इस गेंदबाज को हर विकेट लेने पर मिलते थे 10 रुपये, सेलेक्शन पर रात भर रोता रहा

विजय हजारे ट्रॉफी में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद देवधर ट्रॉफी के लिये चुने गये पापू ने अपने पुराने दिनों को याद किया जब हर विकेट का मतलब होता था कि उन्हें दोपहर और रात का भरपेट खाना मिलेगा.

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पापू राय (फोटो- फेसबुक) पापू राय (फोटो- फेसबुक)

अनुग्रह मिश्र

  • नई दिल्ली,
  • 19 अक्टूबर 2018,
  • अपडेटेड 6:22 PM IST

किसी का शौक उसे खिलाड़ी बनाता है तो किसी की जरूरतें उसे मैदान तक खींच लाती है. ऐसी ही कहानी क्रिकेटर पापू राय की है जिन्होंने दो जून की रोटी के लिए क्रिकेट खेलना शुरू किया था और अब उन्हें देवधर ट्रॉफी के लिए भारत सी टीम में चुना गया है. क्रिकेट खेलने के दौरान स्पिनर पापू की गेंदबाजी से तय होता था कि उनके पेट की भूख मिटेगी या नहीं.

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इस 23 वर्षीय गेंदबाज को देवधर ट्रॉफी के लिये अंजिक्य रहाणे की अगुवाई वाली भारत सी टीम में चुना गया है लेकिन कोलकाता के इस लड़के की कहानी काफी दर्दनाक है. पापू ने बचपन में ही अपने माता-पिता को खो दिया था. अपने नये राज्य ओडिशा की तरफ से विजय हजारे ट्रॉफी में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद देवधर ट्रॉफी के लिये चुने गये पापू ने अपने पुराने दिनों को याद किया जब हर विकेट का मतलब होता था कि उन्हें दोपहर और रात का भरपेट खाना मिलेगा.

मुफलिसी में बीता बचपन

पापू ने अपने मुश्किल भरे दिनों को याद करते हुए एजेंसी से कहा, ‘भैया लोग बुलाते थे और बोलते थे कि बॉल डालेगा तो खाना खिलाऊंगा और हर विकेट का 10 रुपये देते थे.’उनके माता पिता बिहार के रहने वाले थे जो कमाई करने के लिये बंगाल आ गये थे. पापू ने अपने पिता जमादार राय और पार्वती देवी को तभी गंवा दिया था जबकि वह नवजात थे. उनके पिता ट्रक ड्राइवर थे और दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हुआ जबकि उनकी मां लंबी बीमारी के बाद चल बसी थीं.

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पापू के माता-पिता बिहार के सारण जिले में छपरा से 41 किमी दूर स्थित खजूरी गांव के रहने वाले थे तथा काम के लिये कोलकाता आ गये थे. वह अपने माता पिता के बारे में सिर्फ इतनी ही जानकार रखते हैं. कोलकाता के पिकनिक गार्डन में किराये पर रहने वाले पापू ने कहा कि उनको कभी देखा नहीं, कभी गांव नहीं गया, मैंने उनके बारे में सिर्फ सुना है.

पापू बताते है कि काश कि वे आज मुझे भारत सी की तरफ से खेलते हुए देखने के लिये जीवित होते. मैं कल पूरी रात नहीं सो पाया और रोता रहा. मुझे लगता है कि पिछले कई साल की मेरी कड़ी मेहनत का अब मुझे फल मिल रहा है. माता-पिता की मौत के बाद पापू के चाचा और चाची उनकी देखभाल करने लगे लेकिन जल्द ही उनके मजदूर चाचा भी चल बसे. इसके बाद इस 15 वर्षीय किशोर के लिये एक समय का भोजन जुटाना भी मुश्किल हो गया. लेकिन क्रिकेट से उन्हें नया जीवन मिला.

उन्होंने पहले तेज गेंदबाज के रूप में शुरुआत की लेकिन हावड़ा क्रिकेट अकादमी के कोच सुजीत साहा ने उन्हें बायें हाथ से स्पिन गेंदबाजी करने की सलाह दी. वह 2011 में बंगाल क्रिकेट संघ की सेकेंड डिवीजन लीग में सर्वाधिक विकेट लेने वाले गेंदबाज थे. उन्होंने तब डलहौजी की तरफ से 50 विकेट लिये थे. लेकिन तब इरेश सक्सेना बंगाल की तरफ से खेला करते थे और बाद में प्रज्ञान ओझा के आने से उन्हें बंगाल टीम में जगह नहीं मिली.

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पेट की भूख और क्रिकेट

भोजन और घर तलाश में पापू भुवनेश्वर से 100 किमी उत्तर पूर्व में स्थित जाजपुर आ गये. पापू ने कहा, ‘मेरे दोस्त (मुजाकिर अली खान और आसिफ इकबाल खान) जिनसे मैं यहां मिला, उन्होंने मुझसे कहा कि वे मुझे भोजन और छत मुहैया कराएंगे. इस तरह से ओडिशा मेरा घर बन गया.’

पापू ने 2015 में ओडिशा अंडर-15 टीम में जगह मिली. तीन साल बाद पापू सीनियर टीम में पहुंच गये और उन्होंने ओडिशा की तरफ से लिस्ट ए के आठ मैचों में 14 विकेट झटके. अब वह देवधर ट्रॉफी में खेलने के लिये उत्साहित हैं. उन्होंने कहा कि उम्मीद है कि मुझे मौका मिलेगा और मैं अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करूंगा, इससे मुझे काफी कुछ सीखने को मिलेगा.

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