आज शबरी जयंती है. हर साल फाल्गुन कृष्ण सप्तमी तिथि को शबरी जयंती मनाई जाती है. यह दिन माता शबरी को समर्पित है, जिनके जूठे बेर स्वयं भगवान राम ने खाए थे. भगवान राम के प्रति शबरी की अटूट आस्था और भक्ति का उल्लेख रामायण में भी किया गया है. शबरी ने अपना सारा जीवन प्रभु की प्रतीक्षा में बिता दिया था. फिर एक दिन आया, जब भगवान राम ने न केवल उन्हें दर्शन दिए, बल्कि उनके जूठे बेर भी खाए.
शबरी और राम की कथा
लंकापति रावण द्वारा माता सीता के हरण के बाद भगवान श्रीराम अपनी पत्नी की खोजने निकाल पड़े. इस कठिन यात्रा में उनके साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी थे. भगवान राम माता सीता को ढूंढने एक वन की तरफ निकल पड़े. इसी वन में राम की अटूट भक्त शबरी की भी कुटिया थी. शबरी ने श्रीराम की करुणा, मर्यादा और भक्तवत्सल स्वभाव के बारे में सुन रखा था. इसलिए शबरी ने प्रभु के दर्शन की अभिलाषा को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था.
निर्धन शबरी का जीवन बहुत ही साधारण था. वृद्धावस्था में शबरी प्रतिदिन सुबह जाग जातीं और जंगल से ताजे फूल चुनकर लातीं. अपनी छोटी सी कुटिया के बाहर वह फूलों को पंक्तियों में सजातीं. ताकि जब भगवान श्रीराम आएं तो उनके चरण उन फूलों को स्पर्श करें. कुछ फूलों से वह माला भी बनातीं, जिसे वह अपने आराध्य को अर्पित कर सकें. यह अभ्यास वह सालों तक लगातार करती रही. शबरी के मन में पूर्ण विश्वास था कि एक दिन भगवान राम अवश्य उनके द्वार आएंगे.
शबरी के मुख से दिन-रात बस यही निकलता था कि “मेरे राम आएंगे.” वर्षों तक उन्होंने इसी आशा में जीवन बिताया. अंततः वह शुभ घड़ी आ गई, जब माता सीता की खोज में निकले श्रीराम और लक्ष्मण भटकते हुए शबरी की कुटिया तक पहुंचे. जैसे ही शबरी ने उन्हें देखा, उनका हृदय आनंद से भर गया. उन्होंने फूलों से भगवान का स्वागत किया और उनका सपना साकार हो गया.
शबरी अत्यंत निर्धन थीं. उसके पास राम के सत्कार के लिए बहुत कुछ नहीं था. उसके पास वन से बटोरे गए कुछ बेर थे, जो उसने प्रेमवश पहले ही चख रखे थे. ताकि जो मीठे हों वही भगवान श्रीराम को अर्पित कर सके. उसका उद्देश्य केवल यही था कि प्रभु के हिस्से में कोई खट्टा फल न चला जाए.
लक्ष्मण को शबरी द्वारा चखे हुए बेर पसंद नहीं आए. इसलिए उन्होंने बिना किसी को दिखाए उन्हें अपने पास रख लिया. वहीं शबरी और श्रीराम के बीच भक्त और भगवान का मधुर संवाद देर तक चलता रहा. शबरी के अटूट प्रेम और भक्ति से श्रीराम अत्यंत प्रसन्न हुए. उनके लिए शबरी के बेर अमृत समान थे, क्योंकि उनमें अपार प्रेम और श्रद्धा घुली हुई थी.
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