वरुण गांधी ने हाल ही में एक चुनावी रैली में कहा था, "आपको किसी मोनू-टोनू से डरने की जरूरत नहीं है. मैं संजय गांधी का लड़का हूं और इन जैसों से जूते के फीते खुलवाता हूं." वरुण गांधी के व्यक्तित्व में वाकई अपने पिता संजय गांधी की झलक दिखती है. उनमें वही तेवर और मुखरता दिखती है जिसके लिए संजय गांधी जाने जाते थे. वहीं, प्रियंका-राहुल की छवि अपने पिता राजीव गांधी की तरह शांत और सौम्य राजनेता की तरह है.
राजीव गांधी की 21 मई के दिन ही बम धमाके में हत्या कर दी गई थी. राजीव से जब एक बार पूछा गया था कि आप किस रूप में याद किए जाना पसंद करेंगे तो उनका जवाब था- 'एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो भारत को 21वीं सदी में लेकर गया और जिसने उसके माथे से विकासशील देश का लेबल हटाया.' राजीव गांधी ने संचार क्रान्ति लाने समेत कई ऐसे कदम उठाए जो भारत को 21वीं सदी में लेकर गए.
संजय गांधी और राजीव गांधी के व्यक्तित्व में जमीन-आसमान का फर्क था. राजीव गांधी अपनी मां इंदिरा गांधी की राजनीतिक उत्तराधिकारी के लिए पहली पसंद नहीं थे. राजीव से 2 साल छोटे संजय गांधी 1970 में ही राजनीति में सक्रिय हो गए थे और कांग्रेस की
नीतियों में उनकी बड़ी भूमिका होती थी.
दूसरी तरफ, राजीव गांधी कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग के स्टूडेंट थे. उनकी दिलचस्पी साइंस में ज्यादा थी. राजीव गांधी भारतीय वायुसेना में पायलट के पद पर काम कर रहे थे. राजीव गांधी के बारे में कहा जाता है कि वो राजनीति में आने को लेकर अनिच्छुक थे लेकिन 1980 में भाई संजय गांधी की मौत और 1984 में मां इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हालात ऐसे बने कि उन्हें राजनीति में आना पड़ा.
राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी भी नहीं चाहती थीं कि वो राजनीति में
आए. सोनिया गांधी को शायद कुछ अनहोनी का अंदाजा था और 1991 में राजीव गांधी
की भी हत्या कर दी गई. संजय गांधी के निधन के बाद 1981 में राजीव गांधी
सांसद चुने गए. 1983 में कांग्रेस महासचिव बने और 1984 में कांग्रेस
अध्यक्ष.
संजय गांधी ने देहरादून के दून स्कूल से पढ़ाई की लेकिन वह किसी
यूनिवर्सिटी में नहीं गए. हालांकि, उन्होंने ऑटोमेटिव इंजीनियरिंग के करियर
को चुना था और इंग्लैंड में रॉल्स रॉयस के साथ तीन साल की अप्रेंटिसशिप की
थी. स्पोर्ट्स कार में संजय की बहुत दिलचस्पी थी.
संजय गांधी अपनी मां के ज्यादा करीब थे. नेहरू-गांधी परिवार के करीब रही पुपुल जयकर से इंदिरा गांधी ने कहा था,
"संजय की जगह कोई नहीं ले सकता है, वह मेरा बेटा था लेकिन मुझे उससे बड़े
भाई की तरह मदद मिलती थी."
आपातकाल के दौरान भी संजय गांधी की सक्रिय भूमिका रही जबकि राजीव गांधी इन सबसे दूर ही रहे.
संजय गांधी इंदिरा गांधी की जिंदगी में फिरोज गांधी के बाद आखिरी ऐसे पुरुष थे जो उनके सामने खड़े रहे. वह जवाहर लाल नेहरू के उदार स्वभाव से अलग उग्रता की राह पर थे. जब इमरजेंसी लागू हुई तो पुलित्जर विजेता पत्रकार लुइस एम सिमन्स दिल्ली में वॉशिंगटन पोस्ट के करेस्पॉन्डेंट बनकर आए थे. उन्होंने अपनी एक रिपोर्ट में यह दावा कर सबको चौंका दिया था कि संजय गांधी ने अपनी मां इंदिरा गांधी को एक डिनर पार्टी के दौरान थप्पड़ मारे थे.
हालांकि, बिगड़ैल बेटे से लेकर इमरजेंसी के 'प्रिंस क्राउन' बने संजय जीवन के अंतिम पड़ाव तक आते-आते कुशल राजनेता और संगठनकर्ता के तौर पर उभरे थे.
इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी पर विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी का आदेश देना, सेंसरशिप लागू करने और सरकारी कामकाज में बिना किसी आधिकारिक भूमिका के हस्तक्षेप करने के आरोप लगते रहे. संजय की छवि परिवार नियोजन कार्यक्रम की वजह से बहुत खराब हुई.
संजय गांधी स्पष्टवादी और मुखर थे. उनके मन में अपने सहयोगियों के लिए कोई इज्जत नहीं थी, चाहे वो उम्र में उनसे कितने ही बड़े क्यों न हों.
राजीव गांधी का स्वभाव इससे बिल्कुल विपरीत था. उनकी छवि विनम्र और उदार नेता के तौर पर थी. राजीव गांधी ने एक बार अपने गृह सचिव राम प्रधान को रात में किसी जरूरी मीटिंग के लिए बुलाया था. जब रात के 2 बजे बैठक खत्म हुई तो राजीव उन्हें अपनी कार में बैठाकर खुद उनके घर तक छोड़ने गए. राजीव कई बार सुरक्षा घेरा तोड़कर आम लोगों से मिलने पहुंच जाते थे, जबकि संजय को रूखे और सख्त राजनेता के तौर पर जाना जाता था.
आपातकाल के दौरान संजय की गतिविधियों की वजह से भले ही इंदिरा गांधी सरकार की बहुत आलोचना हुई लेकिन संजय गांधी की संगठन खड़ा करने की क्षमता और उनकी रणनीति ने ही तीन सालों बाद इंदिरा को फिर से जीत दिलाई. 1980 में कांग्रेस के विजयी 353 प्रत्याशियों में से 150 संजय की पसंद थे.
संजय ने 1980 में ना केवल अमेठी बड़े अंतराल से जीती बल्कि उनके ज्यादातर
वफादार यूथ कांग्रेसी भी चुनाव जीतकर संसद पहुंचे. संजय की तेज-तर्रार युवा
बिग्रेड चाहती थी कि संसद संजय की शर्तों पर ही चले. इंदिरा इस नई पीढ़ी
को हैरानी भरी नजरों से देख रही थीं. संजय का अंदाज जल्द ही पूरी सरकार में
नजर आने लगा था. स्वतंत्र सोच वाले अफसरों को हटाया जाने लगा, वैकल्पिक पोस्टिंग के लिए महीनों तक इंतजार करवाया
गया और जिन राजनेताओं पर वफादार नहीं होने का शक होता, उन्हें किनारे कर
दिया जाता.
संजय के विपरीत राजीव गांधी के राजनीतिक जीवन का रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं था. कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी के पद पर उनके नाम कई असफलताएं दर्ज हुईं. आंध्र प्रदेश और कर्नाटक विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों का चयन किया था और इंदिरा गांधी दोनों ही राज्यों में बुरी तरह हार गईं. राजीव को भारतीय राजनीति के सांचे के अनुरूप नहीं माना जाता था.
संजय ने वफादार सांसदों की जो टीम बनाई, उसने किसी भी परिस्थिति में उनका साथ नहीं छोड़ा. जब
संजय की मौत के बाद राजीव गांधी ने सत्ता संभाली तो कांग्रेस में करीब 100
सांसद ऐसे थे जो राजीव को असफल होते देखना चाहते थे. इंदिरा गांधी इस बात
को समझ गई थीं और उन्होंने तय किया कि अगले चुनाव में संजय के वफादारों की
जगह राजीव के वफादारों को टिकट दिया जाएगा ताकि अंदरूनी कलह ना पनपने पाए.
राजीव गांधी का भी राजनीतिक जीवन बेदाग नहीं रहा. शाहबानो केस राजीव गांधी से जुड़ा सबसे विवादित मुद्दा था. राजीव ने मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए कोर्ट का फैसला पलट दिया था. हालांकि मुस्लिम पुरुषों को खुश करने के लिए राजीव ने 1986 में मुस्लिम महिला विधेयक पेश कर दिया जो आगे चलकर कानून बन गया. इस कानून के मुताबिक, तलाक लेने के बाद मुस्लिम महिलाओं को केवल तीन महीने तक ही गुजारा भत्ता मिलेगा. यह कानून राजीव गांधी के कार्यकाल के लिए सबसे बड़ी आफत बना. शाहबानो केस के अलावा, राजीव गांधी बोफोर्स तोप सौदे और भोपाल गैस कांड के आरोपी वारेन एंडरसन को देश से सुरक्षित निकलने के मामले में भी घिरे.
अलग-अलग राह पर निकले दोनों भाइयों में एक बात जरूर समान थी. दोनों को विमान उड़ाने का बहुत शौक था. राजीव गांधी ने राजनीति से अलग पायलट के पेशे को चुना था, वहीं संजय राजनीति में रहते हुए भी विमान उड़ाते थे. संजय की मौत विमान हादसे में ही हुई थी.