जब कभी अमेरिका का Doomsday प्लेन दिखता है, सोशल मीडिया पर शोर मच जाता है. हाल ही में इसे वॉशिंगटन में देखा गया और तब से इसके बारे में अलग अलग डिटेल्स बाहर आ रही हैं. इसे लेकर कई तरह के मिथ भी वायरल होते रहते हैं.
इसकी वजह सिंपल है. यह प्लेन एक नॉर्मल वीआईपी जेट नहीं है. यह असल में हवा में उड़ता हुआ कमांड सेंटर है. इमरजेंसी या वॉर के दौरान जब ज़मीन पर कम्युनिकेशन, पावर, सर्वर और कंट्रोल रूम्स पर असर पड़े, तब भी कमांड की लाइन ना टूटे. Doomsday का मतलब दरअसल कयामत का दिन होता है. इसी तर्ज पर इस एयरप्लेन को बनाया गया है यानी जब धरती पर अटैक हो जाए या इमरजेंसी सिचुअशन में इसे यूज किया जाएगा.
इसे अलग अलग नाम से जाना जाता है. हालांकि ऑफिशियली इसे नैशनल एयरबोर्न ऑपरेशन सेंटर्स (NAOC) कहा जाता है. इसके तहत कई प्लेन्स हैं जो हवा से वॉर छेड़ सकते हैं और किले की तरह बन जाते हैं. इसे आप उड़ता हुआ डेटा या कमांड सेंटर भी कह सकते हैं. यहां हम इसमें दिए गए डिफेंस मैकेनिज्म की बात नहीं करेंगे, टेक्नोलॉजी पर फोकस रखेंगे.
फिलहाल एक बड़ा डेवलपमेंट भी चल रहा है. अमेरिकी वायुसेना पुराने डूम्सडे प्लेन (Doomsday) बेड़े के रिप्लेसमेंट के लिए नए प्लेटफॉर्म पर काम कर रही है. यानी यह सिस्टम सिर्फ पुरानी कोल्ड वॉर कहानी नहीं, आज भी अपग्रेड हो रहा है.
E4B NightWatch
सबसे पहले बात करें उस प्लेटफॉर्म की जिसे लोग सबसे ज्यादा Doomsday Plane कहते हैं. इसका नाम है E-4B नाइटवॉच. यह एक मॉडिफाइड Boeing 747 बेस्ड एयरक्राफ्ट है और अमेरिका के पास इसके चार यूनिट हैं. इस प्लेन के अंदर एक ऐसा नेटवर्क चल रहा है जिसे आप बैकअप कम्यूनिकेशन स्टैक की तरह समझ सकते हैं.
पहला पिलर - रेडंडेंसी (एक्सट्रा नेटवर्क्स पर भरोसा, नो सिंगल प्वाइंट फेलियर)
इस प्लेन में किसी एक नेटवर्क पर भरोसा नहीं किया जाता. अलग-अलग बैंड और अलग-अलग मोड के रेडियो, सैटेलाइट कम्युनिकेशन, और स्पेशलाइज्ड लिंक एक साथ रखे जाते हैं ताकि एक रास्ता बंद हो तो दूसरा रास्ता खुला रहे. आज क्लाउड में जिसे आप मल्टी-रीजन फेलओवर कहते हैं, वही सोच यहां हार्डवेयर लेवल पर लागू होती है. फर्क बस इतना है कि यहां रीजन डेटा सेंटर नहीं, अलग-अलग कम्युनिकेशन पाथ हैं.
दूसरा पिलर - EMP हार्डनिंग
टेक की लैंग्वेज में यह हार्डवेयर रेज़िलिएंस का सबसे एक्सट्रीम वर्जन है. EMP यानी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पल्स जैसी स्थिति में आम इलेक्ट्रॉनिक्स के फेल होने का रिस्क रहता है. इसी वजह से E-4B के डिजाइन में वायरिंग और इक्विपमेंट शील्डिंग जैसी चीज़ें आती हैं. यहां ट्रस्ट अनालॉद इक्विपमेंट्स पर ज्यादा किया जाता है.
यह ठीक वैसा ही है जैसे आप किसी क्रिटिकल सिस्टम में सॉफ्टवेयर बैकअप के साथ हार्डवेयर बैकअप भी रखते हैं, ताकि एक लेयर टूटे तो दूसरी लेयर बची रहे.
तीसरा पिलर - स्केल
यह छोटा कंट्रोल रूम नहीं है. E-4B का क्रू और मिशन स्टाफ काफी बड़ा हो सकता है, और प्लेन के अंदर अलग-अलग फंक्शनल एरिया बनाए गए हैं. कमांड वर्क एरिया, कॉन्फ्रेंस और ब्रीफिंग स्पेस, ऑप्स टीम एरिया, कम्युनिकेशन एरिया और रेस्ट एरिया.
यह लेआउट भी अपने आप में एक टेक स्टेटमेंट है. क्योंकि यह प्लेन सिर्फ सिग्नल भेजने का बॉक्स नहीं, एक ऐसा ऑपरेशनल वर्कस्पेस है जहां लोग लंबे समय तक काम कर सकें, फैसले ले सकें और सिस्टम रन कर सकें.
