'तुम्हारे तो चाचा विधायक हैं, हमें आईपीएल के एक-दो टिकट ही दिलवा दो?' इस तरह की बातें अब आपको सुनने को मिल सकती हैं, क्योंकि 28 मार्च (शनिवार) से टी-20 क्रिकेट का सबसे बड़ा समर यानी इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) शुरू हो रहा है और शुरू होगी टिकटों की डिमांड. देश में क्रिकेट का जुनून किस तरह रहता है इसका बढ़िया उदाहरण कर्नाटक से सामने आया है, जहां सत्ता पर काबिज कांग्रेस के विधायकों की एक शिकायत थी कि हमें आईपीएल का टिकट नहीं मिलता है. ये वीआईपी डिमांड इतनी ज्यादा थी कि कर्नाटक क्रिकेट एसोसिएशन (KSCA) के अध्यक्ष वेंकटेश प्रसाद को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और अन्य विधायकों से मिलने के लिए बुला लिया गया.
साफ है कि कर्नाटक के विधायकों की 'वीआईपी' जिद्द के आगे क्रिकेट एसोसिएशन को झुकना पड़ा है. अब एम. चिन्नास्वामी स्टेडियम में होने वाले आईपीएल मैचों के लिए विधायकों को एक नहीं बल्कि दो मुफ्त टिकट मिला करेंगे. ऑनलाइन टिकट खरीदने से इनकार करने वाले इन जनप्रतिधियों को अब विशेष तवज्जो दी जाएगी. बेंगलुरु के एम. चिन्नास्वामी स्टेडियम में मौजूदा चैम्पियन आरसीबी और एसआरएच के बीच होने वाले उद्घाटन मैच से पहले यह फैसला लिया गया.
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केएससीए अध्यक्ष वेंकटेश प्रसाद ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से मुलाकात कर उन्हें मैच देखने का निमंत्रण दिया. अब हर विधायक को आगामी सभी मैचों के लिए टिकट दिए जाएंगे और इतना ही नहीं स्टेडियम में माननीयों के लिए एक अलग स्टैंड होगा. यह पूरा घटनाक्रम विधायकों द्वारा अपनी 'वीआईपी' स्थिति का हवाला देते हुए अपमान के आरोप लगाने के बाद हुआ है.
2012 की कहानी क्या याद है?
वैसे बेंगलुरु में इस तरह फ्री टिकट या फ्री पास के लिए अपनी ताकत का इस्तेमाल पहली बार नहीं हुआ है. ऐसे ही मुफ्त पास के लिए एक बार यहां के नगर निगम ने कूड़ा उठाने से मना कर दिया था, क्यूंकि तब क्रिकेट एसोसिएशन ने मुफ्त पास नहीं दिए थे. किस्सा यूं है कि अप्रैल 2012 में बेंगलुरु के स्टेडियम में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु और दिल्ली डेयरडेविल्स के बीच मैच हुआ. आईपीएल का एक मैच जब होता है, या कोई भी क्रिकेट मैच जब होता है तब तो आप उसका आनंद ले लेते हैं, लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल उसके अगल दिन होती है और वो होती है स्टेडियम में इकट्ठा हुए कूड़े की.
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एक आईपीएल मैच की वजह से औसत 15 से 18 टन कूड़ा इकट्ठा होता है, जिसमें प्लास्टिक की बोतल, बचा हुआ खाना, पोस्टर, प्लेकार्ड समेत बाकी तमाम चीजें होती हैं जिनको आपको डिस्पोज करना होता है. अब आप अगर किसी भी जगह मैच करा रहे होते हैं, चाहे वो कोई भी शहर हो तो जो राज्य की क्रिकेट एसोसिएशन होती है उसका उस शहर की म्युनिसिपालिटी से कॉर्डिनेशन होना चाहिए, ताकि आप बाद में स्टेडियम की सफाई करवा लें क्यूंकि इतना कूड़ा तो वही इस्तेमाल कर सकती है.
अब आपको असली कहानी पर लाते हैं, 2012 के उस सीज़न में कर्नाटक क्रिकेट एसोसिएशन की अध्यक्षता अनिल कुंबले कर रहे थे. सीजन से पहले बेंगलुरु के नगर निगम ने क्रिकेट एसोसिएशन से कहा कि आप हमारे लोगों के लिए 450 वीआईपी पास दे दीजिए, ताकि हम सीजन के मैच स्टेडियम में देख सकें. लेकिन एसोसिएशन ने कहा कि हम वीआईपी पास तो नहीं दे पाएंगे, लेकिन 250 रेगुलर पास जरूर दे देंगे. एसोसिएशन को क्रिकेट एसोसिएशन की ये बात थोड़ी पसंद नहीं आई और इसके बाद वहां के नगर निगम ने कूड़ा हटाने से मना कर दिया.
नंदन कामथ की किताब बाउंड्री लैब (Boundary Lab) में इस किस्से का जिक्र भी किया गया है. कूड़ा ना उठाने वाला किस्सा हो या फिर अब विधायकों का मुफ्त टिकट लेने के लिए क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष को ही समन कर लेना, ये बताता है कि आईपीएल कराना भी इस देश में इतना आसान नहीं है क्योंकि हमें सिर्फ अपनी टीवी और मोबाइल स्क्रीन पर मैच दिख रहा है, लेकिन उसे आयोजित कराने की अपनी एक बड़ी जद्दोजहद है. और क्रिकेट को पूजने वाले फैन्स अभी भी एक टिकट के लिए लाइन में लगेंगे और माननीय जी को मुफ्त में टिकट मिलेगा.
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