न आक्रमण, न ट्रैप, न टर्निंग पॉइंट... ग्राउंड पर 'गंभीर' नहीं दिखी टीम इंडिया, हार ऐसे हुई पक्की!

भारत और न्यूजीलैंड के बीच 2026 की ODI सीरीज में भारतीय टीम 1-2 से धराशायी हो गई, और सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि यह हार घरेलू मैदान पर, उस विपक्षी के हाथों हुई जिसने इससे पहले भारत में कभी ODI सीरीज नहीं जीती थी. तीसरे मैच में डेरिल मिचेल (137) और ग्लेन फिलिप्स (106) की धुआंधार साझेदारी ने भारतीय गेंदबाजी की कमजोरी को बेपर्दा कर दिया...

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स्पिन-पेस दोनों धराशायी... (Photo, PTI) स्पिन-पेस दोनों धराशायी... (Photo, PTI)

विश्व मोहन मिश्र

  • नई दिल्ली,
  • 19 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 1:14 PM IST

भारत और न्यूजीलैंड के बीच 2026 की ODI सीरीज की कहानी सिर्फ रोमांच नहीं, बल्कि बड़ा सबक बनकर सामने आई. तीन मैचों की इस भिड़ंत में भारतीय टीम 1-2 से हार गई और सबसे चिंताजनक बात यह रही कि ये हार घरेलू जमीन पर हुई- उस विपक्षी के खिलाफ, जिसने इससे पहले भारत में कभी ODI सीरीज अपने नाम नहीं की थी. यह सिर्फ एक हार नहीं, बल्कि उस मिथक का टूटना था कि घर में भारत को हराना असंभव है.

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तीसरे वनडे में न्यूजीलैंड ने भारत के सामने 338 रनों का पहाड़ खड़ा कर दिया. इस स्कोर की नींव डेरिल मिचेल (137) और ग्लेन फिलिप्स (106) की धुआंधार साझेदारी ने रखी, जिसने भारतीय गेंदबाजी को पूरी तरह बेअसर कर दिया. न तेज गेंदबाज लाइन पकड़ पाए, न स्पिनर्स नियंत्रण स्थापित कर पाए- नतीजा, विकेट सूखे और रन बरसते रहे.

जवाब में भारत ने उम्मीद विराट कोहली पर टिकी देखी और उन्होंने 124 रनों की जुझारू पारी खेलकर मुकाबला जिंदा रखा. लेकिन दूसरे छोर से सहयोग नहीं मिला. टॉप से लेकर मिडिल ऑर्डर तक, कोई भी लंबी साझेदारी नहीं निभा सका. अंततः भारतीय टीम 296 पर सिमट गई और यह मैच भारत की रणनीतिक व तकनीकी कमियों का आईना बन गया.

यह पहली बार है जब न्यूजीलैंड ने भारत में ODI सीरीजी जीती -  इतिहास के पन्नों में एक ऐसी हार दर्ज हुई जो भारतीय क्रिकेट के लिए कलंक से कम नहीं.

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बॉलिंग- भारत की सबसे बड़ी परीक्षा

भारत की हार की सबसे बड़ी वजह रही बॉलिंग विभाग का भयंकर पतन. भारतीय गेंदबाजी ने न तो विकेट-टेकिंग मिडल ओवर दबाव बनाया और न ही रन रोकने में कामयाबी हासिल की. स्पिनर जडेजा और कुलदीप दोनों ही प्रभावशाली नहीं दिखे, जिनके आंकड़े सीरीज में बेहद निराशाजनक रहे.

बॉलिंग के मध्य ओवरों में विकेट न गिरने के चलते मिचेल-फिलिप्स ने बिना दबाव के बल्लेबाजी की और बड़ी साझेदारी (219 रन-188 गेंदें) निभाई- यही वह मोड़ था जिसने मैच और सीरीज का रुख बदल दिया.

जब आपका पेस अटैक शुरुआती ओवरों में अच्छा है पर मिडल ओवर्स में कोई विकेट नहीं ले पाता-- तो विपक्ष को मनोवैज्ञानिक और रन-स्कोरिंग दोनों तरफ बड़ा फायदा मिलता है. यही भारत की कहानी इस सीरीज में थी.

