कान खराब होने का डर या कैंसर का खतरा? TWS ईयरबड्स छोड़ वायर्ड ईयरफोन्स क्यों यूज कर रहे सेलेब्स

वायरलेस ईयरबड्स मार्केट में 299 रुपये से शुरू हो जाते हैं. अब ज्यादातर लोग TWS ईयरबड्स ही यूज करते हैं. हालांकि इन दिनों सेलेब्स में एक ट्रेंड देखा गया है. वायर्ड ईयरफोन्स पहने हुए दिख रहे हैं. कौन सा ईयरफोन्स ज्यादा सेफ है?

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वायर वाले ईयरबड्स क्यों पहन रहे सेलेब्स? वायर वाले ईयरबड्स क्यों पहन रहे सेलेब्स?

आजतक टेक्नोलॉजी डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 25 मई 2026,
  • अपडेटेड 3:27 PM IST

कुछ साल पहले तक ऐसा लग रहा था कि वायर्ड इयरफोन अब पूरी तरह खत्म हो जाएंगे और उनकी जगह TWS वायरलेस ईयरबड्स ले लेंगे. लेकिन अब ट्रेंड उल्टा होता दिख रहा है.

भारत और विदेश दोनों जगह सेलेब्रिटी और इंफ्लुएंसर्स फिर से वायर्ड इयरफोन इस्तेमाल करते नजर आ रहे हैं. इसके बाद सोशल मीडिया पर नई बहस शुरू हो गई है कि क्या वायर्ड इयरफोन ज्यादा सेफ हैं और क्या वायरलेस ईयरबड्स सेहत के लिए सही नहीं हैं.

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हाल के दिनों में कई बड़े इंटरनेशनल सेलेब्रिटी को पब्लिक प्लेसेस पर वायर्ड इयरफोन के साथ देखा गया. इसके बाद GenZ यूजर्स ने भी इस ट्रेंड को पकड़ लिया.

यूज करने में आसान

अब इसे कूल और रियल स्टाइल के तौर पर देखा जा रहा है. लोगों का कहना है कि वायर्ड इयरफोन सिंपल होते हैं, प्लग करो और तुरंत काम शुरू. इसमें पेयरिंग, बैटरी या चार्जिंग का कोई झंझट नहीं होता.

असल में TWS ईयरबड्स के साथ कुछ प्रैक्टिकल प्रॉब्लम भी सामने आई हैं. कई यूजर्स ने बार-बार कनेक्शन इश्यू, बैटरी ड्रेन और ऑडियो लैग की शिकायत की है. लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर कान में पेन या डिसकम्फर्ट भी होता है. यही वजह है कि कुछ लोग फिर से वायर्ड ऑप्शन की तरफ लौट रहे हैं.

अब सबसे बड़ा सवाल... क्या वायरलेस ईयरबड्स सच में हेल्थ के लिए नुकसानदायक हैं? इंटरनेट पर इसको लेकर काफी डर और कन्फ्यूजन है. कुछ लोग मानते हैं कि ब्लूटूथ ईयरबड्स कान के पास रेडिएशन छोड़ते हैं.

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लेकिन अभी तक कोई स्ट्रॉन्ग साइंटिफिक प्रूफ नहीं है जो यह बताए कि नॉर्मल यूज में ये खतरनाक हैं. एक्सपर्ट्स कहते हैं कि इनका रेडिएशन बहुत लो लेवल का होता है.

रेडिएशन का खतरा नहीं!

डॉक्टरों का मानना है कि असली खतरा रेडिएशन नहीं, बल्कि हाई वॉल्यूम है. अगर कोई भी इयरफोन, चाहे वायर्ड हो या वायरलेस, लंबे समय तक तेज आवाज में इस्तेमाल करे, तो हियरिंग डैमेज हो सकता है. इसलिए वॉल्यूम कंट्रोल सबसे जरूरी है.

हालांकि TWS ईयरबड्स के साथ एक प्रैक्टिकल इश्यू और है. ये कान के अंदर डीप फिट होते हैं. इससे ईयरवैक्स जमा होना, इरिटेशन या इंफेक्शन का रिस्क बढ़ सकता है. वहीं वायर्ड इयरफोन उतना डीप नहीं जाते और इनमें बैटरी नहीं होती, इसलिए ओवरहीटिंग या ब्लास्ट जैसा खतरा भी नहीं होता.

कई बार ये भी बहस छिड़ती है कि ईयरबड्स से कैंसर होता है. हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि बड्स या मोबाइल फोन से बेहद कम रेडिएशन निकलता है जिससे आम तौर पर कैंसर होने का खतरा नहीं होता है. इसके लिए कई रिसर्च और टेस्ट भी उपलब्ध हैं. हालांकि अगर क्वॉलिटी अच्छी नहीं हो या फिर सर्टिफिकेशन नहीं मिला है तो उस प्रोडक्ट के रेडिएशन से खतरा हो सकता है. 

इस ट्रेंड के पीछे एक लाइफस्टाइल एंगल भी है. आजकल लोग हमेशा कनेक्टेड रहने से थक चुके हैं. वायर्ड इयरफोन एक तरह का डिजिटल ब्रेक देते हैं. इसके अलावा रेट्रो ट्रेंड भी वापस आ रहा है, जिसमें पुराने गैजेट्स फिर से पॉपुलर हो रहे हैं.

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स्टेबल ऑडियो और खोने का डर नहीं

ऑडियो क्वालिटी की बात करें तो कई एक्सपर्ट्स मानते हैं कि वायर्ड इयरफोन में साउंड ज्यादा स्टेबल और डिले फ्री होता है. यही कारण है कि गेमिंग, एडिटिंग और म्यूजिक प्रोडक्शन जैसे कामों में आज भी वायर्ड ऑडियो को प्रेफर किया जाता है.

हालांकि यह भी सच है कि वायरलेस ईयरबड्स के अपने फायदे हैं. इनमें ऐक्टिव नॉइज़ कैंसलेशन, पोर्टेबिलिटी और स्मार्ट फीचर्स मिलते हैं, जो वायर्ड इयरफोन में नहीं होते. इसलिए दोनों के अपने प्रॉस और कॉन्स हैं.

मल्टिपल रिसर्च से ये क्लियर है कि वायर्ड या वायरलेस ईयरफोन्स जो कान के ज्यादा अंदर तक फिट होते हैं और हाई वॉल्यूम में यूज किए जाते हैं वो कानों के लिए अच्छे नहीं हैं. दोनों ही ईयरफोन्स को केयरफुली और कम समय तक के लिए यूज करना अच्छा माना जाता है. इसके अलावा वॉल्यूम कम रखना हमेंशा अच्छा होता है. 

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