नवरात्र के दौरान विशेष पूजा होती है मां छिन्न मस्ति‍के के मंदिर में

झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर मां छिन्नमस्तिके का मंदिर है. असम के कामाख्या मंदिर के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े शक्तिपीठ के रूप में विख्यात मां छिन्नमस्तिके मंदिर काफी लोकप्रिय हैं. जानें महत्व...

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छिन्न मस्तीके मंदिर छिन्न मस्तीके मंदिर

वंदना भारती

  • नई दिल्ली,
  • 27 सितंबर 2017,
  • अपडेटेड 11:47 AM IST

झारखण्ड के रामगढ़ जिले के रजरप्पा इलाके में स्तिथ मां छिन्न मस्त‍िका का मंदिर नवरात्र के दौरान भक्तों की भक्ति और आस्था के सैलाब में डूबा रहता है.

माता छिन्न मस्तिका के रूप में यहां मां दुर्गा भक्तों की समस्त मनोकामनाओं को पूरा करती है. यह सिद्धपीठ तंत्र विद्या का भी एक बड़ा केंद्र है.

बताया जाता है कि दस महाविद्याओं की सिद्धि हासिल करने के लिए किसी भी साधक को यहां आना ही पड़ता है. क्योंकि दस महाविद्या में छठी मां छिन्नमस्ता ही हैं.

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दामोदर और भैरवी नदी के संगम पर रजरप्पा स्थित मां छिन्न मस्तिके का यह मंदिर अपनी विशिष्टताओं के लिए जग प्रसिद्ध है. शास्त्रों के अनुसार माता के तीन सिद्ध पीठों में इसे दूसरा स्थान प्राप्त है.

पहले स्थान पर असम का कामख्या मंदिर है और तीसरे पर पश्चिम बंगाल के तारापीठ को माना गया है.

इसमें सबसे रोचक तथ्य यह है की ये तीनों ही पुरुष नद के तट पर अवस्थित हैं. कामख्या में ब्रह्मपुत्र, तारापीठ में अजय और रजरप्पा में दामोदर.

इन तीनों पुरुष नद में महिला नदियों का संगम प्राकृतिक रूप से हुआ है. इस मंदिर के गर्भगृह में माता एक हाथ में खडग और दूसरे में खडग से कटा अपना सर थामे है.

गले से निकलती तीन रक्त धाराओं में से दो माता की सहचरी डाकिनी और शाकिनी ग्रहण कर रही है, वहीं तीसरा स्वय उनके मुख में समां रहा है. माता के पैरों के नीचे ब्रह्म कमल के अन्दर रति और कामदेव की विपरीत रति मुद्रा है, जो इस बात को दर्शाता है की माता मनुष्यों के अन्दर की सारी बुराईयों का दमन करने में सक्षम है.

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की उत्पति के बारे में बताते हैं कि जब मां पार्वती चंडिका का रूप धारण कर दैत्यों का संहार करती हुई उन्मुक्त हो गईं तो उन्हें शांत करने के लिए भगवन शिव ने उनसे प्रार्थना की.

फलस्वरूप माता में अपनी भूख शांत करने के लिए अपना ही शीश काटकर रक्त की धारा से अपना और अपनी सहचरियों की पिपासा को शांत किया. रामगढ़ के इस स्थान के बारे में मान्यता है कि इलाके के आदिवासी राजा जब शिकार पर निकले तो दामोदर और भैरवी नदी के संगम से निकल कर माता ने साक्षात दर्शन देते हुए कहा की यहां मौजूद मंदिर के शिलापट्ट पर मेरी मूर्ति अंकित है, जिसे पूजने से तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी और ऐसा ही हुआ.

उसके बाद से ही यहां भक्तों की भीड़ लगी रहती है और माता के इस मंदिर से कोई निराश नहीं लौटता.

. रामगढ़ का ये इलाका सिद्धपीठ होने के कारण तंत्रवाद का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र है. इस महाविद्या का संबंध महाप्रलय से है. महाप्रलय का ज्ञान कराने वाली यह महाविद्या भगवती त्रिपुरसुंदरी का ही रौद्र रूप है. विद्यात्रयी में यह दूसरी विद्या गिनी जाती हैं.

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