स्पिनरों की 'बेइज्जती'

भारत की पारम्परिक ताकत - स्पिन गेंदबाजी... इस बार हिंदी फिल्मी बयान जैसी नजर आई. कहानी तो थी, लेकिन असर कहीं नहीं दिखा. अभी भी जब विपक्षी बल्लेबाज स्पिन को निशाना बना रहे हों और आप बॉलिंग में कोई बड़ा बदलाव या योजना नहीं ला पा रहे हों...तो निश्चित ही टीम मुश्किल में पड़ती है.

खुलकर कहा जाए तो रवींद्र जडेजा जैसे अनुभवी ऑलराउंडर इस फॉर्मेट में अब न तो वह असर दिखा पा रहे हैं, न ही विकेट लेने की वह निरंतरता दे पा रहे हैं, जिसकी उनसे उम्मीद रहती थी. नतीजतन चयन को लेकर सवाल स्वाभाविक हैं- क्या भारत ODI में अनुभव के नाम पर सिर्फ 'एंड्योरेंस' ढो रहा है या वाकई मैच-विनिंग इम्पैक्ट देख भी रहा है?

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मिडल ओवरों की विफलता - नजरअंदाज नहीं की जा सकती

भारत की गेंदबाजी की सबसे बड़ी कमजोरी मिडिल ओवर्स में विकेट न निकाल पाना रही. शुरुआती ओवरों में जब टीम ने दो त्वरित विकेट झटके, तो लगा मैच भारत की पकड़ में है, मगर मिडिल ओवर्स आते ही तस्वीर बदल गई. विपक्षी बल्लेबाजों ने बिना किसी दबाव के रन बटोरे, साझेदारी जमाई और धीरे-धीरे मैच पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लिया.

ये वही विभाग है जहां भारत को वर्षों से अव्वल माना जाता रहा- कंट्रोल, विकेट और स्पिन का जाल...लेकिन इस बार न तो सही फील्ड पोजिशनिंग दिखी, न ही वैरिएशन की वह धार, जो मिडल ओवर्स में मैच की दिशा बदल देती है.

रवींद्र जडेजा को अधिक आक्रामक और विकेट-शिकारी भूमिका निभानी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जडेजा पूरी तरह डिफेंसिव लाइन में फंसे रहे- न आक्रमण, न ट्रैप सेटिंग, न टर्निंग पॉइंट वाला ओवर.

आखिरकार, यही कमी निर्णायक साबित हुई. जब मिडिल ओवर्स में विकेट नहीं गिरते, तो डेथ ओवर्स में कोई भी गेंदबाज ताबड़तोड़ रन रोक नहीं सकता- और यही इस मैच का असली अंतर बन गया.

कोहली ने लड़ाई तो की, पर टीम पीछे छूट गई

अगर बात केवल व्यक्तिगत शतकों की होती, तो कोहली का 124 रनों का खेल शायद ही भुलाया जा सके. यह खेल निष्ठा, तकनीक और संघर्ष का प्रतीक था... पर क्रिकेट एक टीम गेम है, और जब बाकी बल्लेबाज रन नहीं जोड़ पाते, तो एक शतक भी जीत की गारंटी नहीं बन पाता.

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कोहली ने पारी में वह सब कुछ किया जो कप्तान और स्टार बल्लेबाज कर सकता है, लेकिन जब आपके साथी टिकते ही नहीं, तो लक्ष्य आसान नहीं रह जाता.

बड़ी तस्वीर-  क्या यह संकेत है?

यह हार सिर्फ मैच की नहीं, बल्कि भारत की ODI टीम की कमजोरियों का साफ संकेत है. गेंदबाजी के विकल्प कम, मिडल ओवर्स में योजना गड़बड़, स्पिन का असर नहीं और चयन पर सवाल. यदि ये कमियां सुधारी नहीं गईं, तो घरेलू जीत अब कोई गारंटी नहीं रही.

... और यही कारण है कि विरोधी टीम ने न केवल लक्ष्य बनाया, बल्कि सीरीज भी अपने नाम कर ली... कुछ ऐसा जो इंडियन फैन्स ने शायद ही सपने में सोचा होगा।

ND vs NZ ODI सीरीज भारत के लिए सिर्फ हार नहीं, बल्कि गंभीर आत्म-निरीक्षण की घड़ी है. एक समय जब भारतीय क्रिकेट की पहचान दबाव में खेलना थी, आज वही टीम मिडल ओवर दबाव सहन नहीं कर पाती. यह हार दुखद है, लेकिन अगर इससे टीम सीखती है. तब भी देर नहीं हुई. एक बात स्पष्ट है- बॉलिंग सुधरे बिना, शतक और अनुभव भी अब जीत नहीं दिला सकते.


 

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