नित्य प्रातः जल देते समय पितरों से कृपा करने की प्रार्थना करें. इससे पितृ सम्बन्धी कोई ऋण पैदा नहीं होगा. जीवन में सबसे बड़ा ऋण हमारी माता का ही होता है. चतुर्थ भाव, चन्द्रमा और शुक्र मुख्य रूप से माता और उसके सम्बन्ध के बारे में बताते हैं. अगर कुंडली में राहु का सम्बन्ध चतुर्थ भाव चन्द्रमा या शुक्र से हो तो समझना चाहिए कि कुंडली में मातृ ऋण है. हाथों का कठोर होना और हथेलियों का काला होना भी मातृ ऋण के बारे में बताता है. मातृऋण का शोधन न कर पाने पर, तमाम तरह की समस्याएं पैदा होती हैं.
मातृ ऋण प्रभावशाली हो तो किस तरह की समस्याएं आती हैं?
- व्यक्ति को भय की तथा तनाव पालने की आदत होती है.
- अक्सर व्यक्ति हायपर टेंशन या अवसाद का शिकार हो जाता है .
- व्यक्ति के जीवन में युवावस्था से ही उतार चढ़ाव शुरू हो जाता है.
- व्यक्ति को महिलाओं की वजह से समस्या का सामना करना पड़ सकता है.
अलग अलग राशियों पर मातृ ऋण का क्या असर पड़ता है?
मेष, सिंह और धनु
- मेष, सिंह और धनु राशी पर मातृ ऋण होने से स्वास्थ्य काफी खराब होता है.
- अक्सर वहम और अवसाद की समस्या हो जाती है, सनक के शिकार भी हो जाते हैं.
वृष, कन्या, मकर
- यहां पर मातृऋण होने से व्यक्ति आर्थिक स्थिति में काफी समस्या आती है.
- अक्सर क्रोध और जिद्द में आकर आत्महत्या तक पहुँच जाते हैं.
मिथुन, तुला, कुम्भ
- यहां मातृऋण होने से व्यक्ति का पारिवारिक जीवन अच्छा नहीं होता.
- व्यक्ति अक्सर भावनाओं और प्रेम में काफी बड़ी गलतियां कर देता है.
- स्त्रियों की वजह से अक्सर पदावनति हो जाती है , अपयश भी मिलता है.
कर्क, वृश्चिक, मीन
- यहां मातृऋण होने से संतान सुख मिलने में बाधा आती है.
- या संतान के कारण जीवन नरक हो जाता है, बहुत कष्ट मिलता है.
- यहाँ वृद्धावस्था बहुत कठिन और ख़राब व्यतीत होती है.