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हम कोरोना वायरस में ही लगे रहे और दुनिया एक और तबाही की तरफ बढ़ गई!

aajtak.in
  • कैनबरा,
  • 24 अप्रैल 2022,
  • अपडेटेड 7:47 PM IST
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पृथ्वी के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण देखे गए हैं जब वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड (Carbon Dioxide) की बढ़ती मात्रा से ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) बढ़ी और इसकी वजह से पृथ्वी की ज़्यादातर प्रजातियां तबाह हो गईं. प्राचीन काल में ये घटनाएं ज्वालामुखी विस्फोट (Volcanic Eruption ) या एस्टिरॉयड के प्रभावों (Asteroid Impact) से घटी थीं. पृथ्वी एक बार फिर सामूहिक विनाश की तरफ बढ़ रही है और इस बार ज़िम्मेदार सिर्फ इंसान है. (फोटो: पिक्सबे)

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ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी (Australian National University) के पृथ्वी और जीवाश्म वैज्ञानिक डॉ. एंड्रयू वाई. ग्लिक्सन (Dr. Andrew Y. Glikson) ने एस्टिरॉयड के प्रभावों, ज्वालामुखी, जलवायु परिवर्तन और प्रजातियों के बड़े पैमाने पर विलुप्त होने के बीच के संबंधों पर शोध किया है. इस  शोध से पता चलता है कि कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का वर्तमान ग्रोथ रेट, उस वक्त की तुलना से कहीं अधिक है जिसकी वजह से सामूहिक विनाश की पिछली दो घटनाएं हुई थीं. इसमें डायनासोर का विनाश भी शामिल है. (फोटो: पिक्सबे)

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कई प्रजातियां धीरे-धीरे पर्यावरण में हो रहे परिवर्तनों के हिसाब से खुद को ढ़ाल लेती हैं. लेकिन पृथ्वी के इतिहास से पता चलता है कि जलवायु में बहुत बड़ा परिवर्तन हो, तो बहुत सी प्रजातियां विलुप्त हो सकती हैं. उदाहरण के लिए, करीब 6.6 करोड़ साल पहले एक एस्टेरॉयड पृथ्वी से टकराया था. चट्टानों के टूटने और भयानक आग से करीब 10,000 सालों तक भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड निकला. इससे वैश्विक तापमान बढ़ गया, समुद्र का स्तर बढ़ गया और समुद्र अम्लीय हो गए. डायनासोर समेत, करीब 80% प्रजातियों का सफाया हो गया था. (फोटो: Unsplash)

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करीब 5.5 करोड़ साल पहले, वैश्विक तापमान में फिर से वृद्धि हुई. इस घटना को  Paleocene-Eocene Thermal Maximum कहा जाता है, जिसकी वजह अभी तक साफ नहीं है. एक सिद्धांत, जिसे मीथेन बर्प परिकल्पना (Methane Burp Hypothesis ) कहा जाता है, इसके मुताबिक एक बड़ा ज्वालामुखी विस्फोट हुआ जिससे समुद्र के तल से मीथेन गैस निकली. इससे समुद्र अधिक अम्लीय (Acidic) हो गए और कई प्रजातियां खत्म हो गईं. (फोटो: पिक्सबे)

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18वीं शताब्दी के अंत में औद्योगिक काल शुरू होने से पहले, वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर लगभग 300 भाग प्रति 10 लाख था. इसका मतलब है कि वातावरण में गैस के हर दस लाख अणुओं पर 300 कार्बन डाइऑक्साइड थे. इस साल फरवरी में, वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड (Atmospheric Carbon Dioxide) 414.1 भाग प्रति दस लाख पहुंच गया. ग्रीनहाउस गैस (greenhouse gas) का कुल स्तर लगभग 500 भागों प्रति दस लाख कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर पहुंच गया. ग्रीनहाउस गैस, कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड का मिश्रण होता है. (फोटो: Unsplash)

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कार्बन डाइऑक्साइड अब हर साल, दो से तीन भाग प्रति दस लाख की दर से वायुमंडल में प्रवेश कर रही है. वैज्ञानिकों ने पाया कि पृथ्वी के इतिहास में वर्तमान कार्बन उत्सर्जन, अपने चरम पर है. शोध से पता चलता है कि वार्षिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन (Annual Carbon Dioxide Emissions), एस्टेरॉयड के पिछले दोनों प्रभावों की तुलना में बहुत ज्यादा है. कार्बन डाइऑक्साइड की वर्तमान वायुमंडलीय सांद्रता (Atmospheric Concentrations) अभी तक 5.5 और 6.5 करोड़ साल पहले देखे गए स्तरों पर नहीं है. लेकिन कार्बन डाइऑक्साइड के बड़े पैमाने पर होने का मतलब है कि जलवायु परिवर्तन, कई पौधों और जानवरों की प्रजातियों के हिसाब से बहुत तेजी से हो रहा है. (फोटो: pexels)

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पिछले साल संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट में लगभग दस लाख जानवरों और पौधों की प्रजातियों के विलुप्त होने की चेतावनी दी गई थी. रिपोर्ट में कहा गया है कि भूमि पर रहने वाले 47% स्तनधारी और 25% पक्षी जलवायु परिवर्तन की वजह से पहले से ही बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं. कई शोधकर्ताओं को डर है कि जलवायु प्रणाली एक ऐसे बिंदु पर आ रही है, जहां एक सीमा के आगे इतनी तेजी से परिवर्तन होंगे जिन्हें बदला नहीं जा सकेगा. ये परिवर्तन विनाशकारी प्रभाव पैदा करेंगे. इसके कई उदाहरण अभी से दिख रहे हैं जैसे- आर्कटिक के बढ़ते तापमान से बड़ी मात्रा में बर्फ का पिघलना (फोटो: NASA)

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2016 में किए गए एक शोध से पता चला है कि मनुष्यों पर इसका कितना गहरा प्रभाव पड़ रहा है. शोध में कहा गया है कि पृथ्वी जो करीब 20,000 सालों में स्वाभाविक रूप से अगले हिमयुग (Ice Age) में प्रवेश कर सकती थी, कार्बन डाइऑक्साइड के बढ़ते तापमान की वजह से इसमें लगभग 50,000 सालों की देरी होगी. इस दौरान, पृथ्वी के ज्यादातर हिस्सों में बेहद तेज तूफानी परिस्थियां होंगी. शोध से पता चलता है कि उप-ध्रुवीय क्षेत्रों और आश्रय वाली पर्वत घाटियों में मनुष्यों के जीवित रहने की संभावना है. यहां ठंड की वजह से पेड़-पौधे और जीव बने रहेंगे. (फोटो: NASA)

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पृथ्वी के अगले सामूहिक विनाश को टाला जा सकता है. ऐसा तभी हो सकता है जब कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन आश्चर्यजनक रूप से कम हो जाए और हम वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को हटाने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करें. लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखें, तो मानव गतिविधियां पृथ्वी के बड़े हिस्से को निर्जन बनाने पर तुली हैं. (फोटो: पिक्सबे)

 

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