रणभूमि में श्रीकृष्ण या समाधि में महादेव... कौन है योग के ज्ञान का आधार

महादेव और श्रीकृष्ण दोनों ही योग के महान गुरु हैं, लेकिन उनके योग के मार्ग अलग हैं. गीता में श्रीकृष्ण को योगेश्वर कहा गया है और वे स्वयं कहते हैं कि रुद्रों में शंकर हैं, जो महादेव का प्रतीक हैं.

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श्रीकृष्ण और महादेव में कौन है योग का असली आधार श्रीकृष्ण और महादेव में कौन है योग का असली आधार

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 15 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 9:01 AM IST

महादेव शिव महायोगी हैं. उनका ध्यान ही उनका योग है. समाधि की स्थिति में पद्मासन में बैठे शिव किसी तपस्वी से लगते हैं. यही वजह है कि उन्हें आदियोगी और महायोगी कहकर पुकारा जाता है, लेकिन योग का गुरु और ईश्वर होने का दर्जा श्रीकृष्ण को भी मिला हुआ है. जिन्हें 'योगेश्वर श्रीकृष्ण' कहा जाता है. यहीं से ये सवाल उभरता है कि, योग का आधार है कौन? महादेव या श्रीकृष्ण? लेकिन जब हम ग्रंथों और शास्त्रों को ध्यान से पढ़ते हैं तो तस्वीर मुकाबले की नहीं, एकता की नजर आती है.

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सबसे पहले बात श्रीकृष्ण की. श्रीमद्भगवद्गीता में उन्हें साफ-साफ ‘योगेश्वर’ कहा गया है. गीता के 18वें अध्याय में संजय कहते हैं, 'यत्र योगेश्वरः कृष्णो…' यानी जहां योगेश्वर कृष्ण हैं, वहीं विजय है. यहां योग का मतलब है, जीवन के बीच खड़े होकर भी मन को स्थिर रखना. युद्धभूमि में अर्जुन को कर्म, ज्ञान और भक्ति का संतुलन सिखाना, यही श्रीकृष्ण का योग है.

अब 10वें अध्याय ‘विभूति योग’ का 23वां श्लोक देखिए. श्रीकृष्ण कहते हैं 'मैं रुद्रों में शंकर हूं.'

रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्.
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥*

मतलब साफ है जो भी अपने वर्ग में सबसे श्रेष्ठ है, वह मेरी ही विभूति है. रुद्रों में जो शंकर हैं, वे भी मेरी ही महिमा का रूप हैं. यहां श्रीकृष्ण यह नहीं कह रहे कि शिव उनसे अलग हैं, बल्कि यह कि जो सर्वोच्च है, वही उनका स्वरूप है. अब महादेव की बात. शिव को आदियोगी कहा जाता है. योग का पहला गुरु. वे ध्यान, तप और समाधि के प्रतीक हैं. हिमालय की शांति में बैठे शिव भीतर की यात्रा का रास्ता दिखाते हैं. वे संहार के देवता हैं, लेकिन उनका संहार भी सृजन के लिए होता है.

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गीता का यह श्लोक एक गहरी बात कहता है कि शिव और कृष्ण में कोई टकराव नहीं है. अगर श्रीकृष्ण कहते हैं 'रुद्रों में मैं शंकर हूं' तो इसका मतलब यह है कि शिव उसी परम सत्य का रूप हैं, जिसे कृष्ण अपने शब्दों में समझा रहे हैं. दरअसल, भारतीय दर्शन में ‘मैं’ का अर्थ देह नहीं, परमात्मा होता है. जब श्रीकृष्ण कहते हैं 'मैं शंकर हूं' तो वह एकत्व की घोषणा है. जैसे वे कहते हैं 'पर्वतों में मैं सुमेरु हूं', 'वसुओं में मैं अग्नि हूं वैसे ही रुद्रों में वे शंकर हैं.

इसका अर्थ यह है कि जो भी अपने क्षेत्र में सर्वोच्च है, वह उसी एक परम चेतना की झलक है. शिव संहार के अधिपति हैं, योग के शिखर हैं, इसलिए कृष्ण उन्हें अपनी दिव्य विभूति बताते हैं.

तो फिर असली योगेश्वर कौन?

अगर हम गीता की रोशनी में देखें तो श्रीकृष्ण योगेश्वर कहे गए हैं, लेकिन उसी गीता में वे यह भी कह रहे हैं कि रुद्रों में जो शंकर हैं, वे भी मैं ही हूं. यानी शिव और कृष्ण अलग-अलग सत्ता नहीं, एक ही परम सत्य के दो रूप हैं.

एक कर्मयोग सिखाता है, रणभूमि में खड़े होकर. दूसरा ध्यानयोग सिखाता है, समाधि में बैठकर. एक बांसुरी बजाता है, दूसरा डमरू. एक गीता सुनाता है, दूसरा मौन में ज्ञान देता है.
लेकिन स्रोत एक ही है. इसलिए असली सवाल ये होना चाहिए कि हम किस रास्ते से योग को समझना चाहते हैं? कर्म के रास्ते से या ध्यान के रास्ते से? गीता का यह श्लोक साफ कर देता है कि श्रेष्ठता की हर झलक उसी एक परम चेतना की है. शिव भी उसी के रूप हैं, कृष्ण भी. यानी इसका अर्थ है कि योगेश्वर एक ही है, रूप अनेक हैं. शिव में भी वही, कृष्ण में भी वही. इसलिए श्रीकृष्ण और महादेव दोनों ही परम योगी हैं, लेकिन उनके योग के मार्ग अलग-अलग हैं.

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