देवभूमि उत्तराखंड में जहां चार धामों की महिमा विश्व प्रसिद्ध है. वहीं उत्तराखंड के टिहरी जनपद में स्थित सेम मुखेम धाम को पांचवां धाम कहा जाता है. गढ़वाल रियासत के राजाओं की ओर से इस मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. टिहरी राज परिवार समय-समय पर यहां आकर पूजा करता है. उत्तराखंड के इस मंदिर के नाग तीर्थ के रूप में पूजा जाता है. प्राचीन मान्यता है कि यहां स्वयं कालिया नाग ने तपस्या कर भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी थी.
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब कालिया नाग ने यमुना नदी को विषैले प्रभाव से दूषित कर दिया था, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें परास्त कर हिमालय की ओर जाकर प्रायश्चित करने का आदेश दिया था. ऐसा कहा जाता है कि कालिया नाग ने सेम मुखेम में आकर कठोर तपस्या की और यहीं अपना प्रायश्चित पूरा किया. इसी कारण इस धाम को नागराज का पवित्र स्थल माना जाता है.
इस धाम में पूजा की जिम्मेदारी सेमवाल परिवार के पास सुरक्षित है. जानकारी के अनुसार, यह मंदिर 13वीं शताब्दी में स्थापित हुआ था और टिहरी नरेश ने इसके लिए ताम्रपत्र भी प्रदान किया था. आज भी सेमवाल परिवार के तीन घराने यहां बारी-बारी से पूजा-अर्चना का दायित्व निभाते हैं. हर साल 26-27 नवंबर को यहां विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं.
देश-विदेश से पहुंच रहे श्रद्धालु
मंदिर के पुजारी जितेंद्र सेमवाल के अनुसार, रवांई घाटी और पौड़ी क्षेत्र के लोगों की इस मंदिर के प्रति विशेष आस्था है. अब तो देश-विदेश से भी श्रद्धालु यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति पाते हैं. परंपरा के अनुसार, प्रत्येक तीन वर्ष में श्रद्धालु यहां आकर ढोल-नगाड़ों के साथ अखंड भजन संध्या आयोजित करते हैं.
लोक मान्यताओं के अनुसार गंगू रमोला, जो इस क्षेत्र के प्रमुख मुखिया थे, उन्होंने भी यहां कठोर तपस्या कर भगवान के दर्शन पाए थे. उनकी धर्मपत्नी और दो पुत्रों की मूर्तियां आज भी मंदिर परिसर में स्थापित हैं. यहां आए श्रद्धालु इनकी भी पूजा करते हैं.
कैसे पहुंचें सेम मुखेम धाम?
हरिद्वार और देहरादून से यहां तक बस व टैक्सी की सुविधा उपलब्ध है. उत्तरकाशी लम्बगांव रोड़ पर स्थित कौडार से सेम मुखेम के लिए सड़क मार्ग है, जो कि मणभागी सौड़ तक 20 किलोमीटर है. श्रद्धालु अपने निजी वाहन या बस से यहां आ सकते हैं. मणभागी सौड़ से सेम नागराज मंदिर के लिए बांज बुरांश के जंगलों के बीच पैदल मार्ग है और खड़ी चढ़ाई है जो लगभग एक किलोमीटर है. यह मार्ग कठिन जरूर है, लेकिन सुंदर प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर है.
इनपुट: पंकज भट्ट
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