Sankashti Chaturthi 2026: 5 या 6 अप्रैल, कब रखा जाएगा वैशाख संकष्टी चतुर्थी का व्रत? नोट कर लें सही डेट

Sankashti Chaturthi 2026:वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को विकट संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है. हिंदू धर्म में इस तिथि का विशेष आध्यात्मिक महत्व है क्योंकि यह भगवान गणेश के 'विकट' स्वरूप को समर्पित है.

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संकष्टी चतुर्थी 2026: 5 या 6 अप्रैल? संकष्टी चतुर्थी 2026: 5 या 6 अप्रैल?

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 04 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 12:23 PM IST

Vaishakh Sankashti Chaturthi 2026: निर्जला एकादशी और अक्षय तृतीया की तरह ही वैशाख मास की संकष्टी चतुर्थी का भी बड़ा महत्व है. साल 2026 में विकट संकष्टी चतुर्थी की तारीख को लेकर थोड़ा कन्फ्यूजन है कि व्रत 5 अप्रैल को रखा जाए या 6 अप्रैल को. ज्योतिषीय गणना और चंद्रोदय के समय को देखते हुए आइए जानते हैं कि आपके लिए व्रत रखने का सही दिन और शुभ मुहूर्त क्या है. 

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संकष्टी चतुर्थी 2026: 5 या 6 अप्रैल?
पंचांग के अनुसार, वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत 5 अप्रैल 2026 को दोपहर 03:42 बजे से हो रही है. इस तिथि का समापन अगले दिन 6 अप्रैल को दोपहर 02:18 बजे होगा. चूंकि संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही पूरा होता है और चतुर्थी तिथि वाली रात 5 अप्रैल को मिल रही है, इसलिए 5 अप्रैल 2026, रविवार को ही संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखना श्रेष्ठ है. 

पूजा और चंद्रोदय का समय (Moonrise Timing)
गणेश जी की पूजा के लिए शाम का समय सबसे उत्तम माना जाता है.  5 अप्रैल को चंद्रोदय का समय नोट कर लें. 

चंद्रोदय (Moonrise): रात 09:22 बजे (इसी समय चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाएगा).

अमृत काल: शाम 05:25 से 07:01 तक

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अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:59 से दोपहर 12:49 तक. 

वृश्चिक राशि में चंद्रमा का गोचर
इस बार की चतुर्थी पर एक खास ज्योतिषीय घटना हो रही है.  चंद्रमा मंगल की राशि वृश्चिक में गोचर करेंगे.  वृश्चिक राशि में चंद्रमा 'नीच' के माने जाते हैं, ऐसे में गणेश जी की आराधना करने से मानसिक शांति मिलेगी.  कुंडली के चंद्र दोष दूर होंगे. जो लोग डिप्रेशन या तनाव महसूस करते हैं, उनके लिए यह व्रत बहुत लाभकारी रहेगा. 

कैसे करें पूजा? 
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, भगवान गणेश के सामने व्रत का संकल्प लें. दिन भर फलाहार रहें. शाम को गणेश जी की मूर्ति को पीले वस्त्र पहनाएं. गणपति को उनके प्रिय मोदक या लड्डू का भोग लगाएं. दूर्वा (घास) जरूर अर्पित करें. रात को जब चंद्रमा उदय हो (09:22 PM), तब चांदी के पात्र या लोटे में जल, दूध और अक्षत डालकर चंद्रमा को अर्घ्य दें.अर्घ्य देने के बाद ही प्रसाद ग्रहण कर अपना उपवास खोलें.

क्यों रखा जाता है यह व्रत?
मान्यता है कि वैशाख की इस चतुर्थी को 'विकट संकष्टी चतुर्थी' कहते हैं.  इसका व्रत करने से जीवन के बड़े से बड़े 'विकट' यानी कठिन संकट टल जाते हैं. खास तौर पर संतान की सुख-समृद्धि और घर की निगेटिव एनर्जी दूर करने के लिए यह उपवास अचूक माना गया है.

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