंड्रोम (एआरएस) से मृत्यु हो गई.

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उन्होंने आगे कहा कि मैंने उस रात काम करने वाले अन्य सहकर्मियों को देखा. उनकी त्वचा का रंग गहरा लाल था. बाद में मॉस्को के अस्पताल में उनकी मौत हो गई. रेडिएशन के संपर्क में आना, लाल त्वचा, विकिरण से जलना और भाप से जलना, इन सब चीजों के बारे में बहुत से लोग बात करते थे, लेकिन इसे कभी इस तरह से नहीं दिखाया गया था.

झुलस गया था पूरा शरीर 
ओलेक्सी ने बताया कि मैं खुद की बात करूं तो, दिन के अंत तक मेरा चेहरा धूप से झुलसा हुआ लग रहा था. उन्होंने कहा कि जब मेरी शिफ्ट खत्म हुई, तो मेरी त्वचा भूरी हो गई थी. मानो पूरे शरीर पर सनटैन हो गया हो. मेरे शरीर के जो हिस्से कपड़ों से ढके नहीं थे - जैसे हाथ, चेहरा और गर्दन - वे लाल हो गए थे.सोवियत अधिकारियों के अनुसार, विस्फोट के बाद के कुछ हफ्तों में 29 बिजली संयंत्र कर्मचारियों और दमकलकर्मियों की एआरएस (एक्यूट राइनाइटिस सिंड्रोम) से मृत्यु हो गई. दुर्घटना में लगी चोटों के कारण दो और लोगों की मौत हो गई.

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