एंड्योरेंस टेक
E-4B प्लेन इन-फ्लाइट रिफ्यूलिंग कर सकता है. यानी इसे लैंड करना जरूरी नहीं. एक एंड्योरेंस टेस्ट फ्लाइट 35 घंटे से ज्यादा की भी दर्ज है. टेक के नजरिए से यह अपटाइम फिलॉसफी है. आपका सिस्टम जितना लंबा ऑन रहेगा, आपकी कंटिन्युटी उतनी मजबूत रहेगी. यही सोच आज डेटा सेंटर डिजाइन में भी होती है, बस वहां जेनरेटर और बैटरी बैकअप होता है, यहां हवा में फ्यूलिंग बैकअप है.
वेरी लो फ्रिक्वेंसी टेक (VLF Communication)
E-6B Mercury: ये दूसरा सबसे बड़ा डूम्सड प्लेटफॉर्म है. इसका रोल थोड़ा अलग लेकिन टेक बहुत यूनिक है. इसका सबसे चर्चित हिस्सा है वीएलएफ कम्युनिकेशन यानी वेरी लो फ्रीक्वेंसी. यह वही लो-फ्रीक्वेंसी रेडियो टेक है जो कुछ परिस्थितियों में पानी के अंदर तक सीमित रूप से पहुंच सकती है.
E-6B Mercury में डुअल ट्रेलिंग एंटीना सिस्टम होता है. सिंपल भाषा में समझिए. प्लेन पीछे से कई किलोमीटर लंबा वायर एंटीना छोड़ता है और खास तरह की फ्लाइट प्रोफाइल में उड़ता है ताकि सिग्नल डिलीवरी बेहतर हो.
यह टेक आज के नजरिए से एक्सट्रीम-रेंज, लो-बैंडविड्थ, हाई-रिलायबिलिटी कम्युनिकेशन है. ठीक वैसा ही जैसे कुछ IoT नेटवर्क बहुत कम डेटा भेजते हैं लेकिन उनका फोकस भरोसेमंद डिलीवरी पर होता है.
एंटीना और डोम
अब उस एंटीना और डोम वाली बात पर आएं जो हर फोटो में दिखती है. E-4B के ऊपर जो बड़ा रैडोम दिखता है, वह सिर्फ डिजाइन नहीं, सैटकॉम हार्डवेयर को कवर करने का तरीका है.
बाहर की बॉडी पर कई एंटीना लगे होते हैं ताकि अलग-अलग फ्रिक्वेंसी और अलग-अलग सिस्टम के साथ कनेक्टिविटी बनी रहे. इसे आप ऐसे समझिए जैसे एक फोन में सिर्फ एक सिम नहीं, कई नेटवर्क के रास्ते हों, और हर रास्ते का काम अलग हो. एक रास्ता वॉइस के लिए, एक डेटा के लिए, एक ब्रॉडकास्ट के लिए, एक बैकअप के लिए. यही मल्टी-लिंक अप्रोच इसे फ्लाइंग गेटवे बनाती है.
पावर और कूलिंग सिस्टम
जमीन पर तमाम डेटा सेंटर्स में पावर और कूलिंग के बिना कुछ पॉसिबल नहीं है. क्योंकि कम्युनिकेशन रैक्स, प्रोसेसिंग, सिक्योर सिस्टम्स और वर्क स्टेशंस का लोड बड़ा होता है. इसलिए यह सिर्फ एविएशन का प्लेन नहीं, एक तरह का फ्लाइंग इंफ्रास्ट्रक्चर है. ये प्लेन एक तरह का पोर्टेबल या फ्लाइंग डेटा सेंटर की तरह भी काम करता है.
न्यूक्लियर कमांड कंट्रोल
एइस प्लेन को समझने का सबसे सही टेक फ्रेम NC3 है. यानी न्यूक्लियर कमांड, कंट्रोल और कम्युनिकेशंस. नाम चाहे जो हो, टेक समस्या एक ही है. कमांड चेन को कभी टूटने नहीं देना. इसी वजह से यह पूरा सिस्टम सिंगल पॉइंट ऑफ फेल्योर के अपोजिट काम करता है.
वही चीज़ जो एक अच्छे क्लाउड आर्किटेक्ट की पहली चिंता होती है. अगर यह सर्वर डाउन हो गया तो क्या. अगर यह लिंक टूट गया तो क्या. अगर यह पावर चली गई तो क्या होगा? Doomesday प्लेन उसी सवाल का सबसे एक्सट्रीम आर्किटेक्चर है.
तैयार हो रहा है नया प्लेटफॉर्म
अमेरिका पुराने E-4B बेड़े के रिप्लेसमेंट के लिए नया प्लेटफॉर्म तैयार कर रहा है, जिसे सर्वाइवेबल एयरबोर्न ऑपरेशंस सेंटर प्रोग्राम के तौर पर देखा जा रहा है. इसका मतलब साफ है. टेक स्टैक बदल रहा है, जरूरतें बदल रही हैं, और एयरबोर्न बैकअप इंटरनेट को अगली पीढ़ी में ले जाने की तैयारी चल रही है.
मुन्ज़िर अहमद