लाखों साल पुरानी और उल्का पिंड की टक्कर से बनी लोनार झील में एक हैरान कर देने वाली घटना सामने आई है. इस झील का पानी अचानक हरे से लाल हो गया है. यह झील महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले में है. (Photo: Shyam)
वैज्ञानिकों का कहना है कि लोनार झील में हैलोबैक्टीरिया और ड्यूनोनिला सलीना नाम के कवक (फंगस) की वजह से पानी का रंग लाल हुआ है. निसर्ग तूफ़ान की वजह से बारिश हुई जिस कारण हैलोबैक्टीरिया और ड्यूनोनिला सलीना कवक झील की तलहट में बैठ गए और पानी का रंग लाल हो गया. हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना यह भी है कि लोनार झील का पानी लाल होने के पीछे और भी कई कारण हो सकते हैं. जिसकी जांच होना अभी बाकी है.
आम दिनों में लोनार झील का पानी हरा ही होता है. झील के पास जाने के लिए क्रेटर के अंदर दो किलोमीटर तक का रास्ता तय करना होता है. तब जाकर झील का पानी सामने देखने को मिलता है. (Photo: Shyam)
झील के पानी के पास पहुंचना भी काफी रिस्की होता है क्योंकि वहां दलदली भूमि है. झील का पानी सूखता है तो वहां की जमीन ऊपर से सूखी होती है जबकि अंदर से दलदली होती है. (Photo: Shyam)
मालूम हो कि लोनार झील बेहद रहस्यमयी है. नासा से लेकर दुनिया भर की तमाम एजेंसियां इस झील के रहस्यों को जानने में बरसों से जुटी हुई है. (Photo: Shyam)
लोनार झील का आकार गोल है. इसका ऊपरी व्यास करीब 7 किलोमीटर है. जबकि यह झील करीब 150 मीटर गहरी है. अनुमान है कि पृथ्वी से जो उल्का पिंड टकराया होगा, वह करीब 10 लाख टन का रहा होगा जिसकी वजह से झील बनी थीं. लोनार झील का पानी खारा है. (Photo: Shyam)
हाल ही में लोनार झील पर हुए शोध में यह सामने आया है कि यह लगभग 5 लाख 70 हजार साल पुरानी झील है. यानी कि यह झील रामायण और महाभारत काल में भी मौजूद थी.
वैज्ञानिकों का मानना है कि उल्का पिंड के पृथ्वी से टकराने के कारण यह झील बनी थी, लेकिन उल्का पिंड कहां गया इसका कोई पता अभी तक नहीं चला है. वहीं, सत्तर के दशक में कुछ वैज्ञानिकों ने यह दावा किया था कि यह झील ज्वालामुखी के मुंह के कारण बनी होगी. लेकिन बाद में यह गलत साबित हुआ, क्योंकि यदि झील ज्वालामुखी से बनी होती, तो 150 मीटर गहरी नहीं होती.
लोनार झील की एक ख़ास बात यह भी है कि यहां कई प्राचीन मंदिरों के भी अवशेष हैं. (Photo: Shyam)