ISIS के खिलाफ फ्रांस और रूस साथ मगर अमेरिका की शर्त है परेशानी

आईएसआईएस के आतंक को देखते हुए फ्रांस और रूस जैसे विरोधी भी एक साथ आ गए हैं. रूस और अमेरिका से भी ऐसी ही उम्मीद लगाई जा रही है. जिसे खुद अमेरिकी राष्ट्रपति ओबाम ने जगाया है. लेकिन अमेरिका की एक शर्त इस एकजुटता की राह में रोड़ा बनी हुई है.

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पुतिन और ओबामा इस मसले पर कई बार बात कर चुके हैं पुतिन और ओबामा इस मसले पर कई बार बात कर चुके हैं

परवेज़ सागर

  • नई दिल्ली,
  • 28 नवंबर 2015,
  • अपडेटेड 8:10 AM IST

आईएसआईएस के आतंक को देखते हुए फ्रांस और रूस जैसे विरोधी भी एक साथ आ गए हैं. रूस और अमेरिका से भी ऐसी ही उम्मीद लगाई जा रही है. जिसे खुद अमेरिकी राष्ट्रपति ओबाम ने जगाया है. लेकिन अमेरिका की एक शर्त इस एकजुटता की राह में रोड़ा बनी हुई है.

कूटनीति है दूरी की वजह

आईएसआईएस के खिलाफ जंग में कूटनीति की चाल एक बार फिर रूस और अमेरिका को दूर कर रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति की एक शर्त ने रूस और अमेरिका के करीब आने की उम्मीद पर सवालिया निशान लगा दिए हैं. टर्की अमेरिका का दोस्त है. इसीलिए रूसी वॉर प्लेन को मार गिराये जाने पर ओबामा ने कहा कि अपनी सुरक्षा करना टर्की का हक है. तो पुतिन ने इशारों इशारों में टर्की और अमेरिका को आतंकियों का मददगार बता दिया.


पुतिन ने मांगा था सहयोग

हालांकि बगदादी के खौफ का खात्मा करने के लिए रूस की रणनीतिक साझेदारी अमेरिका को भी समझ आती है. इसीलिए पिछले दिनों ईस्ट एशिया समिट में ओबामा ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन से मुलाकात की थी. और इस दौरान पुतिन से आईएसआईएस के खिलाफ लड़ाई में सहयोग मांगा था.


रूस ने की फ्रांस की मदद

बातचीत के बावजूद अमेरिका और रूस का ऐसा रुख देखकर लगता नहीं कि आईएसआईएस के खिलाफ जंग में दोनों खुलकर साथ आ पाएंगे. हालांकि कोल्ड वॉर के 30 साल लंबे दौर से बाहर निकलकर रूस ने फ्रांस की मदद की है. पेरिस में आईएसआईएस के हमले के बाद फ्रांस ने रूस से मदद मांगी थी. और रूस ने बगदादी के लड़ाकों पर मिसाइलें बरसाना शुरु कर दिया है.


क्या अमेरिका मंथन करेगा

रूस को यह उम्मीद भी है कि पेरिस हमले और अब टर्की मिलिट्री की हरकत के बाद शायद अमेरिका अपने रुख पर दोबारा मंथन करेगा. मौजूदा हालात में रूस यह भी समझता है कि दुनियाभर में फैले आईएसआईएस के आंतक को मिटाने के लिए सीरिया के राष्ट्रपति पर फैसला होना जरूरी है. वरना असद के साथ होने या न होने का पाला दुनिया के बीच खिंचा ही रह जाएगा.


आईएसआईएस को मिलेगा फायदा

रूस और अमेरिका के रिश्तों में इस तल्खी का फायदा हर हाल में आईएसआईएस के आतंकियों को मिलता रहेगा. जब दुनिया की ये दोनों बड़ी ताकतें एक होकर इस आतंकी संगठन पर हमला नहीं करेंगी, तब तक इसका खात्मा आसान दिखाई नहीं देता. गंभीर हालात को समझते हुए ही फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने भी आईएसआईएस के खिलाफ रूस और अमेरिका को साथ आने की सलाह दी है.


रूस और अमेरिका के बीच शर्त हैं बशर अल असद

सारी दुनिया को अपने आतंक से लहुलुहान करने वाले बगदादी के खिलाफ हाथ बढ़ाने की ओबामा की पेशकश शर्तों में बंधी है. और रूस के हाथ मिलाने की शर्त भी. इस शर्त का अहम किरदार हैं सारिया के राष्ट्रपति बशर अल असद. ओबामा का कहना है कि रूस असद को बचाए रखने की जिद छोड़ दे. तो पुतिन का कहना है कि अमेरिका आईएसआईएस के खात्मे पर गंभीर हो और असद की गद्दी की ओर देखना बंद करे.



वर्चस्व को लेकर हैं मतभेद

सीरिया पर हमले को लेकर जिस तरह रूस और अमेरिका आमने सामने हैं, वो आतंकवाद के खिलाफ इस जंग की गंभीरता को कठघरे में खड़ा करता है. सवाल यह है कि आखिर एक ही जंग में दुनिया के दो ताकतवर मुल्कों का मकसद अलग अलग क्यों है. लेकिन इस सवाल का जवाब आईएसआईएस के खात्मे के बाद की सूरत में दिखाई देता है. जानकारों की मानें तो सीरिया और इराक में आईएसआईएस का सफाया होने के बाद किसका वर्चस्व रहेगा, यही बात रूस और अमेरिका के बीच टकराव की वजह बनी हुई है.


असद को हटाकर कठपुतली सरकार चाहता है अमेरिका

सीरिया में राष्ट्रपति असद के खिलाफ पिछले 4 साल से आंतरिक जंग छिड़ी हुई है. पश्चिमी देश असद को सत्ता से बेदखल करना चाहते हैं. वे सीरिया के भीतर छिड़े युद्ध में असद के विरोधियों की मदद कर रहे हैं. आतंकी संगठन आईएसआईएस ने भी असद की सत्ता को चुनौती देते हुए आधे से ज्यादा सारिया पर कब्जा कर लिया है. अब असद की सत्ता को बचाए रखने के लिए रूस आईएसआईएस के खात्मे का मिशन छेड़े हुए है. जबकि अमेरिका आईएस का खात्मा तो चाहता है. लेकिन वो असद को भी सत्ता से हटाना चाहता है. साथ ही उसकी मंशा सीरिया में अपनी कठपुतली सरकार चलाने की है. इसीलिए बगदादी के खिलाफ जंग में रूस और अमेरिका आमने-सामने हैं.

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