Mahabharat Facts: क्यों वैज्ञानिक ओपेनहाइमर ने महाभारत के अर्जुन से ली थी प्रेरणा? जानें इसके पीछे की चौंकाने वाली कहानी

Mahabharat Facts: जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर, जिन्हें एटम बम का जनक कहा जाता है, ने महाभारत के अर्जुन से प्रेरणा ली थी. जैसे अर्जुन कुरुक्षेत्र के युद्ध में अपने कर्तव्य और भावनाओं के बीच संघर्ष फंसे थे, वैसे ही ओपेनहाइमर भी अपने वैज्ञानिक कार्यों में फंसे हुए थे. ओपेनहाइमर ने भगवद्गीता के संदेश को समझा था और अपने कर्तव्य को निभाने के दौरान आंतरिक युद्ध का सामना भी किया था.

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क्यों ओपनहाइमर अपने आप को महाभारत के अर्जुन जैसा समझते थे? (Photo: Getty Images) क्यों ओपनहाइमर अपने आप को महाभारत के अर्जुन जैसा समझते थे? (Photo: Getty Images)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 12 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 11:00 AM IST

Mahabharat Facts: विश्व में कई ऐसे वैज्ञानिक व साइंटिस्ट आए, जो आज भी अपने खास एक्सपेरिमेंट्स के लिए जाने जाते हैं. उन्हीं में से एक हैं जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर. सन् 1945 में जब पहला परमाणु विस्फोट हुआ था, तब दुनिया ने एक ऐसे साइंटिस्ट के बारे में जाना था, जो एक तरफ बड़ी उपलब्धि पर खड़ा था और दूसरी तरफ नैतिक दुविधा में फंसा था. ये साइंटिस्ट थे जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर, जिन्हें 'फादर ऑफ द एटम बम' भी कहा जाता है. लेकिन दिलचस्प बात यी है कि उस वक्त उनके दिमाग में ना फिजिक्स थी और ना पॉलिटिक्स, बल्कि उनका ध्यान इंडियन फिलॉसफी की तरफ गया था, खासकर भगवद्गीता की ओर. लेकिन, मन में अब यह सवाल आ रहा है कि है कि कैसे महाभारत ओपेनहाइमर की प्रेरणा बनी थी और उन्होंने महाभारत के किस किरदार से खुद को जोड़कर देखा था?

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महाभारत के इस किरदार से ओपेनहाइमर ने ली थी प्रेरणा

जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर खुद को कोई भगवान नहीं मानते थे, बल्कि एक ऐसे इंसान के रूप में देखते थे, जिसकी स्थिति कहीं न कहीं महाभारत के अर्जुन जैसी थी. महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े थे, तो उनके सामने सिर्फ एक युद्ध नहीं, बल्कि अपने ही परिवार, गुरु और प्रियजनों के खिलाफ लड़ाई की कठिन सच्चाई थी. एक ऐसा योद्धा, जिसने पूरी जिंदगी इसी पल के लिए तैयारी की थी, वह अचानक भीतर से कमजोर पड़ गए थे. क्योंकि उन्हें अपने ही लोगों के विनाश का बोझ परेशान कर रहा था.

ठीक यही लड़ाई ओपेनहाइमर के अंदर भी चल रहा था. उन्होंने अपने ज्ञान और विज्ञान के बल पर जो कार्य किया था, वह इतिहास बदलने वाला था, लेकिन उसके परिणामों ने उन्हें भीतर से झकझोर दिया था. जैसे अर्जुन अपने कर्तव्य और भावनाओं के बीच फंसे थे, वैसे ही ओपेनहाइमर भी अपनी जिम्मेदारी और उसके विनाशकारी प्रभावों के बीच गहरे मानसिक संघर्ष से गुजर रहे थे. 

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मॉर्डन कुरुक्षेत्र का थे हिस्सा

जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर के लिए उनकी लैब ही उनका कुरुक्षेत्र बन गई थी. यहीं उन्होंने एटम बम बनाया था. यह एक ऐसी उपलब्धि थी, जो बड़ी सफलता तो थी ही लेकिन उतनी ही भयानक परेशानी भी थी. यह सिर्फ एक प्रयोग नहीं था, बल्कि समय के खिलाफ दौड़, युद्ध की रणनीति और अपने देश के प्रति कर्तव्य का हिस्सा था. ठीक वैसे ही जैसे अर्जुन अपनी भावनाओं से ऊपर उठकर एक बड़े धर्मयुद्ध का हिस्सा बने थे, ओपेनहाइमर भी खुद से कहीं बड़ी दुविधा में खड़े थे.

लेकिन जब एटम बम का 'ट्रिनिटी टेस्ट' सफल हुआ था, तो यह जीत उतनी सरल नहीं थी, जितनी दिख रही थी. उसी क्षण उन्हें इस बात का गहरा एहसास हुआ कि यह शक्ति कितनी विनाशकारी हो सकती है. तभी उनके मन में भगवान कृष्ण द्वारा कही गई गीता की वह प्रसिद्ध पंक्ति याद आई, 'मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ काल (मृत्यु) हूं.' इसी कारण ओपेनहाइमर का जुड़ाव श्रीकृष्ण से नहीं, बल्कि अर्जुन से था. एक ऐसे योद्धा से, जो अपने कर्तव्य को निभाते हुए भीतर से टूट रहा था और अपने ही कर्मों के परिणामों के बोझ से दब भी रहा था.

ये था ओपनहाइमर का कर्तव्य

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श्री कृष्ण गीता में अर्जुन से कहते हैं कि 'आत्मा अमर है और शरीर नश्वर.' मनुष्य का कर्तव्य है कि वह बिना परिणाम की चिंता किए अपना धर्म निभाए. इसी संदेश ने अर्जुन को उनके संदेह और कमजोरी से बाहर निकाला था. जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने भी इस विचार को गहराई से समझा था. उन्होंने एटम बम को एक ऐसी आवश्यकता के रूप में देखा, जिसे रोका नहीं जा सकता था. जैसे कर्म का नियम एक बार शुरू होने पर चलता रहता है, वैसे ही परमाणु ऊर्जा की प्रक्रिया भी इंसान की इच्छा या इरादों पर नहीं रुकती है. एक बार यह ज्ञान हासिल हो गया, तो उसे भुलाया नहीं जा सकता है. यही बात उन्होंने 1947 में MIT में भी कही थी.

हालांकि, ओपेनहाइमर ना तो नेता थे और ना ही कोई सैनिक जिन्होंने उसे इस्तेमाल किया हो. फिर भी, वह इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा थे, जिसकी वजह से यह संभव हो पाया था. ठीक अर्जुन की तरह, वे भी एक ऐसे मोड़ पर खड़े थे, जहां अपने कर्तव्य और उसके नैतिक परिणामों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं था. और शायद यही इस कहानी का सबसे खास पहलू भी है कि अर्जुन की तरह ओपेनहाइमर ने भी अपना कर्तव्य निभाया था, लेकिन बिना किसी आंतरिक संघर्ष के नहीं.

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ओपेनहाइमर और अर्जुन का संबंध क्यों रखता है मायने?

यह सिर्फ एक किस्सा नहीं है कि एक वैज्ञानिक ने किसी प्राचीन ग्रंथ का उल्लेख किया हो. दरअसल, यह उस गहरी कड़ी को उजागर करता है, जो ऐसे  समय में व्यक्ति के मन में उछल कूद कर रही होती है. जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर और अर्जुन की यह समानता हर इंसान को परेशान करती है कि मेरा कर्तव्य क्या है? और जो मैं कर रहा हूं, उसकी असली कीमत क्या है?

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