राहुल गांधी गिराएंगे दीवार !

राहुल ने कहा, ''संगठन को बदलना होगा. हमारे कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच एक बड़ी दीवार है. मेरा पहला काम इस दीवार को गिराना है.'' उनकी इस बात का महाधिवेशन में इकट्ठा हुए लगभग 15,000 कार्यकर्ताओं ने तालियों की जोरदार गडग़ड़ाहट के साथ स्वागत किया.

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नई लहर कांग्रेस के 84वें महाधिवेशन में पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ राहुल गांधी नई लहर कांग्रेस के 84वें महाधिवेशन में पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ राहुल गांधी

कौशिक डेका / संध्या द्विवेदी / मंजीत ठाकुर

  • नई दिल्ली,
  • 29 मार्च 2018,
  • अपडेटेड 2:34 PM IST

अगर कांग्रेस के 84वें महाधिवेशन में 18 मार्च को पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के समापन भाषण से कोई संकेत मिलता है, तो वह यह कि पार्टी में जल्द ही सांगठनिक पुनर्गठन होंगे, जिसमें युवा नेताओं को तैयार करने पर ध्यान दिया जाएगा.

गांधी खानदान के इस वारिस के पास एक नई कांग्रेस कार्यकारिणी का गठन करने के लिए पार्टी के प्रस्ताव के तहत पूरे अधिकार थे और राहुल इसमें युवाओं को शामिल करने के बारे में स्पष्ट थे, लेकिन यह भी साफ था कि पुराने लोगों को भी नजरअंदाज नहीं किया जाएगा. पार्टी सूत्रों का कहना है कि 15 अप्रैल तक नई कार्यकारिणी का गठन हो जाएगा.

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राहुल ने कहा, ''संगठन को बदलना होगा. हमारे कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच एक बड़ी दीवार है. मेरा पहला काम इस दीवार को गिराना है.'' उनकी इस बात का महाधिवेशन में इकट्ठा हुए लगभग 15,000 कार्यकर्ताओं ने तालियों की जोरदार गडग़ड़ाहट के साथ स्वागत किया.

परंपरा के विपरीत कांग्रेस के शीर्ष नेता मंच के सामने बैठे हुए थे, न कि मंच पर बिछे गद्दे पर. राहुल ने कहा, ''मैंने इस मंच को आपके लिए खाली किया है. मैं प्रतिभाशाली युवाओं को इस मंच पर घसीट-घसीटकर लाऊंगा.''

इस नए समानतावाद पर जोर देने के लिए छत्तीसगढ़ के कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ता क्रांति बंजारा ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पी. चिदंबरम जैसे दिग्गजों के साथ महाधिवेशन को संबोधित किया. राहुल ने स्वीकार किया कि कार्यकर्ताओं का निराश होना स्वाभाविक है, क्योंकि ''वे दस-पंद्रह वर्षों तक अपना खून-पसीना देते हैं,'' लेकिन जब चुनाव का समय आता है, तो उन्हें कहा जाता है कि उनके पास धन नहीं है और ''पैराशूट से उतरे कुछ नेता टिकट हासिल कर लेते हैं.''

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हालांकि भाजपा के नेता उनकी नई बयानबाजी से प्रभावित नहीं हैं. कभी कांग्रेस नेता रहे हेमंत बिस्व शर्मा कांग्रेस के युवा चेहरों में भी  जारी वंशवाद की तरफ इशारा करते हैं. वे हंसते हुए कहते हैं, ''मुरली देवड़ा, राजेश पायलट, जितेंद्र प्रसाद, सी.पी.एन. सिंह, माधवराव सिंधिया, भूपिंदर हुड्डा और तरुण गोगोई के बेटे योजना बना रहे हैं कि कैसे मंच खाली रखना है और राष्ट्र के युवाओं को भ्रमित कर रहे हैं.''

हेमंत बिस्व शर्मा ने हाल ही में पूर्वोत्तर में कांग्रेस का सूपड़ा साफ करने में भाजपा की तरफ से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और उन्होंने 2015 में तब पार्टी छोड़ दी थी, जब कथित तौर पर राहुल ने असम का मुख्यमंत्री बनने की उनकी संभावनाओं खारिज कर दिया था.

पार्टी के अंदरूनी विषयों के अलावा राहुल भाजपा पर अपने प्रहार में कठोर थे. उन्होंने भाजपा की तुलना कौरवों से की और पार्टी नेताओं को आश्वस्त किया कि ईमानदार कांग्रेसी पांडव विजयी होकर उभरेंगे. उन्होंने दो शिव मंदिरों के दौरे के बारे में एक दृष्टांत भी पेश किया और दो पुजारियों के साथ मुलाकात का जिक्रभी किया, जिनमें से एक ईमानदार था और ईश्वर को हर जगह तलाशने के लिए स्वतंत्र था, जबकि दूसरा स्वार्थी था. राहुल ने कहा, ''हम पहले पुजारी की तरह हैं, सच्चाई के सेनानी.''

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कांग्रेस के एक महासचिव ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि राहुल ''इस धारणा को खत्म करना चाहते हैं कि कांग्रेस सिर्फ मुस्लिमों की पार्टी है. हम भाजपा की विभाजनकारी नीति के खिलाफ अपने समावेशी हिंदुत्व को दिखाकर भाजपा के सबसे बड़े हथियार को बेअसर करना चाहते हैं.''

कांग्रेस को भाजपा के भारत के दृष्टिकोण के विकल्प के रूप में पेश करना महाधिवेशन का मुख्य विषय था. राहुल ने स्वीकार किया कि सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को पराजित करना ही पर्याप्त नहीं है—कांग्रेस को बेरोजगारी, किसानों के संकट और शिक्षा जैसी बड़ी समस्याओं के समाधान तलाशने होंगे.

एक परिचर्चा के दौरान एक पूर्व केंद्रीय मंत्री ने पांच सिद्धांतों को समझाया, जो दोनों पार्टियों को अलग करते हैं. कांग्रेस का मानना है कि आर्थिक उदारीकरण सामाजिक और राजनैतिक ध्रुवीकरण के साथ नहीं हो सकता; सेवाओं का प्रभावी वितरण सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्रों को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत किया जाना चाहिए; ग्रामीण अर्थव्यवस्था को उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए; सामाजिक और आर्थिक संस्थानों को मजबूत किया जाना चाहिए; और विकास का मॉडल न केवल तेज, बल्कि समावेशी और टिकाऊ होना चाहिए.

बहरहाल, मंच पर खाली जगह रखने से शायद कुछ पुराने नेता नए लोगों के लिए जगह खाली कर दें. पर, क्या इसे भाजपा की ही तरह कांगे्रस में भी मार्गदर्शक मंडल बनने की शुरुआत की तरह देखा जाएगा? क्या राहुल के इस सिद्धांत को कांग्रेस की नई कामराज योजना माना जाए, ताकि सीनियर नेताओं की राय लेते हुए राहुल संगठन की अहम जिम्मेदारियां युवाओं की टीम को सौंप सकें.

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यह शायद राहुल और उनकी टीम के लिए बड़ी चुनौती न हो. पर राहुल और कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती की बात यही है कि वे भाजपा और अपनी पार्टी के दृष्टिकोण के अंतर को लोगों के सामने तक लेकर आए. उन्हें लोगों को यह दिखाना होगा कि कांग्रेस पार्टी अब भी एक आकर्षक विकल्प क्यों है.

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